Spirit of a Fighter – Chapter 683
मतलब? शेर सिंह मेरे पापा नहीं थे?
मेरे पैरों तले मिट्टी खिसक गई।
मैं दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा, फिर रुका। माँ के पास नहीं जा सकता था। अभी नहीं। मेरी आवाज़ काँप रही थी और अगर मैंने अभी पूछा, तो सवाल गुस्से में निकलता।
मैं आँगन में वापस आया।
और तभी मेरी नाक ने कुछ पकड़ा। तेज़। जैसे किसी ने मेरे चेहरे पर ठंडा पानी फेंक दिया हो।
आँगन के बाहर, नीम के पेड़ के पास, कोई खड़ा था।
मैंने धीरे से कदम बढ़ाए। दरवाज़े से बाहर झाँका।
नीम के पेड़ के नीचे, चबूतरे पर, एक पोटली रखी थी। लाल कपड़े में बँधी। और उसके ऊपर रखा था एक पीतल का ढक्कन — वही ढक्कन जो माँ ने रात भर सीने से लगाया था।
मैं दौड़ा। पोटली खोली।
अंदर एक शीशी थी — नीली। और उसके साथ एक काग़ज़।
मैंने काग़ज़ खोला।
उस पर बस तीन शब्द थे, और वो भैरव की लिखाई में थे।
"अब खेल शुरू।"
मैंने पलटकर घर की तरफ़ देखा।
माँ दरवाज़े पर खड़ी थीं। उन्होंने वो पोटली देखी। और उनका चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
"वीर," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ ऐसी थी जैसे किसी ने उनके गले में उँगली डाल दी हो। "वो शीशी मत खोलना।"
पर मैंने खोल दी थी।
अंदर से वो गंध आई जो मैं जानता था। वही गंध जो भैरव की बोतलों में थी। वही ज़हर।
पर इस बार उसमें कुछ और मिला हुआ था। कुछ मीठा। जैसे किसी ने ज़हर में शहद घोल दिया हो।
मैंने मीरा की तरफ़ देखा — वो रास्ते में खड़ी थी, पलटकर आ रही थी, क्योंकि उसने मुझे दौड़ते देखा था।
"मीरा," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ सुनकर वो रुक गई। "तुम्हारी लैब आज खुली रहेगी?"
उसने मेरी आँखों में देखा। फिर मेरे हाथ में शीशी देखी।
"क्यों?" उसने पूछा।
"क्योंकि," मैंने कहा, और मैंने शीशी हवा में उठाई, "भैरव ने मुझे एक तोहफ़ा भेजा है। और मैं नहीं मानता कि ये सिर्फ़ ज़हर है।"
माँ दरवाज़े से नीचे उतरीं। उनके हाथ जुड़े हुए थे।
"वीर," उन्होंने कहा। "वो शीशी तेरे पापा के ज़माने की है। मैंने उसे बहुत पहले तहखाने में छुपाया था। उसका बाहर आना मतलब—"
"मतलब क्या, माँ?" मैंने पूछा। और इस बार मेरी आवाज़ में गुस्सा था, और मैं उसे रोक नहीं पाया। "मतलब ये कि भैरव ने तहखाना खोद डाला? मतलब ये कि वो उस चीज़ तक पहुँच गया जो पापा ने छुपाई थी? मतलब ये कि—"
मैं रुक गया।
क्योंकि मेरी नाक कह रही थी कि इस शीशी में सिर्फ़ ज़हर नहीं है। इसमें कुछ और है। कुछ ऐसा जो ज़िंदा है।
"मीरा," मैंने कहा, और उसकी तरफ़ बढ़ा। "इसे लेकर चलो। अभी। मैदान में।"
"मैदान में?" उसने कहा। "इस वक़्त?"
