Spirit of a Fighter – Chapter 71
माँ ने शीशी देखी। और माँ… माँ वहीं बैठ गईं। ज़मीन पर। चौके पर बैठी थीं, अब ज़मीन पर। उनका हाथ शीशी की तरफ़ बढ़ा, पर छुआ नहीं। ठीक उसके ऊपर रुक गया, हवा में काँपता हुआ।
"ये तो…" उनकी आवाज़ फट गई। "ये तो तेरे पापा के हाथ में थी।"
कमरे में सन्नाटा।
"कब?" मीरा ने धीरे से पूछा। बहुत धीरे, जैसे किसी सोए हुए आदमी को जगा रही हो।
माँ ने अपनी आँखें बंद कीं। और फिर खोलीं। और उनमें पानी था। मैंने अपनी माँ को पहले भी रोते देखा था — पापा के जाने के बाद, रातों में, चक्की चलाते वक़्त, जब उन्हें लगता था कोई नहीं देख रहा। पर ऐसे नहीं। ऐसे कभी नहीं। बेटे के सामने, किसी बाहर वाली लड़की के सामने, बैठकर नहीं।
"उस रात," माँ ने कहा। "जिस रात वो गए।" उन्होंने अपना हाथ शीशी पर रखा। "वो रात को घर आए थे। मुकाबला अगली सुबह था। उन्होंने ये शीशी मेरी हथेली पर रखी और कहा — 'सरस्वती, अगर मैं न रहूँ, इसे संभालकर रखना। किसी को मत देना।'"
मेरा गला सूख गया। "और आपने क्या किया?"
"मैंने इसे ताखे में रख दिया।" माँ ने दीवार की तरफ़ इशारा किया — छोटा-सा ताखा, जिसमें अब मिट्टी का दीपक रखा था। "उसी ताखे में। जहाँ बच्चे नहीं पहुँचते।"
मैंने ताखे को देखा। फिर माँ को देखा। "तो ये वहीं से कैसे निकली? आपने तो कहा आपने ही रखी थी।"
माँ ने आँखें झुकाईं। "मैंने कभी किसी को नहीं दी। न किसी को बताया कि यहाँ क्या रखा है।"
गुड़िया, जो दरवाज़े के पास चुपचाप खड़ी सब सुन रही थी, अचानक आगे आई। उसके चेहरे पर वो भाव था जो बच्चों के चेहरे पर तब आता है जब उन्हें कुछ याद आ जाए और वो उसे बताने से डरें।
"माँ," उसने कहा। आवाज़ छोटी थी। "वो ताखा…"
माँ ने उसकी तरफ़ देखा।
"वो ताखा तो भैरव के आदमी ने पिछले महीने साफ़ किया था। याद है? जब दीवार पर दरार पड़ गई थी, तो एक आदमी आया था मिट्टी लगाने। उसने सारा सामान नीचे उतारा था। दीपक, कलश, सब।"
कमरे में हवा रुक गई।
मैंने माँ को देखा। माँ ने मुझे देखा। और उनके चेहरे पर जो था, वो सिर्फ़ डर नहीं था। वो चीज़ थी जो बीस साल से उनके सीने में पत्थर बनकर बैठी थी और अब एक झटके में टूट गई थी।
"उस आदमी ने," माँ ने धीरे से कहा, "मेरे ताखे को छुआ।"
"और सिर्फ़ ताखे को नहीं," मैंने कहा। "उसने वो चीज़ उठाई जो पापा ने आपको दी थी। और वो चीज़ भैरव तक पहुँची। और भैरव ने उसे रणवीर सिंह की मेज़ पर रखवा दिया।"
मीरा ने शीशी उठाई। "ताकि वो मुझे मिले। ताकि मुझे लगे ये मेरे पापा की दवा है। और मैं इसे बेकार समझकर फेंक दूँ या पी लूँ।"
"या," मैंने कहा, "ताकि जब कभी कोई इसके बारे में पूछे, तो सबूत तेरे पास मिले, मेरे पास नहीं।"
माँ ने अपना चेहरा हाथों में छुपा लिया। और फिर वो रोईं। ऐसे रोईं जैसे बीस साल का दरवाज़ा टूट गया हो। उनके कंधे हिल रहे थे, और वो कोई आवाज़ नहीं कर रही थीं — बस साँस रुक-रुककर आ रही थी।
गुड़िया उनके पास गई। उनके गले में बाँहें डाल दीं। माँ ने उसे अपने सीने से लगा लिया।
और मीरा — मीरा कुछ नहीं बोली। वो उठी, माँ के पैरों के पास बैठ गई, और उनका हाथ अपने हाथ में ले लिया। बस। कोई शब्द नहीं। कोई दिलासा नहीं। बस हाथ पकड़कर बैठे रहना।
मैं वहीं खड़ा था। मेरे पैर जैसे ज़मीन में गड़ गए थे।
कुछ देर बाद माँ ने अपना चेहरा उठाया। आँसू पोंछे, पर जल्दी में नहीं। धीरे-धीरे, जैसे कोई काम पूरा कर रही हों। उन्होंने मीरा का हाथ छोड़ा, और उसका सिर सहलाया।
"तेरा नाम मीरा है?"
