Spirit of a Fighter – Chapter 682
माँ रुकीं। उनके होंठ काँपे।
"उसने वो शीशी मुझे दी थी," माँ ने कहा। "और उसी रात उसने उसे पी लिया। मैंने उसे रोका। मैंने कहा — 'ये तो तूने दवा कहकर दी थी।' उसने कहा — 'हाँ। पर जब माधव इसे ज़हर बना चुका है, तो मैं इसे दवा कैसे कहूँ? मेरा बेटा इसे दवा समझकर पिएगा, और मैं ये नहीं सह सकता।' फिर वो रोया। और उसने कहा — 'सरस्वती, मेरे बेटे को मिट्टी में खेलने देना। उसे पहलवान मत बनाना। उसे ज़मीन पर रहने देना।'"
मैंने माँ की तरफ़ देखा। उनकी आँखों में पानी था, पर वो रो नहीं रही थीं। जैसे बीस साल का रोना अब खत्म हो गया हो।
"मैं उसे ज़मीन पर नहीं रख पाई," माँ ने कहा। "तू अपने पापा की तरह बड़ा हुआ — बिना कहे, बिना सिखाए। तू रातों को अखाड़े के बाहर खड़ा रहता था, और मैं दाल में नमक कम डाल देती थी, ताकि तू सोचे कुछ बदला है। तू हर रोज़ वही सपना देखता था जो तेरे पापा ने मना किया था। और मैं… मैं तुझे रोक नहीं पाई।"
फिर उन्होंने मेरा सिर सहलाया। धीरे। जैसे चक्की के पाट पर आख़िरी अनाज पीस रही हों।
"अब उठ," उन्होंने कहा। "कल मैदान में जाना है। पर कल से पहले — घर चल। तेरी बहन ने तेरे लिए मिट्टी भरी है। वो बेकार नहीं जाएगी।"
मैंने उनके पैर छुए। मीरा ने मेरी बाँह पकड़ी और उठाया। टिंकू ने मेरी कमर पर हाथ रखा। कालू काका आगे चले, लालटेन लेकर।
हम बाहर निकले। रात के तीन बज रहे थे, या शायद चार। नहर की तरफ़ से हवा आ रही थी और उसमें वो पुरानी बदबू थी — जलती मिट्टी। पर इस बार उसमें कुछ और भी था। गीली घास। और पहली बारिश की गंध।
टिंकू ने अपनी टोपी पहनी और मेरी तरफ़ देखा।
"भाई," उसने कहा, "अब सच में डर लग रहा है।"
मैं हँसा। पहली बार पूरी रात में।
"तुझे तो हमेशा लगता है," मैंने कहा।
"नहीं, ये अलग है।" उसने अपनी जेब से एक छोटी पोटली निकाली — उसकी मिठाई वाली पोटली। "मैंने सोचा, अगर आज रात मरना पड़ा, तो खाली पेट मरूँगा तो मेरी माँ को शर्म आएगी।"
माँ ने उसकी तरफ़ देखा और मुस्कुराईं।
"तेरी माँ को शर्म तब आएगी," माँ ने कहा, "जब तू अखाड़े में खड़ा होगा और मिठाई नहीं बाँटेगा।"
टिंकू ने मुँह बनाया। "माँ जी, आपने भी अब शुरू कर दिया।"
कालू काका आगे चलते हुए हँसे। उनकी हँसी खुरदुरी थी, जैसे पुरानी चक्की चल रही हो।
घर पहुँचे तो आँगन में लालटेन जल रही थी। गुड़िया दरवाज़े पर खड़ी थी — स्कूल की कॉपी हाथ में, दोनों चोटियाँ खुली, और आँखों में उनींदा गुस्सा।
"भैया," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में रोना था। "मैं सोई नहीं। मैंने कहा था ना, मैं साथ चलूँगी।"
मैंने उसके सिर पर हाथ रखा। "अभी सो जा," मैंने कहा। "कल तेरा भैया मुकाबला लड़ेगा। और मुझे सुबह उठाने वाला कोई चाहिए।"
उसने मेरी तरफ़ देखा। फिर उसकी आँखें चमकीं। "मैं उठाऊँगी। चार बजे। मैं वादा करती हूँ।"
"तीन बजे," माँ ने कहा। "कल तीन बजे सब उठेंगे।"
गुड़िया ने सिर हिलाया और अंदर भागी। फिर रुकी और पलटी।
"भैया," उसने कहा, "मेरी थैली देखी? मैंने तुम्हारे तकिये के नीचे रखी थी।"
मैंने पलटकर माँ की तरफ़ देखा। माँ ने आँखें झुका लीं, पर होंठों पर मुस्कान थी।
"देख लूँगा," मैंने कहा।
गुड़िया गई।
मीरा आँगन की मुंडेर पर बैठ गई। उसने अपनी कुर्ता-सलवार पर लगी मिट्टी झाड़ी, और फिर पानी का लोटा उठाया। उसके हाथ काँप रहे थे — थकान से या डर से, पता नहीं।
मैं उसके पास गया। और चुपचाप बैठ गया।
कुछ देर कुछ नहीं बोला।
फिर उसने कहा, "तुम्हारी माँ गजब की औरत हैं।"
"हाँ," मैंने कहा।
"मुझे लगा वो टूट जाएंगी। इतने साल, इतना सच, इतना सन्नाटा। पर वो…" उसने लोटा रख दिया। "मेरी माँ तो तीन दिन में रो-रोकर बीमार पड़ जातीं।"
"तुम्हारी माँ कहाँ हैं?" मैंने पूछा। ये मैंने पहले कभी नहीं पूछा था। कभी सोचा भी नहीं था कि मीरा की माँ कहाँ हैं।
मीरा ने सामने देखा। आँगन की दीवार पर टूटी घड़ी लटक रही थी।
"मर गईं," उसने कहा। "जब मैं नौ साल की थी। बुखार हुआ, और तीन दिन में चली गईं। पिता कहते हैं — उन्होंने कभी किसी को नहीं बताया कि वो कैसे गईं। बस इतना कहते हैं कि समय से पहले गईं।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"मीरा," मैंने कहा। "तुम्हारे पिता के पैर। और तुम्हारी माँ। क्या तुम्हें कभी लगा कि ये दोनों एक ही चीज़ से जुड़े हैं?"
