Spirit of a Fighter – Chapter 691
मैंने उन्हें पहले भी देखा था — अखाड़े में, दालान में, मैदान में। पर वो हमेशा दूर होते थे। किसी ऊँची जगह पर, किसी चबूतरे पर, किसी चौकी पर। कभी हमारे आँगन में नहीं आए। कभी हमारी गली में नहीं आए।
आज आए थे।
उनके पीछे एक नौजवान था — उनका खींचने वाला। और उनके हाथ में एक लाठी थी, जिस पर वो झुके हुए थे।
माँ ने चूल्हे से हाथ धोया और दरवाज़े की तरफ़ बढ़ीं। पर मैंने उन्हें रोक लिया।
"मैं जाता हूँ," मैंने कहा।
मैं आँगन के बीच पहुँचा। और वहीं खड़ा हो गया। मेरे हाथ में काग़ज़ था, और मुझे लगा जैसे वो मेरी मुट्ठी में जल रहा हो।
रणवीर सिंह ने मेरी तरफ़ देखा।
"वीर सिंह," उन्होंने कहा।
ये पहली बार था जब उन्होंने मेरा नाम लिया था। पूरा नाम। नाम से।
"सर," मैंने कहा।
"सर मत कह," उन्होंने कहा। "मैं तेरा सर नहीं हूँ। आज नहीं।"
मैं चुप हो गया।
उन्होंने व्हीलचेयर से नीचे देखा। अपने पैरों की तरफ़। फिर ऊपर देखा।
"मैंने सुना," उन्होंने कहा, "तुम लड़ाई छोड़ रहे हो।"
मैंने सिर झुका लिया।
"अभी नहीं," मैंने कहा। "पर सोच रहा था।"
"सोच रहा था," उन्होंने दोहराया। और उनके होंठों पर एक अजीब-सी मुस्कान आई, जो मुस्कान नहीं थी। "मैं भी सोचता था। बीस साल। हर रात। सोचता था कि कल बोलूँगा। और सुबह होती थी, और मैं चुप रहता था।"
उन्होंने लाठी को ज़मीन पर टिकाया।
"जानता है क्यों?" उन्होंने कहा।
मैंने सिर हिलाया।
"क्योंकि डर था," उन्होंने कहा। "और डर की सबसे बड़ी बात ये है कि वो तुझे बोलने नहीं देता। वो तेरे हाथ बाँध देता है। वो तेरे पैर बाँध देता है।"
वो रुके। और उनका हाथ अपने घुटनों पर गया।
"मेरे पैर बाँध दिए," उन्होंने धीरे से कहा।
मैंने देखा — उनके पैर। वो वहीं थे। पर जैसे किसी और के हों। जैसे किसी दूसरे आदमी के पैर उनके साथ बैठे हों और वो उन्हें पहचानते न हों।
और मैंने देखा कि उनकी आँखें भर आई थीं।
"ये पैर," उन्होंने कहा। और उनकी आवाज़ टूटी। "ये मेरी ग़लती की सज़ा हैं।"
मेरे अंदर कुछ हिला।
"सर—" मैंने कहा। और फिर रुक गया। "रणवीर सिंह।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"ये पैर मेरी ग़लती की सज़ा हैं," उन्होंने फिर कहा, जैसे खुद को सुना रहे हों। "बीस साल पहले, एक रात, मैंने कुछ देखा। और मैंने चुप रहना चुना। अगर उस रात मैं बोल देता, तो शायद तेरे पापा की ज़ुबान न जलती। शायद वो आज तेरे सामने खड़े होते। शायद मेरे पैर भी मेरे साथ होते।"
मैंने पीछे मुड़कर देखा।
मीरा आँगन के कोने में खड़ी थी। और उसकी आँखों में पानी था। उसने कुछ नहीं कहा। वो बस आई, और अपने पिता के पास खड़ी हो गई। और उनका हाथ पकड़ लिया।
रणवीर सिंह ने अपनी बेटी की तरफ़ देखा।
"ये," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ भर आई, "ये मेरी बेटी है। और आज मुझे इसके सामने ये बताना पड़ रहा है कि मैं डरपोक था।"
"पापा," मीरा ने कहा। और उसकी आवाज़ भी भरी हुई थी।
"मुझे बोलने दे," रणवीर सिंह ने कहा। "बीस साल से बोल नहीं पाया। अब बोलूँगा।"
वो मेरी तरफ़ मुड़े।
"तेरी माँ को मैं जानता हूँ," उन्होंने कहा। "बीस साल से। और बीस साल से मैं उससे नज़र नहीं मिला पाया। क्योंकि जब वो मुझे देखती थी, तो उसकी आँखों में एक ही सवाल होता था — तुमने देखा था या नहीं? और मैं जवाब नहीं दे पाता था।"
माँ अब दरवाज़े पर खड़ी थीं। उनके हाथ में आटा लगा था। और वो चुप थीं।
"सरस्वती," रणवीर सिंह ने कहा।
माँ ने सिर हिलाया।
"तुम्हारा बेटा पूछ रहा है कि वो लड़े या नहीं। तू क्या कहती है?"
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। और फिर उन्होंने कहा, "मैंने उसे कभी रोका नहीं। और आज भी नहीं रोकूँगी। पर मैं ये जानना चाहती हूँ — रणवीर सिंह, आपने मेरे पति को देखा था। उस रात। और आपने कुछ नहीं कहा। क्यों?"