"हाँ आंटी।"
"मीरा," माँ ने दोहराया। जैसे नाम को मुँह में रखकर देख रही हों। "अच्छा नाम है।"
फिर उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "वीर, तू बाहर जा। मुझे इससे अकेले में बात करनी है।"
मैं बाहर आया। आँगन में खड़ा रहा। अंदर से आवाज़ें आ रही थीं, धीमी, शब्द समझ नहीं आ रहे थे। गुड़िया बाहर आई और मेरे पास बैठ गई। उसने कुछ नहीं पूछा। बस मेरा हाथ पकड़ लिया।
आधा घंटा बाद माँ ने आवाज़ दी।
मैं अंदर गया। मीरा चौके पर बैठी थी। उसकी आँखें लाल थीं। माँ उसके सामने बैठी थीं, और उनके चेहरे पर कुछ बदल गया था। जैसे किसी ने पुरानी दीवार पर से प्लास्टर हटा दिया हो और अंदर की ईंट दिखने लगी हो।
"बैठ," माँ ने कहा।
मैं बैठ गया।
"मीरा ने मुझे सब बताया," माँ ने कहा। "तेरे पापा के बारे में, तहखाने के बारे में, उस ज़हर के बारे में जो मिट्टी में मिलता है। और मैंने उसे कुछ बताया।"
वो रुकीं। अपने हाथों को गोद में रखा। फिर बोलीं, "तेरे पापा उस रात मरे नहीं थे।"
मेरे कानों में जैसे पानी भर गया।
"क्या?"
"वो रात मुकाबले से पहले की थी। उन्होंने मुझे शीशी दी। फिर वो सोए। सुबह उठे, धोती पहनी, और अखाड़े चले गए।" माँ की आवाज़ सपाट थी, जैसे कोई पुरानी घटना पढ़ रही हों। "मुकाबले के बाद वो घर नहीं आए। लोग बोले वो हार गए, बीमार पड़ गए, और फिर… फिर चले गए। पर वो सच नहीं था।"
"तो सच क्या था?" मीरा ने पूछा।
माँ ने उसकी तरफ़ देखा। "वो अगली सुबह तक ज़िंदा थे। मैं उनसे मिलने गई थी। अखाड़े के पीछे, उस कमरे में जहाँ उन्हें रखा गया था। उनका शरीर टूटा हुआ था, पर आँखें खुली थीं। उन्होंने मुझे देखा और बोले — 'सरस्वती, मैं हारा नहीं। मुझे गिराया गया।'"
मेरी साँस रुक गई।
"मैंने पूछा — किसने? उन्होंने कहा — 'जो मेरा सबसे करीबी था।' और फिर उन्होंने कुछ कहना चाहा, पर आवाज़ नहीं निकली। बस उनका हाथ मेरे हाथ पर रखा, और उँगली उठाकर उन्होंने कुछ लिखा।" माँ ने अपनी हथेली खोली। "मेरी हथेली पर। उँगली से। धीरे से।"
"क्या लिखा?" मैंने पूछा। मेरी आवाज़ काँप रही थी।
"मैं नहीं पढ़ पाई," माँ ने कहा। "उँगली हल्की चल रही थी। मुझे लगा शायद उन्हें दर्द हो रहा है। मैंने उनका हाथ पकड़ लिया और कहा — 'तुम आराम करो।' और वो रुक गए।"
माँ की आँखों से फिर पानी बहा। पर इस बार वो पोंछा नहीं।
"वो मेरे सामने बंद हो गए। और मैं वो लिखाई नहीं पढ़ पाई। बीस साल से मैं यही सोचती हूँ — मैंने क्या खो दिया। मेरे हाथ पर उनका आख़िरी शब्द था, और मैंने उसे पकड़ लिया।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। मैंने उसकी तरफ़ देखा। दोनों के दिल में एक ही बात थी, पर किसी ने नहीं कही।
फिर मीरा ने कहा। "आंटी, वो लिखाई कितनी बड़ी थी? कितने अक्षर रहे होंगे?"
माँ ने सोचा। "मुझे नहीं पता। दो? तीन? उँगली दो बार ऊपर गई, एक बार नीचे।"
"दो ऊपर, एक नीचे," मीरा ने धीरे से दोहराया। "मतलब कोई नाम? या कोई निशान?"
"मुझे नहीं पता।"
गुड़िया, जो अब तक चुप बैठी थी, अचानक बोली, "माँ, आपने वो हथेली धोई थी?"
माँ ने उसकी तरफ़ देखा।
"मतलब," गुड़िया ने कहा, "उसके बाद? जब आप घर लौटीं?"
माँ कुछ देर चुप रहीं। फिर उन्होंने अपनी हथेली देखी, जैसे आज भी उस पर कुछ लिखा हो। "मैंने धोई थी," उन्होंने कहा। "क्योंकि… क्योंकि मैं रो रही थी और मैंने सोचा कि हाथ धो लूँ। और बाद में मुझे लगा कि मैंने क्या कर दिया। मैंने उनका आख़िरी शब्द धो दिया।"
मैंने माँ की हथेली पकड़ ली। उस पर झुर्रियाँ थीं, चक्की के निशान थे। मैंने उसे अपने माथे से लगाया। कुछ नहीं बोला। क्योंकि कहने को कुछ था भी नहीं।
माँ ने मेरे बालों में हाथ फेरा। "अब तू बता," उन्होंने कहा। "तेरे पास क्या है? मीरा ने कहा तीन दिन बाद भैरव से लड़ाई है।"
"हाँ।"
"और तू जीतेगा?"
मैंने सोचा। फिर बोला, "माँ, सच कहूँ? मुझे नहीं पता।"
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno