Spirit of a Fighter708 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 708

7 min read November 5, 2026

"तो फिर रास्ता साफ़ है," मैंने कहा। "हम उस बोतल को नहर तक ले जाएँगे। और जब सबके सामने सच खुलेगा, तब वो बोतल भी सबके सामने नहर में जाएगी।"

भैरव ने मेरी तरफ़ ऐसे देखा जैसे मैंने उसकी ज़िंदगी का सबसे बड़ा सवाल हल कर दिया हो। पर फिर उसका चेहरा बदला। वो हँसा। ज़ोर से। एक ऐसी हँसी जो तहखाने की दीवारों से टकराकर लौटी।

"तू सच में बेवकूफ़ है, वीर," उसने कहा। "सोचता है सब इतना आसान है? तू बोतल उठाएगा, नहर तक ले जाएगा, और माधव अपनी मूँछें ऐंठकर बैठा रहेगा?"

उसने अपनी उँगली उठाई।

"पर तूने मेरी बात पूरी नहीं सुनी। मैंने कहा था — अगर वो बोतल आज खुली, तो मेरा बाप जेल से बाहर नहीं बचेगा। मैंने ये नहीं कहा कि माधव डरेगा नहीं। मैंने कहा कि माधव के पास अभी भी तीन आदमी हैं जो उसके लिए मरने को तैयार हैं। और उनमें से एक —" वो रुका। उसकी आवाज़ धीमी हुई। "एक तेरी माँ के पास है।"

मैं जम गया।

"क्या बोला?"

"जिस रात मैंने शेर सिंह को ज़हर दिया," भैरव ने कहा, "उस रात माधव ने मुझे एक बात कही थी। उसने कहा — 'मोहन, आज से तेरे पास एक ही काम है। अखाड़ा। और जो भी तेरे रास्ते में आए, उसे हटा।' मैंने पूछा — 'अगर कोई औरत हो? कोई बच्चा हो?' वो हँसा। उसने कहा — 'औरत और बच्चा सबसे खतरनाक होते हैं, मोहन। क्योंकि उनके पास खोने को कुछ नहीं होता।'"

उसने मेरी आँखों में देखा।

"माधव ने उस रात अपने एक आदमी को तेरी माँ के पीछे लगा दिया था। उस आदमी का नाम अब भी मेरे ज़ेहन में है। वो आज भी गाँव में है। और वो सिर्फ़ इंतज़ार कर रहा है — एक इशारे का।"

मेरे हाथ मुट्ठी में बंध गए। मेरी साँस तेज़ हो गई।

"कौन?"

भैरव ने धीरे से कहा — "अगर मैं नाम बता दूँ, तो तू उस आदमी के घर जाएगा। और तब वो तेरी माँ को लेकर गायब हो जाएगा। या उससे भी बुरा कुछ करेगा।"

"तो क्या मैं हाथ पर हाथ धरे बैठा रहूँ?"

"नहीं," भैरव ने कहा। "तू अपनी माँ को कुछ दिनों के लिए छिपा। किसी ऐसी जगह, जहाँ माधव के आदमी तक न पहुँच सके। और तब तक मैं तुझे वो नाम दूँगा — जब तेरी माँ सुरक्षित हो।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा। मेरा दिल कह रहा था कि वो झूठ बोल रहा है। पर उसकी आँखें — वो पहले जैसी ठंडी नहीं थीं। उनमें कुछ टूटा हुआ था। कुछ ऐसा जो बीस साल से बंद था, और आज खुद को खोल रहा था।

तभी मुझे पीछे से आहट सुनाई दी। सुरंग के दरवाज़े से रोशनी आई। और फिर मीरा की आवाज़ — "वीर!"

मैंने पलटकर देखा। मीरा और टिंकू दौड़ते हुए आ रहे थे। मीरा के हाथ में लालटेन थी, और टिंकू के हाथ में — मेरी चप्पलें।

"तू चप्पलें छोड़कर भागा था," टिंकू ने हाँफते हुए कहा। "मैंने सोचा, अगर यहाँ कोई कील-वील मिली तो तेरे पैर का क्या होगा।"

मीरा ने भैरव को देखा। उसकी नज़र मेरी कलाई पर गई, जो अब भी भैरव के हाथ के पास थी। फिर उसने मेरी तरफ़ देखा।

"क्या हुआ?"

"बाद में," मैंने कहा। "पहले भैरव, तू बता — तेरी माँ की बात अधूरी है। अलमारी के पीछे की बोतल। उसे नहर तक ले जाने का रास्ता।"

भैरव ने मीरा और टिंकू को देखा। फिर मुझे। उसने धीरे से सिर हिलाया।

"अभी नहीं," उसने कहा। "पहले अपनी माँ को छिपा। फिर मैं तुझे नाम दूँगा। और बोतल का हिसाब भी। पर एक बात याद रख — जब वो बोतल नहर में जाएगी, तब मैं वहाँ नहीं होऊँगा। मैं जेल में होऊँगा। और माधव के आदमी मुझे वहाँ भी नहीं छोड़ेंगे। तो तुझे खुद वो रास्ता खोजना पड़ेगा।"

"मैं खोज लूँगा," मैंने कहा।

"और वीर —" उसने मेरी तरफ़ हाथ बढ़ाया। मैंने सोचा वो फिर मेरी कलाई पकड़ेगा। पर उसने मेरे कंधे पर हाथ रखा। "वो तस्वीर — मेरे पास से कोई ले लेगा, जब मुझे ले जाएँगे। उसे अपने पास रख। अगर माधव के आदमी मेरे पास पहुँचे, तो मैं उनसे कहूँगा कि तस्वीर तेरे पास है। वो मेरा आख़िरी सहारा है।"

