Spirit of a Fighter673 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 673

7 min read November 5, 2026

वो लंबा आदमी फिर हँसा, और इस बार हँसी तेज़ थी। "बहुत हो गया," उसने कहा, और उसने लाल चिट्ठी फाड़कर फेंक दी। "बीस साल पुरानी बातें। अब सुन। तेरी माँ यहाँ से तभी जाएगी जब तू मुकाबले से हट जाएगा।"

मैंने उसकी तरफ़ देखा। मैंने कालू काका की तरफ़ देखा। और फिर मैंने वो किया जो मैंने पहले कभी नहीं किया था — मैं कालू काका के पास गया, झुका, और उनका हाथ पकड़कर उन्हें उठाया।

"काका," मैंने कहा, "कायर वो होता जो आज भी भागे। आप आज खड़े हैं।" मैंने उनका हाथ नहीं छोड़ा। "बीस साल में पहली बार आपने सच बोला। इसीलिए आप आज पहलवान हैं।"

कालू काका ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें लाल थीं, पर उनमें वो डर नहीं था।"मेरे पास एक रास्ता है," उन्होंने धीरे से कहा। "कुएँ की सीढ़ियों के पीछे। मिट्टी से ढका दरवाज़ा। मैंने वहाँ बीस साल से पानी नहीं डाला ताकि मिट्टी सूखे और दरवाज़ा दिखे। पर मैंने उसे कभी नहीं खोला।"

"आज खोलेंगे," मैंने कहा।

उस लंबे आदमी की मुस्कान गायब हो गई। उसने अपनी जेब से कुछ निकाला — एक सीटी। उसने ज़ोर से सीटी बजाई। बाहर से पैरों की आवाज़ें आईं, कई सारे पैर, कई सारी लाठियाँ।

"तो खेल बदल गया," उसने कहा। "अब मैं तुम्हें रास्ता दिखाऊँगा।"

टिंकू ने सबसे पहले हिलना शुरू किया। उसने अपनी मिठाई की डिब्बी खोली, हल्दी और घी की खुशबू फैल गई, और उसने एक मोटी लड्डू कालू काका के मुँह में डाल दी।

"काका," उसने कहा, "पहले कुछ खा लो। भूखे आदमी की लड़ाई अधूरी होती है।"

कालू काका ने लड्डू चबाया, और उनकी आँखों में पानी के साथ हँसी भी आई।

"बेटा," उन्होंने कहा, "तू तो बड़ा रसोइया है।"

"अभी तो बस शुरुआत है," टिंकू ने कहा, और उसने डिब्बी मेरी तरफ़ बढ़ा दी। "भाई, तू भी खा। फिर मारो।"

मैंने लड्डू खाया। उसमें शक्कर कम थी और नमक ज़्यादा, पर उस वक़्त वो दुनिया की सबसे अच्छी मिठाई लगी। और मैंने टिंकू की तरफ़ देखा — वो डर रहा था, उसके हाथ काँप रहे थे, फिर भी वो मुस्कुरा रहा था। मेरा दिल भर आया।

बाहर लाठियों की आवाज़ें आ रही थीं। वो लंबा आदमी दरवाज़े पर खड़ा तमाशा देख रहा था।

"माँ," मैंने कहा, "तुम यहीं रुको। मीरा तुम्हारे साथ है।"

"मैं रुकूँगी नहीं," माँ ने कहा, और उन्होंने पीतल का ढक्कन ढाल की तरह सीने से लगा लिया। "मैं तेरे पीछे चलूँगी। और जो भी होगा, सामने से होगा।"

मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसने एक नज़र में सब समझ लिया और मेरी तरफ़ सिर हिलाया — कह रही थी, चल, मैं तैयार हूँ।

हम बाहर निकले। तीन आदमी दरवाज़े पर खड़े थे, लाठियाँ ताने। पर हमने उनसे लड़ना नहीं चुना। कालू काका आगे बढ़े और उनके सामने खड़े हो गए।

"मुझे पहचानते हो?" उन्होंने कहा। "मैं वही कालू हूँ जो बीस साल से इस अखाड़े की मिट्टी सींचता आया है। और आज मैं तुमसे कहता हूँ — रास्ता छोड़ दो।"

एक आदमी ने लाठी उठाई। कालू काका ने अपना हाथ उठाया — उसकी उँगलियों में मिट्टी लगी थी। और कुछ ऐसा हुआ जो मैंने कभी नहीं देखा।

वो आदमी रुक गया। उसने मेरी ओर देखा, फिर कालू काका की ओर, और फिर उसने अपनी लाठी नीचे कर दी।

