Spirit of a Fighter – Chapter 770
मैंने दोनों को सुना, और फिर मैंने कहा, "मैं उससे गुस्से से नहीं लड़ूँगा।"
दोनों ने मेरी तरफ़ देखा।
"मैं उससे सच से लड़ूँगा।" मैंने कहा, और मेरी अपनी आवाज़ मुझे अजीब लगी — जैसे कोई और मेरे अंदर से बोल रहा हो। "जब वो मुझे गुस्से से मारने आएगा, तो मैं उसे रोकूँगा, और कहूँगा — रुक जा, तेरा बाप ज़िंदा है। और तब उसका गुस्सा उसका ही दुश्मन हो जाएगा।"
शमशेर की आँखों से आख़िरकार पानी आ गया। उसने अपनी आस्तीन से पोंछा, पर उसने आँखें नहीं छुपाईं।
"तू अजीब लड़का है," उसने कहा। "तुझमें शेर सिंह की बात है।"
मैं चौंका। "आप मेरे पापा को जानते हैं?"
"जानता हूँ? बेटा, मैंने तेरे पापा के साथ अखाड़े में कुश्ती लड़ी है।" उसने मुस्कुराने की कोशिश की, पर मुस्कान आधी ही बनी। "शेर सिंह मेरा दोस्त था। जब मुझे गाड़ा गया, तो उसने मुझे ढूँढा था — रातों को अखाड़े के पीछे आकर आवाज़ें देता था। मुझे उसकी आवाज़ सुनाई देती थी, पर मैं जवाब नहीं दे पाता। मैं उस वक़्त नाले में पड़ा था, मरा हुआ।"
मेरे हाथ ठंडे पड़ गए। "तो पापा को पता था कि आप ज़िंदा हैं?"
"नहीं। उसे यही लगा कि मैं मर गया।" शमशेर ने सिर हिलाया। "पर वो मानता नहीं था। कहता था — शमशेर मर नहीं सकता, वो मुझे मार नहीं सकता। और फिर वो खुद मर गया।"
वो चुप हो गया। मेरी छाती में कुछ भारी हो गया।
"जब मुझे पता चला कि शेर सिंह मर गया," शमशेर ने धीरे से कहा, "तो मैंने सोचा कि अब मेरे ज़िंदा रहने का कोई मतलब नहीं। पर फिर मैंने जग्गा को देखा। वो उस वक़्त दस साल का था। ठाकुर उसे कंधे पर बैठाकर घुमाता था। और मैंने सोचा — नहीं, मेरे ज़िंदा रहने का मतलब है। मेरा बेटा है।"
टिंकू ने अचानक कहा, "पर ये सब अब बेकार है।"
सबने उसकी तरफ़ देखा।
"अरे, अगर वीर भाई भारत केसरी में नहीं लड़ेगा, तो सब बेकार है।" टिंकू ने अपना माथा पकड़ लिया। "मुकाबले के लिए नाम भेजना पड़ता है, ना? फ़ॉर्म भरना पड़ता है? किसी को ज़िम्मेदारी लेनी पड़ती है?"
"हाँ," मीरा ने कहा। "मेरे पापा ने भेजा था। उनके पुराने शिष्य ने अखाड़ा संभाला है, उसने काग़ज़ भेज दिए थे।"
"तो फिर क्या दिक्कत है?" टिंकू ने पूछा। "वीर भाई का नाम लिखवा देंगे, फिर लड़ लेंगे।"
शमशेर ने तभी कुछ देखा। उसकी नज़र मेरे पीछे पड़े अख़बार पर गई — जो टिंकू लेकर आया था और बेंच पर रख दिया था। उसने उसे उठाया। उसके हाथ काँपने लगे। उसका चेहरा सफ़ेद हो गया, जैसे किसी ने उसका खून निकाल दिया हो।
"क्या हुआ?" मैंने पूछा।
वो बोला नहीं। उसने अख़बार मेरी तरफ़ सरका दिया, उँगली एक ख़बर पर रखी, और उस उँगली में जो कंपकंपी थी, वो मुझे मेरी अपनी हड्डियों में महसूस हुई।
मैंने अख़बार पकड़ा। तीन लाइनें थीं, छोटी, कोने में।
"भारत केसरी के मुकाबले में वीर सिंह का नाम वापस। आयोजकों का कहना है कि उन्हें कुछ ऐसे काग़ज़ मिले हैं जिनसे पता चलता है कि वीर सिंह पर गंभीर आरोप हैं और मामला अदालत में है, इसलिए उनका नाम सूची से हटाया जा रहा है। अब मुकाबले में जग्गा सिंह बिना लड़े विजेता घोषित किए जाएँगे।"
मैंने अख़बार वापस बेंच पर रख दिया। मेरे हाथ नहीं काँप रहे थे। मेरे अंदर कुछ ठंडा हो गया था।
"ये ठाकुर का काम है," मीरा ने कहा। उसकी आवाज़ सपाट थी। "ऐसे काग़ज़ कहाँ से आए? कल तक कुछ नहीं था।"
"उसने देर नहीं की," मैंने कहा। "उसने सुना कि भैरव ने सच कबूल किया, तो उसे पता था कि अब वो मुझे मैदान में नहीं रोक सकता। तो उसने मैदान के बाहर से रोका।"
छोटू काका ने कुर्सी पकड़ ली। "अब क्या होगा?"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो ज़िद थी जो मुझे हमेशा अजीब तरह से हिम्मत देती थी।
