Spirit of a Fighter – Chapter 685
और फिर उन्होंने मेरे सिर पर हाथ रखा। उनका हाथ ठंडा था। और सूखा। और उसमें वो ताकत थी जो सिर्फ़ माँ के हाथ में होती है।
"वीर," उन्होंने कहा। "मैं तुझे एक बात बताती हूँ। बीस साल पहले, जिस रात तेरे पापा ने ज़हर पिया, उस रात उन्होंने मुझसे कहा था — 'सरस्वती, मेरा बेटा वीर बड़ा होकर अखाड़े में उतरेगा। और जिस दिन वो उतरेगा, उस दिन भैरव को उसके सामने माफ़ी माँगनी पड़ेगी।' और आज —" उनकी आवाज़ रुक गई।
"आज क्या, माँ?"
"आज भैरव ने माफ़ी माँगी," उन्होंने कहा। "पर मैदान में नहीं। अपनी माँ के सामने। और शायद — शायद तेरे पापा ने वही देखा जो वो देखना चाहते थे।"
वो उठीं। अपनी साड़ी झाड़ी। और फिर बोलीं, "चल, घर चल। कल की रोटी आज ही बनानी है।"
मैं उठा। मीरा और टिंकू पास खड़े थे। टिंकू की आँखें भरी हुई थीं और वो झूठमूठ अपनी नाक खुजला रहा था।
"भाई," उसने कहा। "मैंने तो कहा था न — तेरा बाप कोई और नहीं हो सकता। शेर सिंह ही है।"
"तूने कब कहा था?" मीरा ने कहा।
"अभी," टिंकू ने कहा। "मन में।"
मीरा हँसी। और उसकी हँसी सुनकर मुझे पता चला कि मैं ज़िंदा हूँ।
घर पहुँचे तो रात बहुत हो चुकी थी। गुड़िया दरवाज़े पर खड़ी थी। वो हमारी राह देख रही थी। मुझे देखा और भागकर आई। और मेरे पेट में अपना सिर घुसा दिया।
"भैया," उसने कहा। "मुझे पता था तुम आओगे।"
"तू सोई नहीं?" मैंने कहा।
"कैसे सोती?" उसने कहा। "माँ ने जब आधी जली रोटी छोड़ी थी, तब मैंने शपथ ली थी — जब तक भैया नहीं आते, मैं नहीं सोऊँगी।"
मैंने उसके सिर पर हाथ रखा। उसके बाल रूखे थे। और उसकी आँखों में नींद थी।
"अब सो जा," मैंने कहा।
"पहले बताओ," उसने कहा। "क्या जीते?"
मैं हँसा। "अभी से?"
"हाँ," उसने कहा। "मुझे पता है। भैया, जब तुम मिट्टी में खड़े होते हो — तो आसमान भी तुम्हारी तरफ़ देखता है।"
मैं उसे उठाकर अंदर ले गया। उसका बिस्तर पर लेटना, और वो उसी वक़्त सो गई। जैसे उसे मेरे आने का इंतज़ार था, और बस इतना ही चाहिए था।
माँ चूल्हा जलाने लगीं। रात के इस वक़्त।
"माँ, अब क्यों?" मैंने कहा।
"कल के लिए," उन्होंने कहा। "पहलवान को खाली पेट नहीं उतरना चाहिए। और मैंने कहा था — कल की रोटी आज बनानी है।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। और उसकी आँखों में वो बात थी जो कोई नहीं कह सकता। वो बस बोली, "मैं दाल बनाती हूँ।"
टिंकू ने कहा, "मैं? मैं क्या करूँ?"
"तू बैठ," माँ ने कहा। "तू कल का लड्डू बनाएगा।"
टिंकू की आँखें चमकीं। "मैंने सोचा था कोई नहीं कहेगा।"
उसने अपनी डिब्बी खोली। उसमें लड्डू थे। पीले। बड़े। और उसने एक उठाकर मेरी तरफ़ बढ़ाया।
"भाई," उसने कहा। "ये खास तुम्हारे लिए बनाया है। मैंने इसमें थोड़ी अजवाइन डाली है। पहलवानी का लड्डू है।"
"अजवाइन?" मीरा ने कहा। "लड्डू में?"