आँगन में सन्नाटा छा गया। चूल्हे की आवाज़ भी बंद हो गई।
रणवीर सिंह ने आँखें बंद कर लीं।
"क्योंकि मैं अपने पैरों से ज़्यादा अपनी बेटी से डरता था," उन्होंने कहा। "मेरी बेटी उस वक़्त तीन साल की थी। और माधव ने मुझसे कहा था — 'अगर तू बोला, तो तेरी बेटी अगली होगी।'"
मीरा की साँस रुक गई।
माँ ने आँखें बंद कर लीं।
"और मैं डर गया," रणवीर सिंह ने कहा। "मैं एक पहलवान था — मैंने अखाड़े में शेरों से लड़ाई की थी। पर उस रात, अपनी बेटी के नाम पर, मैं डर गया। और उस डर की सज़ा मुझे आज तक भुगतनी पड़ रही है।"
मीरा अपने पिता के सामने घुटनों के बल बैठ गई।
"पापा," उसने कहा। "आप चुप क्यों रहे? मुझसे क्यों नहीं कहा?"
"क्योंकि तू बच्ची थी," उन्होंने कहा। "और फिर तू बड़ी हो गई, और मैं और डर गया। क्योंकि अब तू मेरी बेटी नहीं, मेरी ताकत थी। और मुझे लगा अगर तुझे पता चला कि तेरा बाप डरपोक है, तो तू मुझे छोड़ देगी।"
मीरा ने अपने पिता का हाथ पकड़ लिया और उस पर अपना माथा रख दिया। और उसकी पीठ काँपने लगी।
मैं वहीं खड़ा था। हाथ में काग़ज़ लिए। और मुझे लगा जैसे मेरे अंदर कुछ जम गया है, जो अब पिघल रहा है।
"रणवीर सिंह," मैंने धीरे से कहा।
वो मेरी तरफ़ मुड़े।
"ये काग़ज़," मैंने कहा, और आगे बढ़ाकर उनकी तरफ़ किया। "आपकी लिखाई है। इसमें लिखा है कि मेरे पापा तहखाने में ज़िंदा मिलेंगे।"
उन्होंने काग़ज़ देखा। फिर मेरी तरफ़।
"मैंने ये नहीं लिखा," उन्होंने कहा।
"पर लिखाई—"
"लिखाई मेरी है," उन्होंने कहा। "पर मैंने ये नहीं लिखा। ये किसी और ने लिखा और मेरी लिखाई की नक़ल की।"
मेरे हाथ ठंडे हो गए।
"कौन?"
रणवीर सिंह ने गहरी साँस ली।
"बीस साल पहले," उन्होंने कहा, "मैंने एक काग़ज़ लिखा था। एक ही काग़ज़। अपनी लिखाई में। और उसमें मैंने सब लिखा था — जो मैंने उस रात देखा था। हर बात। और उस काग़ज़ को मैंने छुपा दिया था।"
"कहाँ?"
"तहखाने की दीवार में," उन्होंने कहा। "ईंट के पीछे। और उसका पता सिर्फ़ एक आदमी को था।"
"कौन?"
उन्होंने मेरी आँखों में देखा।
"रामदीन।"
मैंने पीछे मुड़कर देखा। माँ की तरफ़। उनका चेहरा सफ़ेद पड़ गया था।
"पर रामदीन तो बीस साल से कुएँ में बंद था," मैंने कहा।
"हाँ," रणवीर सिंह ने कहा। "पर उससे पहले, जिस रात उसे बंद किया गया, उस रात मैं वहाँ था। और मैंने वो काग़ज़ दीवार में रख दिया था। और उसी रात माधव ने मुझे ज़हर दिया।"
"तो वो काग़ज़…" मीरा ने धीरे से कहा।
"आज भी वहीं है," रणवीर सिंह ने कहा। "तहखाने की दीवार में।" और फिर उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "और जो भी ये काग़ज़ लिखकर तेरे पास भेज रहा है, वो चाहता है कि तू तहखाने में जाए। और ये काग़ज़ किसी ऐसे आदमी ने लिखा है जिसने मेरी लिखाई बहुत करीब से देखी है। बहुत करीब से।"
"मतलब?"
"मतलब," रणवीर सिंह ने कहा, "कोई है जो मेरे काग़ज़ात देख सकता है। जो मेरे कमरे में आ-जा सकता है। जो मेरी लिखाई की नक़ल कर सकता है।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा।
"मेरे पिता के कमरे की चाबी सिर्फ़ दो लोगों के पास है," उसने धीरे से कहा। "मेरे पास। और भैरव के पास।"
आँगन में हवा रुक गई।
"भैरव?" मैंने कहा। "पर भैरव तो आज मैदान में सबके सामने टूट गया। उसने खुद को हारा घोषित किया।"
रणवीर सिंह हँसे। और वो हँसी ऐसी थी जैसे सूखी लकड़ी चटके।
"बेटा," उन्होंने कहा, "भैरव जब टूटता है, तब वो सबसे ज़्यादा ख़तरनाक होता है। क्योंकि टूटा हुआ आदमी अपने आप को बचाने के लिए कुछ भी कर सकता है।"
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