"सबूत के बिना आरोप नहीं," उसने धीरे से कहा, जैसे खुद से बोल रही हो। "और आरोप के बिना चुप्पी नहीं।"
"तो सबूत कहाँ से आएगा?" टिंकू ने पूछा, और उसकी आवाज़ में वो डर था जो मुझे भी महसूस हो रहा था।
शमशेर ने अख़बार को मोड़ना शुरू किया, धीरे-धीरे, जैसे कोई पुरानी रस्म निभा रहा हो। फिर उसने मेरी तरफ़ देखा।
"वीर सिंह," उसने कहा। "मेरे पास जो है, वो सिर्फ़ एक मरा हुआ आदमी नहीं है। मेरे पास उस गड्ढे की मिट्टी है, जहाँ मुझे गाड़ा गया था। मैंने उसे एक पुरानी शीशी में भरकर रखा है। उस मिट्टी में ठाकुर की गंध है। अगर तुझे किसी ऐसे आदमी की ज़रूरत है जो तेरे लिए गवाही दे, तो मैं हूँ।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उस आदमी की आँखों में अब शांति नहीं थी। एक सवाल था, और वो सवाल मेरी तरफ़ देख रहा था।
"पर एक बात सुन ले।" उसने मेरी तरफ़ झुककर कहा, इतना धीमे से कि सिर्फ़ मैं सुन सकूँ। "अगर मैं गवाह बनूँगा, तो सबको पता चल जाएगा कि जग्गा का बाप ज़िंदा है। और फिर ठाकुर जग्गा को मेरे ख़िलाफ़ कर देगा। मेरा बेटा मेरे ही ख़िलाफ़ गवाही देगा, ये मुझे मंज़ूर है। पर अगर वो ये मान ले कि मैंने उसके बचपन को चुरा लिया, तो वो खुद को कभी माफ़ नहीं करेगा।"
मैंने उसकी आँखों में देखा। फिर मैंने कहा, "मैं आपके बेटे को पहले हराऊँगा। बिना मारे। और जब वो मिट्टी में गिरा हो, तब मैं उसके कान में आपका नाम कहूँगा। और तब आप खुद आकर उसे उठा लेना।"
शमशेर ने मेरा हाथ फिर पकड़ा। इस बार उसने ज़ोर से दबाया, और मैंने भी दबाया।
"फिर तुम्हें जल्दी करनी होगी," मीरा ने कहा, और उसकी आवाज़ में ठंडक लौट आई थी। "मुकाबला कल है। और आज शाम को आयोजकों की बैठक है जिसमें वो आख़िरी सूची बनाएँगे। अगर नाम वापस हुआ, तो सिर्फ़ अदालत के काग़ज़ से वापस आएगा।"
"तो हमें उन काग़ज़ों को देखना होगा," मैंने कहा। "जो आयोजकों के पास आए हैं।"
"और उन्हें ये दिखाना होगा," टिंकू ने कहा, और उसकी आवाज़ अचानक ऊँची हो गई, "कि असली आरोपी कौन है।"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। "तेरे पापा के पास कोई जान-पहचान है उन आयोजकों में?"
मीरा ने सिर हिलाया। "एक है। पुराना पहलवान, बाबू खान। मेरे पापा का दोस्त। वो अब बड़ा आदमी है उस सभा में। पर वो ठाकुर से डरता है।"
"डरता है, तो हमें डर नहीं है," मैंने कहा। "हम उसके पास जाते हैं। आज शाम से पहले।"
मैं उठा। शमशेर भी उठा। छोटू काका ने उसका हाथ पकड़ा। "तू हमारे साथ चलेगा?"
शमशेर ने एक पल सोचा, फिर सिर हिलाया। "नहीं। मैं जाऊँगा जग्गा के अखाड़े के पास। अगर ठाकुर ने आज कुछ और किया, तो मुझे पता चलेगा।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "तू अपना काम कर। और जब मैदान में उतरे, तो याद रखना — वो लड़का जो तेरे सामने खड़ा होगा, वो तेरा दुश्मन नहीं है। वो मेरा बेटा है।"
वो अख़बार मोड़कर अपनी बगल में दबाकर चला गया। मैंने उसे जाते देखा। उसकी पीठ टेढ़ी थी, पर कदम पक्के थे।
टिंकू ने चारों कुल्हड़ों की चाय एक ही साँस में पी ली, जैसे कोई ज़हर उतार रहा हो। "अब बताओ, बाबू खान के पास क्या लेकर जाएँगे? खाली हाथ?"
"नहीं," मीरा ने कहा, और उसने अपना बैग खोला। उसमें से एक पुरानी मोटी कॉपी निकाली, जिसके कोने जले हुए थे। "ये रघुवीर की कॉपी है। जो हमें कब्र से मिली थी। इसमें बीस साल के सारे हिसाब हैं। हर वो नाम जिसने ठाकुर के लिए बोतलें ढोईं।"
"इसमें ठाकुर का नाम है?" मैंने पूछा।
"नाम नहीं।" मीरा ने कॉपी खोली। "पर एक कोड है। हर महीने के हिसाब के आगे एक निशान है — तीन त्रिकोण और एक बिंदु। यही निशान हरनाम की मुट्ठी में मिली पीतल की चाबी पर था।"
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