मैंने तस्वीर अपनी जेब में रख ली। फिर मैंने भैरव के कान के पास मुँह लाकर कहा, इतना धीरे कि मीरा और टिंकू भी न सुनें — "अगर तूने एक बार भी मुझसे झूठ बोला, तो मैं तुझे उस ज़हर से नहीं, उस बोतल से मारूँगा। और उसके लिए मुझे तेरी माँ की ज़रूरत नहीं पड़ेगी।"

भैरव ने मेरी आँखों में देखा। और पहली बार उसके चेहरे पर शक नहीं, कुछ और था। वो कुछ कहने ही वाला था कि तहखाने की सीढ़ियों से आवाज़ आई — "भैरव सिंह! पुलिस!"

भैरव का चेहरा सफ़ेद पड़ गया।

"जा," उसने मुझे धक्का दिया। "अभी जा। सुरंग से। पुलिस तुझे मेरे साथ नहीं देख सकती। अभी तक तो माधव ने तुझ पर सोना चोरी का इल्ज़ाम लगाया है — अगर तू यहाँ मिला, तो सब बिगड़ जाएगा।"

"पर तू —"

"मैं सँभाल लूँगा। जा!"

मीरा और टिंकू ने मेरा हाथ पकड़ा। हम सुरंग की तरफ़ भागे। पीछे से भैरव की आवाज़ आई — "इंस्पेक्टर साहब, आइए। मैं ही भैरव सिंह हूँ। और मैं आपको कुछ ऐसा दिखाना चाहता हूँ जो आपने कभी नहीं देखा।"

हम सुरंग में घुसे। पत्थरों के नीचे से बाहर निकले। रात की ठंडी हवा मेरे चेहरे पर लगी। मेरे पैर कीचड़ से भरे थे, चप्पलें टिंकू ने पहनाई थीं, पर मुझे कुछ महसूस नहीं हुआ।

मैं सीधा घर पहुँचा।

माँ आँगन में बैठी थीं। चूल्हे के पास। उनके हाथ में वो पीतल का ढक्कन था, और उनके सामने रोटी बन रही थी — जली हुई नहीं, पूरी।

मुझे देखकर वो उठीं।

"आ गया?"

"माँ," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ काँप रही थी। "तुझे अभी इस गाँव से जाना है।"

उन्होंने चूल्हे की आँच पर रोटी पलटी। फिर धीरे से कहा — "क्यों?"

"क्योंकि माधव के आदमी तेरे पीछे लगे हैं। और भैरव ने नाम नहीं बताया। पर उसने कहा कि जब तक तू सुरक्षित नहीं, वो नाम नहीं देगा।"

माँ ने रोटी उतारी। आँच पर रखी। फिर उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में वो डर नहीं था जो मैं सोच रहा था। उनमें कुछ और था। जैसे वो इस पल का इंतज़ार कर रही हों।

"माधव का आदमी," उन्होंने धीरे से दोहराया। "बीस साल से मेरे पीछे है।"

मैं जम गया।

"तू जानती है?"

"मैं जानती हूँ, बेटा।" उन्होंने ढक्कन अपनी गोद में रखा। "जिस रात तेरे पापा मरे, उस रात से। कभी एक आदमी चबूतरे पर मिलता, कभी बाज़ार में। कभी नहर किनारे। बोलता कुछ नहीं। सिर्फ़ खड़ा होता। और मैं समझ जाती कि माधव मुझे याद दिला रहा है — 'चुप रह, वरना तेरा बेटा भी नहीं बचेगा।'"

मेरा गला सूख गया।

"तूने मुझे क्यों नहीं बताया?"

"क्योंकि तू बच्चा था।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "और फिर तू बड़ा हुआ। और तेरी आँखों में वही चीज़ आने लगी जो तेरे पापा की आँखों में थी। तू अखाड़े के बाहर खड़ा होता। तू रातों को जागता। तेरी मुट्ठियाँ सोते वक़्त भी बंधी रहतीं। मैं डरती थी कि अगर बता दूँगी, तो तू उसी रात माधव के घर जाएगा। और मैं एक और शेर सिंह नहीं खो सकती।"

मैं उनके पास बैठ गया। मेरे हाथ काँप रहे थे। उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा। उनकी हथेली सूखी थी, पर गर्म।

"अब सुन," उन्होंने कहा। "मैं नहीं जाऊँगी।"

"माँ —"

"मैं नहीं जाऊँगी, वीर।" उनकी आवाज़ में वो ज़िद थी जो मैंने बचपन में देखी थी, जब वो चक्की पर बैठकर कहती थीं — 'आज भूखे नहीं सोएँगे, चाहे कुछ भी हो।' "अगर मैं भागूँगी, तो माधव समझ जाएगा कि हम डर गए। और फिर वो और बेशर्म हो जाएगा।"

"तो क्या करें?"

"गुड़िया को भेज दे।" उन्होंने कहा। "वो अभी बच्ची है। उसे इस लड़ाई में नहीं घसीटना। अपने मामा के पास भेज दे — मीरा के मामा। जहाँ वो सुरक्षित रहेगी।"

मैंने सोचा।

"और तू?" मैंने पूछा।

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