Spirit of a Fighter734 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 734

7 min read November 5, 2026

मैंने कालू काका की बात सुनी और मेरे रोंगटे खड़े हो गए।

छत पर वो परछाई अब भी खड़ी थी। लालटेन की रोशनी में सिर्फ़ इतना दिख रहा था कि कोई आदमी है — न चेहरा, न हाथ, बस एक काला डिब्बा-सा आकार, जिसके एक तरफ़ पीली रोशनी झूल रही थी।

"तीस साल से?" मैंने कालू काका की तरफ़ देखा।

"हाँ बेटा।" उनकी आवाज़ फुसफुसाहट में बदल गई थी। "जब मैं यहाँ नया मज़दूर आया था, तब भी देखी थी। रात को मिट्टी सींचने आता, तो छत पर वो लालटेन जलती मिलती। कभी कोई नीचे नहीं आया।"

"तो तुमने कभी पूछा नहीं?"

"पूछा था, एक बार।" कालू काका ने गला साफ़ किया। "रणवीर सिंह से। उन्होंने मेरा मुँह दबा दिया था। बोले — 'कालू, जो छत पर है, वो छत पर ही रहे। नीचे आए, तो अखाड़ा नहीं बचेगा।'"

मैंने ऊपर देखा। परछाई अब भी वहीं थी। हिल नहीं रही थी। जैसे वो हमें देख रही हो, और हमें देखकर भी कुछ नहीं कर रही हो।

"मीरा," मैंने धीरे कहा, "तुम रुको। मैं ऊपर जाता हूँ।"

"तुम पागल हो गए हो?" उसने मेरी बाँह पकड़ ली। "अभी-अभी रणवीर सिंह ने कहा कि बाबा हरिदास रघुवीर का चेहरा लेकर ज़िंदा है। और तुम अकेले उस छत पर जा रहे हो?"

"मैं अकेला नहीं जा रहा," मैंने कहा। "मेरी नाक साथ है।"

टिंकू ने मेरी दूसरी बाँह पकड़ ली। "भाई, आज रात नहीं। प्लीज। आज रात हम सब थके हैं। सुबह सोचेंगे।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसके हाथ काँप रहे थे। उसके माथे पर पसीना था, और उसकी टोपी तिरछी हो गई थी।

"टिंकू," मैंने कहा, "अगर आज रात वो उतर आया, तो सुबह हमारे पास सोचने के लिए कुछ नहीं बचेगा।"

मैंने अपनी बाँहें छुड़ाईं और छत की सीढ़ियों की तरफ़ बढ़ा।

मीरा मेरे पीछे आ गई। "मैं साथ चलूँगी।"

"मीरा—"

"मैं साथ चलूँगी, वीर सिंह।" उसकी आवाज़ में वो ज़िद थी जो मैं अब पहचानता था। "तुम्हारी नाक तुम्हें बता देगी कि वहाँ कौन है। पर अगर वो कुछ ऐसा है जो नाक से नहीं पकड़ा जाता — तो तुम्हारे पास मैं रहूँगी।"

मैं रुक गया। पलटकर उसे देखा।

अंधेरे में भी उसका चेहरा दिख रहा था — वो थकी थी, उसके बाल बिखरे हुए थे, और उसके कंधे पर बैग टेढ़ा लटक रहा था। पर उसकी आँखों में वो चीज़ थी जो मुझे हर बार अंदर तक हिला देती थी।

"ठीक है," मैंने कहा। "पर मेरे पीछे रहोगी। और अगर मैं कहूँ रुको, तो बिना सवाल रुकोगी।"

"तुम मुझे हुक्म मत दो।"

"मैं हुक्म नहीं दे रहा, मैं कह रहा हूँ—"

"वही तो।" उसने कहा। "तुम कह रहे हो। मैं सुन लूँगी। मानूँगी या नहीं, वो बाद में।"

मैं हँसा नहीं। पर मेरे अंदर कुछ ढीला ज़रूर हुआ।

हम सीढ़ियों पर चढ़े। पत्थर की सीढ़ियाँ थीं, जिन पर काई जमी थी, और हर कदम पर पैर फिसलता था। मैंने दीवार को हाथ से टेका। दीवार ठंडी थी, नम थी, और उससे मिट्टी की गंध आ रही थी — वो पुरानी मिट्टी, जो बरसों से बारिश सोख रही थी।

सीढ़ियों के आख़िरी मोड़ पर मैं रुक गया। मैंने मीरा का हाथ पकड़ा और उसे पीछे खींचा।

क्योंकि गंध बदल गई थी।

अभी तक जो मुझे छत से आती हवा में मिल रही थी, वो सिर्फ़ पुरानी मिट्टी की थी। पर अब उसमें कुछ और था। जला हुआ काग़ज़। पुरानी चप्पल का रबर। और… तेल। मिट्टी का तेल, पर वो तेल भी पुराना था — जैसे किसी बर्तन में दस साल से पड़ा हो।

वही गंध। वही जो जली चिट्ठी पर थी।

मैंने मीरा की तरफ़ देखा और धीरे से कहा, "यहाँ कोई है। और वो वही है जिसने चिट्ठी भेजी थी।"

मीरा ने मेरा हाथ कसकर पकड़ लिया। उसका हाथ ठंडा था, पर उसकी पकड़ मज़बूत थी।

मैं आगे बढ़ा।

छत खुली थी। ऊपर आसमान था — साफ़, बिना बादल, और उसमें तारे ऐसे टिमटिमा रहे थे जैसे किसी ने काली चादर पर चावल बिखेर दिए हों। हवा चल रही थी, हल्की, और उसमें नहर की गंध मिली हुई थी।

और छत के उस कोने में, जहाँ दीवारें मिलती थीं, एक आदमी खड़ा था।

उसके हाथ में लालटेन थी — पीतल की, मोर के आकार वाली, वही जो भैरव की थी। पर लालटेन जल नहीं रही थी। वो बुझी हुई थी। और फिर भी उससे रोशनी आ रही थी।

मैंने पलक झपकी। रोशनी चली गई। लालटेन फिर से बुझी दिखी।

"तुम्हें दिख रहा है?" मैंने मीरा से फुसफुसाकर पूछा।

"क्या?"