"हाँ," मैंने कहा। "क्योंकि कल के मुकाबले में जो होने वाला है — वो सिर्फ़ कुश्ती नहीं है। और मुझे पता है कि वो ज़हर कहाँ से आया। और मुझे उसका इलाज ढूँढना है।"
माँ ने मेरी कलाई पकड़ी।
"वीर," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में अब वो मिठास नहीं थी। सिर्फ़ डर था। "अगर वो शीशी उसने तुझे दी है, तो वो चाहता है कि तू उसे खोले। वो तुझे खींच रहा है।"
"तो मैं उसकी रस्सी खींचूँगा," मैंने कहा। "पर इस बार वो अपनी तरफ़ नहीं, मेरी तरफ़ आएगा।"
मैंने माँ के हाथ पर हाथ रखा।
"माँ," मैंने कहा, "आपने कहा था — सच बच्चे से नहीं, पहलवान से बोला जाता है। तो आज मैं पहलवान हूँ। और आज मैं अपना सच खुद ढूँढूँगा।"
माँ ने मेरी आँखों में देखा। लंबा। और फिर उन्होंने अपना हाथ छोड़ दिया।
"जा," उन्होंने कहा। "पर सुबह तक लौट आ। वरना मैं खुद मैदान में आऊँगी।"
मैंने सिर हिलाया।
और फिर मैं, मीरा और टिंकू — हम तीनों रात के अंधेरे में मैदान की तरफ़ चले।
टिंकू ने चलते-चलते पूछा, "भाई, तूने कभी सोचा है कि हम तीन कितने अजीब हैं? एक मज़दूर, एक लड़की जो किताबें पढ़ती है, और एक मिठाई वाला। और हम भैरव जैसे आदमी से लड़ रहे हैं।"
"हाँ," मैंने कहा।
"और फिर भी हम हार नहीं रहे," उसने कहा।
"क्योंकि हम तीन नहीं हैं," मीरा ने कहा। उसकी आवाज़ ठंडी और साफ़ थी। "हम पूरा गाँव हैं। बस गाँव को अभी ये पता नहीं है।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। और उस वक़्त मुझे पता चला कि मैं इस लड़की से प्यार करता हूँ। पहली बार। पूरे दिल से। और ये बात किसी को नहीं बतानी। अभी नहीं।
मैदान के फाटक पर पहुँचे।
अंदर रोशनी थी। कई लालटेनें। और भैरव के आदमी — दस नहीं, बीस। तीस। और बीच में, मिट्टी पर, एक कुर्सी रखी थी। खाली।
भैरव वहाँ नहीं था।
पर कुर्सी के पीछे, दीवार पर, कुछ लिखा था। बड़े अक्षरों में। लाल रंग में।
मैंने पढ़ा।
"आज रात कुश्ती नहीं। आज रात — लहू नहीं, सवाल है। और वीर सिंह — तू जवाब देगा। अगर जवाब सही निकला, तो तेरी माँ ज़िंदा रहेगी। अगर गलत — तो कल मैदान में तेरी माँ की लाश पर कुश्ती होगी।"
मेरी मुट्ठी कस गई।
और तभी पीछे से एक आवाज़ आई — बहुत करीब, बहुत शांत।
"पहला सवाल, वीर सिंह।"
मैं पलटा।
भैरव वहाँ खड़ा था। अकेला। हाथ में कोई हथियार नहीं। बस एक काग़ज़।
"पहला सवाल," उसने दोहराया। "तेरा असली बाप कौन है?"
मैंने उसकी आँखों में देखा। और मेरे अंदर कुछ टूटा।
पर मैंने अपनी आवाज़ नहीं टूटने दी।
"मेरा बाप," मैंने कहा, धीरे, एक-एक शब्द नापकर, "शेर सिंह है। और तू जो भी कहेगा, वो मेरे बाप का नाम नहीं बदल सकता।"
भैरव मुस्कुराया।
"गलत जवाब," उसने कहा।
और उसने अपनी उँगली उठाई।
तभी पीछे से, मैदान के दरवाज़े से, एक आवाज़ आई — एक औरत की, बूढ़ी, पर ऐसी जो भैरव की सारी मुस्कान उतार दे।
"रुक, मोहन।"
सब पलटे।
दरवाज़े पर खड़ी थीं — भैरव की माँ।
॥
दरवाज़े पर खड़ी औरत को देखकर मैदान में हवा रुक गई। सच में रुक गई। जैसे किसी ने साँस लेने की आवाज़ तक बंद कर दी हो। मैंने उस औरत को देखा — सफ़ेद बाल, माथे पर बड़ी लाल बिंदी, हाथ में लाठी, पीली धोती, और आँखें — वही आँखें जो अभी-अभी भैरव की मुस्कान में दिख रही थीं, पर इनमें ठंडक नहीं थी। इनमें कुछ और था। कुछ जला हुआ।
भैरव की उँगली हवा में अटक गई। उसका मुँह खुला रह गया।
"माँ?" उसने कहा। आवाज़ ऐसी जैसे गला सूख गया हो। "तू… तू यहाँ कैसे?"
औरत ने लाठी की टेक ली और एक कदम आगे बढ़ी। धीरे। बहुत धीरे। जैसे हर कदम में बीस साल का बोझ हो।
"मैं यहाँ कैसे?" उसने कहा। "मैं तो बीस साल से यहीं हूँ, मोहन। तेरे पीछे। तेरे हर उस काम के पीछे जो तूने किया। और आज जब तूने ये चिट्ठी लिखी — तब मैंने सोचा, अब बहुत हो गया।"
मैंने भैरव की तरफ़ देखा। उसका चेहरा बदल रहा था। पहले लाल, फिर पीला, फिर कुछ ऐसा जो मैंने पहले कभी उस पर नहीं देखा था। डर। सच्चा डर।
"माँ, तू चल घर," उसने कहा। आवाज़ में वो मिठास घोलने की कोशिश थी, पर हाथ काँप रहे थे। "ये मर्दों का मामला है। तू घर चल।"
"मर्दों का मामला?" औरत हँसी। पर वो हँसी नहीं थी। वो कुछ और था। "जब तू नौ साल का था और तेरे पापा ने तुझे पहली बार अखाड़े की मिट्टी में खड़ा किया था — तब ये मर्दों का मामला था? जब तूने पहली बोतल पानी में घोली थी — तब तेरे हाथ काँपे थे, मोहन। मुझे याद है। तू रात को उठकर आया था और मेरे पास बैठकर रोया था। और मैंने तुझे सीने से लगाया था। और तूने कहा था — 'माँ, ये आख़िरी बार है।'"
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