Spirit of a Fighter – Chapter 709
"मैं यहाँ रहूँगी।" उन्होंने ढक्कन उठाया और मेरी तरफ़ बढ़ाया। "ये ले। ये तेरे पापा की धोती थी। जब मैं ज़िंदा थी, तब उन्होंने इसे पहना था। अब तू पहनेगा।"
"पर मैं तो पहन चुका —"
"ये अलग है।" उन्होंने ढक्कन का अंदरूनी हिस्सा खोला। मैंने देखा — अंदर लाल कपड़े की परत थी। उन्होंने उसे निकाला। वो पुरानी धोती थी, जो रंग में उतर गई थी। पर उस पर कुछ लिखा था — बहुत छोटी लाइनें, जो धोने से मिट गई थीं, पर मिटी नहीं थीं।
"ये तेरे पापा ने खुद लिखा था," माँ ने कहा। "जिस रात उन्हें पता चला कि माधव उन्हें मारने वाला है। उन्होंने ये धोती मुझे दी और कहा — 'सरस्वती, इसे संभालकर रख। जिस दिन बेटा बड़ा हो, उसे पहनाना।'"
मैंने धोती को हाथ में लिया। उस पर लिखी लाइनें पढ़ने की कोशिश की। धुँधली थीं। पर एक लाइन साफ़ पढ़ी जा सकती थी — "जो मिट्टी में पला है, वो मिट्टी से नहीं डरता।"
मेरी आँखें भर आईं।
"माँ —"
"अब रो मत," उन्होंने कहा, पर उनकी आवाज़ भी भर्रा रही थी। "रोने का वक़्त नहीं है। जा, गुड़िया को तैयार कर। सुबह होने से पहले वो निकल जाए।"
मैं उठा। तभी गुड़िया दरवाज़े पर खड़ी मिली। उसके हाथ में उसकी थैली थी। वो सब सुन रही थी।
"मैं नहीं जाऊँगी," उसने कहा। उसकी आवाज़ छोटी थी, पर साफ़।
"गुड़िया —"
"भैया, मैं जानती हूँ तुम मुझे क्यों भेज रहे हो।" वो मेरे पास आई। उसने थैली मेरी तरफ़ बढ़ाई। "पर पहले ये ले। ये मैंने तुम्हारे लिए रखी थी।"
मैंने थैली खोली। उसमें अखाड़े की लाल मिट्टी थी। और उसके नीचे — एक छोटा-सा पीतल का टुकड़ा। जो मैंने पहले कभी नहीं देखा था।
"ये क्या है?"
"जब मैं कल अखाड़े के पास से गुज़र रही थी," गुड़िया ने कहा, "तो मुझे ये कुएँ के पास पड़ा मिला। ये तुम्हारे पापा की पोटली से गिरा था, शायद। इसे देखो, भैया — इस पर कुछ लिखा है।"
मैंने टुकड़े को पलटा। उस पर छोटे-छोटे अक्षर खुदे थे। बहुत पुराने। मैंने आँखें सिकोड़कर पढ़ा — "शेर सिंह — रामपुर — संवत्…" और उसके नीचे एक और लाइन — "मेरा बेटा मेरे बाद आएगा। उसे मेरी मिट्टी देना।"
मेरे हाथ काँपने लगे।
"माँ," मैंने कहा, "ये पापा की लिखाई है?"
माँ ने टुकड़ा देखा। उनकी आँखें फैल गईं। उन्होंने धीरे से कहा — "ये तो माधव की तिजोरी का ताला है।"
"क्या?"
"ये पीतल का टुकड़ा तिजोरी के ताले का हिस्सा है," उन्होंने कहा। "मैंने इसे एक बार माधव के गले में देखा था — चाबी की तरह। जिस दिन तेरे पापा मरे, उस दिन माधव के गले में ये नहीं था। उसने इसे खो दिया था।"
मैंने टुकड़े को गौर से देखा। ये चाबी का सिरा था — टूटा हुआ। और उस पर वो लाइन खुदी थी जो पापा ने लिखी थी।
"तो ये चाबी का वो हिस्सा है जो माधव ने खो दिया," मैंने कहा। "और बाकी चाबी उसके पास है।"
"नहीं," माँ ने कहा। "बाकी चाबी उसने बदल दी। नया ताला लगवा दिया। पर ये टुकड़ा — ये उस पुराने ताले का है। जो तेरे पापा ने बनवाया था।"
टिंकू ने पीछे से कहा — "मतलब अगर हमें वो पुराना ताला मिल जाए, तो ये टुकड़ा उसे खोल सकता है?"
माँ ने उसकी तरफ़ देखा। फिर मेरी तरफ़।
"पुराना ताला तहखाने में है," उन्होंने कहा। "जिस दरवाज़े के पीछे वो बोतल रखी है।"
मेरी साँस रुक गई।
"तो इसका मतलब —"
"इसका मतलब ये है," माँ ने कहा, "कि तेरे पापा ने बीस साल पहले सोच लिया था कि एक दिन कोई आएगा जो उस तिजोरी को खोलेगा। और उसने इस टुकड़े को छिपा दिया। कुएँ के पास। जहाँ सिर्फ़ वही पहुँच सकता है जो मिट्टी से खेलता हो।"
गुड़िया ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में पानी था, पर मुस्कान भी।
"भैया," उसने कहा, "मैंने कहा था न — तुम उन सबको पछाड़ दोगे।"
मैंने उसे गले लगा लिया। वो मेरी गोद में आ गई। मैंने उसका सिर सहलाया।
"तू सुन," मैंने कहा। "तू मामा के पास जाएगी। कुछ दिनों के लिए। और जब मैं लौटूँगा, तो तुझे वो सब दिखाऊँगा जो मैंने जीता होगा।"
वो मेरे सीने से चिपक गई।
"वादा?"
"वादा।"
तभी मीरा आँगन में आई। उसके हाथ में लालटेन थी। उसने कहा — "गाड़ी तैयार है। मेरे मामा का कस्बा यहाँ से दो घंटे का रास्ता है। वहाँ कोई नहीं जानता कि गुड़िया कौन है।"
माँ उठीं। उन्होंने गुड़िया का हाथ पकड़ा।
"चल," उन्होंने कहा। "तेरे लिए कुछ रोटी रख दूँ।"
गुड़िया ने सिर हिलाया। पर जाने से पहले वो मेरी तरफ़ मुड़ी। उसने अपनी थैली मेरे हाथ में दी — वो वाली जिसमें मिट्टी थी — और फिर उसने अपनी जेब से एक छोटा-सा लाल धागा निकाला। उसे मेरी कलाई पर बाँधा।
"ये मैंने खुद बनाया है," उसने कहा। "सुक्खी बुआ ने कहा था कि लाल धागा बुरी नज़र से बचाता है। पर मुझे नहीं लगता। मुझे लगता है ये हिम्मत देता है।"
मैंने उसके सिर पर हाथ रखा।
"जा," मैंने कहा। "और मामा को बता देना — मैं जल्दी आऊँगा।"
गाड़ी आँगन के बाहर खड़ी थी। एक पुरानी जीप, जिसका रंग फीका पड़ गया था। माँ ने गुड़िया को अंदर बिठाया। फिर वो मेरी तरफ़ मुड़ीं।
उन्होंने मेरा चेहरा दोनों हाथों में पकड़ा।
"सुन," उन्होंने कहा। "मैंने तुझे चक्की पर बैठकर पाला है। मैंने तेरे हाथों में आटा डाला है। मैंने तेरे सिर पर हल्दी का टीका लगाया है। मैं जानती हूँ तू क्या है।"
उनकी आवाज़ भारी हो गई।
"पर आज मैं तुझसे एक बात कहूँगी जो मैंने तेरे पापा से नहीं कही थी।" उन्होंने मेरे कान के पास मुँह लाया। "जब तू लड़े, तो सिर्फ़ अपने लिए मत लड़। उन सबके लिए लड़ जो अखाड़े से लौटकर नहीं आए। उनकी माँओं के लिए लड़। और सबसे बढ़कर — अपने पापा के लिए लड़। वो तुझे देख रहे हैं।"
मैंने सिर हिलाया। मेरी आँखें भर आईं, पर मैंने पलक नहीं झपकी।
माँ ने मेरा माथा चूमा। फिर वो गाड़ी में बैठीं। खिड़की से हाथ हिलाया। उनकी आँखों में पानी था, पर होंठों पर मुस्कान।
गाड़ी चल पड़ी। मैं सड़क पर खड़ा देखता रह गया। गाड़ी की लाल बत्ती दूर होती गई। धूल उड़ती रही। और फिर सब शांत हो गया।
टिंकू मेरे पास आया। उसने मेरे कंधे पर हाथ रखा।
"अब?" उसने पूछा।
"अब," मैंने कहा, "मुझे तहखाने जाना है।"
तहखाने की सीढ़ियाँ उतरते वक़्त मेरे पैर भारी थे। पर मैं रुका नहीं। मैं सीधा उस जगह पहुँचा जहाँ कालू काका ने मिट्टी बिछाई थी — वो लाल मिट्टी, जो बीस साल से अखाड़े की जान थी।
मैंने थैली खोली। गुड़िया की मिट्टी उसमें थी। मैंने उसे दोनों हाथों में लिया। फिर मैं मिट्टी पर लेट गया।
ठंडी थी। नम थी। उसमें वो गंध थी जो मैंने बचपन में सुनी थी — मेरे पापा की गंध। जब वो सुबह उठते, तो उनके शरीर से मिट्टी और पसीने की गंध आती थी। मैं उनके पास बैठता, और वो मेरे सिर पर हाथ रखते।
मैंने थैली अपने सीने से लगा ली। और आँखें बंद कर लीं।
यहाँ, इस मिट्टी में, मुझे वो गंध आई। एकदम साफ़। जैसे कोई मेरे पास बैठा हो। जैसे कोई मेरा हाथ पकड़ रहा हो।
मेरी आँखों से पानी बह निकला। मैंने धीरे से कहा — "पापा, अब मैं डरता नहीं।"
मेरी आवाज़ तहखाने में गूँजी। और फिर सन्नाटा छा गया। मैं वहीं लेटा रहा। मेरी साँस धीमी हो गई। मेरी मुट्ठियाँ खुल गईं। मेरा शरीर ढीला पड़ गया।
और तभी — तहखाने की दीवार के पीछे से एक आवाज़ आई।
धीमी। दबी हुई। पर साफ़।
"बेटा…"
मैं उठकर बैठ गया। मेरा दिल ज़ोर से धड़का।
वो आवाज़ फिर आई। और इस बार वो काँप रही थी।
"बेटा, तू जिस मिट्टी पर लेटा है, उसी मिट्टी के नीचे तेरे पापा की असली हड्डियाँ दबी हैं।"
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