उसने मेरी तरफ़ देखा। और उसकी आँखों में वो झटका था जो मैं जानता था — जो मेरी नाक ने बहुत बार महसूस किया था।
"तुम क्या कहना चाह रहे हो?" उसने धीरे से पूछा।
"मैं कुछ नहीं कह रहा," मैंने कहा। "पर कल के बाद — मैदान के बाद — हमें तुम्हारे पिता से सीधा पूछना होगा। पूरी बात। बिना डर।"
मीरा ने सिर हिलाया। और फिर उसने वो किया जो उसने पहले कभी नहीं किया — उसने अपना हाथ मेरे हाथ पर रखा।
"कल मैदान में," उसने कहा, "मैं तुम्हारे साथ खड़ी रहूँगी। पिता के पास। भैरव के सामने। सबके सामने।"
"मीरा—"
"नहीं, सुनो," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो ज़िद थी जो अब मैं पहचानने लगा था। "मैंने तुम्हें यहाँ तक आते देखा है। तुम अकेले मिट्टी में खड़े रहे हो, रातों में। मैंने देखा है। इसलिए अब मैं भी अकेली नहीं खड़ी रहूँगी।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसकी उँगलियाँ मेरी हथेली पर ठंडी थीं, पर उनमें एक गर्मी थी जो मेरी हड्डियों तक पहुँच गई।
मैंने कुछ नहीं कहा। मैंने बस उसका हाथ पकड़ लिया।
माँ दरवाज़े पर आईं। उन्होंने हमें देखा। और फिर बिना कुछ कहे, एक लोटा पानी लेकर अंदर चली गईं। पर उनके चेहरे पर वो मुस्कान थी जो बीस साल से छुपी थी।
मीरा ने अपना हाथ खींच लिया। "मैं जाती हूँ," उसने कहा, और उसकी आवाज़ थोड़ी ऊँची थी। "सुबह मिलते हैं।"
"मीरा—"
"सुबह," उसने कहा, और वो पलटी।
पर फिर वो रुकी। और बिना पलटे बोली, "वो रोटी — मैंने सम्भालकर रख ली है। तुम्हारी माँ को दूँगी नहीं। तुम्हें खुद देनी होगी।"
फिर वो चली गई।
मैं आँगन में खड़ा रह गया। और मुस्कुराया।
घर के अंदर गया। तकिये के नीचे गुड़िया की थैली थी — लाल मिट्टी से भरी। मैंने उसे उठाया। मिट्टी की गंध आई — अखाड़े की मिट्टी। और उसमें कुछ और भी था।
मैंने थैली को उलटा। मिट्टी बहने लगी। और उसमें से एक छोटा काग़ज़ निकला, चौकोर, मुड़ा हुआ।
मैंने खोला।
और मेरे हाथ काँपने लगे।
उस पर लाल स्याही से लिखा था — "कल का मुकाबला जीतने के बाद तेरी माँ खुद बताएगी कि तेरा असली बाप कौन है।"
मैंने उसे दो बार पढ़ा। तीन बार। मेरी आँखें शब्दों पर अटक गईं।
असली बाप।
मैंने पलटकर देखा। माँ रसोई में थीं। उनकी परछाईं दीवार पर थी। वो चक्की के पास बैठी थीं, पर चक्की नहीं चला रही थीं। बस हाथ जोड़े बैठी थीं।
मैंने काग़ज़ जेब में रखा। और फिर कुछ सोचा।
शेर सिंह मेरे पापा थे। ये माँ ने कहा। ये काग़ज़ कहता है — असली बाप कौन है।
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