"पहलवानी के लिए," टिंकू ने कहा, बड़ी गंभीरता से। "पेट ठीक रहेगा।"
मैंने लड्डू खाया। और सच कहूँ — वो अजवाइन वाला लड्डू मीठा नहीं था। कड़वा था। पर मैंने पूरा खाया। क्योंकि टिंकू मेरी तरफ़ देख रहा था। और उसकी आँखों में वो उम्मीद थी जो मैं तोड़ना नहीं चाहता था।
"अच्छा है," मैंने कहा।
"झूठ," मीरा ने कहा।
"नहीं," मैंने कहा। "अच्छा है।"
और टिंकू हँसा। और मैं हँसा। और माँ चूल्हे पर रोटी बनाते हुए हँसीं।
तभी मैंने देखा — रोटी फूल रही थी। चूल्हे पर। पूरी। गोल। बिना जली।
माँ ने उसे निकाला। उनके हाथ थोड़ा जले, पर उन्होंने परवाह नहीं की। उन्होंने रोटी मेरी तरफ़ बढ़ाई।
"बीस साल बाद," उन्होंने कहा। "पहली बार रोटी फूली है, बेटा।"
मैंने रोटी ली। गरम थी। मेरे हाथ जल रहे थे, पर मैंने छोड़ी नहीं। माँ की आँखों में देखा। और उनकी आँख से एक आँसू गिरा। मेरी रोटी पर। और सूख गया।
मैंने उसे पोंछा नहीं। मैंने रोटी खाई। धीरे-धीरे। और वो आँसू मेरे अंदर उतर गया। और मुझे लगा — यही मेरी ताकत है।
मीरा ने दाल बनाई। और वो पहली बार नमकीन नहीं, थोड़ी फीकी थी। पर मैंने दो बार माँगी।
रात खत्म हो रही थी। माँ ने कहा, "अब सो जा। सुबह जल्दी उठना है।"
मीरा ने कहा, "मैं तहखाने में सोऊँगी।"
"तहखाने में क्यों?" मैंने कहा।
"क्योंकि तुम वहीं सो रहे हो," उसने कहा। "और मुझे पता है — तुम्हें अकेले सोना अच्छा नहीं लगता।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। और उसने अपनी आँखें नीची कर लीं। जैसे उसने कुछ ज़्यादा कह दिया हो।
"ठीक है," मैंने कहा।
तहखाने में मिट्टी ठंडी थी। और उसमें वो गंध थी जो सिर्फ़ अखाड़े की मिट्टी में होती है — पसीना, हल्दी, और कुछ जो शब्दों में नहीं आता। मैं मिट्टी पर लेटा। मीरा दूर बैठी थी। टिंकू दरवाज़े के पास सो गया था — उसकी खर्राटें आ रही थीं।
मैंने आँखें बंद कीं।
और तभी — मुझे गंध आई।
एक नई गंध। जो कहीं से भी नहीं आ रही थी। मिट्टी के नीचे से आ रही थी। जली खाल की गंध। वो गंध जो उस आदमी की थी जो अदालत में खुद को "शेर सिंह" बताने आया था। वो गंध जो मैं कभी नहीं भूल सकता।
मैं उठा। मिट्टी को हाथ से खोदने लगा। मेरी उँगलियाँ जल रही थीं।
"वीर?" मीरा ने कहा। "क्या हुआ?"
"यहाँ कुछ है," मैंने कहा। "मिट्टी के नीचे कुछ है।"
मैंने और खोदा। और मेरे हाथ को कुछ लगा। ठंडा। धातु। मैंने उसे निकाला।
एक छोटा लोहे का डिब्बा। जिस पर जंग लगी थी। और उस पर वही चिह्न — त्रिकोण और बिंदु। वही चिह्न जो हरनाम की मुट्ठी में पड़ी पीतल की चाबी पर था।
डिब्बा कितना भी पुराना हो, उसकी गंध ताज़ा थी। जैसे किसी ने अभी-अभी उसे वहाँ रखा हो।
और तभी, मिट्टी के नीचे से, बहुत गहरे से — एक आवाज़ आई।
धीमी। भारी। पर साफ़।
"वीर।"
मेरी साँस रुक गई।
"कल अखाड़े में दो शेर सिंह होंगे। पहचान लेना — कौन असली है।"
मीरा ने मेरा हाथ पकड़ा। उसकी उँगलियाँ बर्फ़ जैसी ठंडी थीं।
"वीर," उसने कहा। "ये आवाज़…"
"मुझे पता है," मैंने कहा।
मैंने डिब्बा खोला। अंदर एक काग़ज़ था। पुराना। पीला। और उस पर लिखा था — मेरे पापा की लिखाई में।
"वीर, अगर तू ये पढ़ रहा है, तो मतलब मैं नहीं हूँ। पर मेरी एक बात मान — कल अखाड़े में जो आदमी खुद को मैं कहेगा, उसे मेरी आँखों में देखना। असली शेर सिंह की आँखों में जो नहीं है, वो उसमें होगा। और वो है — माफ़ी। मैंने भैरव को कभी माफ़ नहीं किया। असली मैं कभी खुद को माफ़ नहीं कर पाया। कल जो आदमी तुझसे माफ़ी माँगे — वो मैं हूँ। और जो न माँगे — वो मेरी परछाई है।"
मैंने काग़ज़ मोड़ा। और अपने सीने से लगाया।
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। और उसकी आँखों में वो बात थी जो वो कह नहीं रही थी।
"कल," उसने कहा। "तुम अकेले नहीं लड़ोगे।"
"मुझे पता है," मैंने कहा।
और तभी ऊपर से — आँगन से — दरवाज़े पर कोई दस्तक देने लगा। रात के इस वक़्त। तीन दस्तक। फिर दो। फिर एक।
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा।
मैंने मिट्टी से डिब्बा उठाया। और सीढ़ियों की तरफ़ बढ़ा। मेरा दिल ज़ोर से धड़क रहा था। और मेरी नाक मुझे बता रही थी कि बाहर कौन है।
पर मैंने खुद को रोका। क्योंकि आज रात — आज रात मुझे जवाब नहीं देना था। आज रात मुझे सिर्फ़ एक बात याद रखनी थी।
कल अखाड़े में दो शेर सिंह होंगे। और मुझे पहचानना था — कौन असली है।
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