"रोशनी। लालटेन से।"

"नहीं," उसने कहा। "लालटेन बुझी है। पर वो आदमी… वो आदमी खड़ा है।"

आदमी ने हमारी तरफ़ पलटा।

उसका चेहरा छाया में था। पर जैसे ही वो पलटा, चाँदनी उस पर पड़ी — और मैंने देखा।

बूढ़ा आदमी था। बहुत बूढ़ा। सफ़ेद दाढ़ी, घुटनों तक, और वो दाढ़ी उसके शरीर से बड़ी लग रही थी। उसने माथे पर एक टीका लगा रखा था — लाल, बड़ा, और उस टीके के बीच से एक सफ़ेद लकीर नीचे तक आ रही थी, जैसे किसी ने उसके माथे को चीर दिया हो।

पर उसकी आँखें…

उसकी आँखें बंद थीं।

और फिर भी वो मेरी तरफ़ देख रहा था। जैसे बंद पलकों के पीछे से भी वो मुझे देख सकता हो।

"वीर सिंह," उसने कहा।

उसकी आवाज़… उसकी आवाज़ ऐसी थी जैसे किसी पुराने कुएँ में पत्थर गिरा हो। गहरी, खोखली, और उसमें एक गूँज थी जो ख़त्म नहीं हो रही थी।

"तुम्हें पता है मैं कौन हूँ?" उसने पूछा।

मेरा गला सूख गया। मैंने मीरा का हाथ कसकर पकड़ा। "बाबा हरिदास," मैंने कहा।

वो हँसा।

नहीं, हँसा नहीं। उसके होंठ हिले, और उसके होंठों से एक आवाज़ निकली जो हँसी जैसी थी, पर हँसी नहीं थी। जैसे किसी बंद कमरे में हवा चल रही हो।

"बाबा हरिदास," उसने दोहराया। "हाँ। यही नाम मुझे दिया गया था। पर ये नाम मेरा नहीं है। जैसे ये चेहरा मेरा नहीं है।"

"तो तुम्हारा नाम क्या है?"

"तुम्हारे पापा ने मुझे एक नाम दिया था," उसने कहा। "शेर सिंह ने। उन्होंने मुझे 'उस्ताद' कहा था। जब मैंने उन्हें ज़हर बनाना सिखाया।"

मेरे अंदर कुछ टूटा। मैंने सुना था — रामलाल ने बताया था कि बाबा हरिदास ने पापा को ज़हर सिखाया, फिर पीने को मजबूर किया। पर उसे इस तरह अपने मुँह से कहते सुनना… ये और बात थी।

"तुमने मेरे पापा को मारा," मैंने कहा। मेरी आवाज़ काँप रही थी, पर कमज़ोर नहीं थी।

"मैंने नहीं मारा," उसने कहा। "मैंने सिर्फ़ पानी तैयार किया। पीने वाले तो और थे।"

"तुम झूठ बोल रहे हो।"

"मैं झूठ नहीं बोलता, वीर सिंह।" उसने धीरे से अपनी आँखें खोलीं। दो सफ़ेद आँखें मेरी तरफ़ देख रही थीं। बिलकुल सफ़ेद, बिना पुतली के। "झूठ बोलना मेहनत है। सच बोलना आसान है। बस सच सुनने वाला चाहिए।"

मीरा ने मेरी बाँह कसकर पकड़ी। मैंने महसूस किया कि उसकी साँस रुक गई है।

"तो सच बोलो," मैंने कहा। "तुम यहाँ क्यों आए हो? छत पर? तीस साल से?"

"मैं यहाँ नहीं आया," उसने कहा। "मैं यहाँ हूँ। तीस साल से। जब से रघुवीर मरा।"

"मरा नहीं," मैंने कहा। "तुमने उसका चेहरा लिया।"

वो रुका। उसके चेहरे पर कुछ बदला — शायद हैरानी, शायद कुछ और।

"किसने बताया?" उसने पूछा।

"रणवीर सिंह ने।"

वो हँसा। इस बार हँसी असली थी। ठंडी, पर असली।

"रणवीर," उसने कहा। "वो अब भी बोलता है? मैंने सोचा था वो कुर्सी पर बैठकर चुप हो गया होगा।"

"वो चुप नहीं है," मैंने कहा। "वो बीस साल से इंतज़ार कर रहा था। मेरे लिए।"

"तेरे लिए?" उसने सिर थोड़ा तिरछा किया। "तेरे लिए क्यों?"

"क्योंकि मैं शेर सिंह का बेटा हूँ।"

वो चुप हो गया।

काफ़ी देर तक चुप रहा। इतनी देर कि हवा भी रुक गई लगी। मैंने मीरा की तरफ़ देखा। वो मेरी तरफ़ देख रही थी, और उसकी आँखों में वो डर था जो मैंने पहले कभी नहीं देखा था — सिर्फ़ डर नहीं, कुछ और भी। जैसे वो किसी चीज़ को समझ रही हो जो मैं नहीं समझ रहा था।

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