"काका," वो बोला, "मैं आपकी इज़्ज़त करता हूँ। पर मुझे पैसे भैरव नहीं, उस आदमी ने दिए हैं।"

"तो पैसे लौटा दे," कालू काका ने कहा। "और अपनी इज़्ज़त रख ले।"

वो आदमी हट गया। बाकी दो भी हट गए। और फिर मैंने देखा — वो लंबा आदमी अब अकेला खड़ा था, और उसकी आँखों में पहली बार डर था।

"तू मुकाबले में आ जा," उसने फिर कहा, पर इस बार आवाज़ कमज़ोर थी।

"मैं आऊँगा," मैंने कहा। "पर पहले तू देख ले — जिस अखाड़े में तूने मेरी माँ को बंद किया, उसी की मिट्टी आज तेरे खिलाफ़ खड़ी है।"

वो भाग गया। उसकी लंबी परछाईं दीवार पर पड़ी और फिर गायब हो गई।

हम कुएँ की तरफ़ बढ़े। रास्ते में कालू काका मेरे पास आए और धीरे से बोले, "बेटा, उस दरवाज़े के पीछे जो है, वो मैंने कभी नहीं देखा। पर मुझे उसकी गंध पता है। वो मिट्टी की गंध नहीं है। वो किसी और चीज़ की गंध है।"

"कैसी गंध?" मैंने पूछा।

"जैसे कोई बहुत दिनों से बंद कमरे में रो रहा हो," उन्होंने कहा।

मेरे पेट में एक झटका लगा। कुएँ की सीढ़ियाँ पुरानी थीं, कुछ टूटी हुईं। कालू काका ने सीढ़ियों के पीछे की मिट्टी को अपने हाथों से हटाया। उनकी उँगलियाँ खून से लथपथ हो गईं, पर वो रुके नहीं।

और फिर दरवाज़ा दिखा। लकड़ी का, काले रंग का, ऊपर लोहे की जंग लगी कड़ी।

"ये वही है," कालू काका ने कहा। उनकी आवाज़ फूट रही थी। "बीस साल पहले मैंने इसी को देखा था और भाग गया था।"

मैंने कड़ी पकड़ी। ठंडी थी। मैंने खींचा। दरवाज़ा चरमराया, जैसे कोई बहुत दिनों बाद जागा हो।

दरवाज़ा खुलते ही अंदर से एक आवाज़ आई। धीमी, फटी हुई, जैसे किसी का गला सूखा हो।

"कौन है?"

मैं रुक गया। मेरी नाक ने कुछ कहा। मैं उस आवाज़ को पहचानता था। ये माँ की आवाज़ नहीं थी। ये तो रामदीन की आवाज़ थी।

पर रामदीन तो कुएँ में बंद था। और वो बीस साल से बंद था। तो ये आवाज़ उसकी कैसे हो सकती है?

मैंने लालटेन ऊपर उठाई और अंदर देखा। अँधेरा इतना गाढ़ा था कि लालटेन की रोशनी भी दीवार तक नहीं पहुँच रही थी।

"रामदीन काका?" मैंने कहा।

"वीर?" वो आवाज़ फिर आई, और इस बार उसमें कुछ और था। पहचान। "वीर सिंह? तू आ गया?"

"हाँ," मैंने कहा। "मैं आ गया।"

"तो सुन," उसने कहा। "जो तुझे माँ के पास ले जाने वाला रास्ता दिखाया, वो रास्ता झूठा है। तेरी माँ यहाँ नहीं है।"

मेरा खून जम गया। मैंने पीछे मुड़कर देखा। माँ मेरे पीछे खड़ी थीं, पीतल का ढक्कन सीने से लगाए।

"रामदीन काका," मैंने धीरे से कहा, "माँ मेरे साथ हैं।"

अंदर से एक लंबी चुप्पी आई। और फिर वो आवाज़ फिर बोली, और इस बार उसमें डर था।

"नहीं, बेटा। तेरे साथ वो नहीं है। तेरे साथ वो औरत है जो बीस साल से तेरी माँ की शक्ल बदलकर तेरे घर में रह रही है।"

मैंने पलटकर माँ की तरफ़ देखा। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। उनके चेहरे पर वो वही शांति थी। और उन्होंने धीरे से कहा, "बेटा, वो सच बोल रहा है।"

मेरे हाथ से लालटेन गिर गई।

लालटेन ज़मीन पर गिरी, पर बुझी नहीं। उसकी लौ काँपती रही, और उस काँपती रोशनी में मैंने अपनी माँ को देखा — जो अब भी शांत खड़ी थीं, जैसे कोई मुझसे ये उम्मीद कर रहा हो कि मैं चीखूँगा, भागूँगा, या शायद उन्हें गले लगा लूँगा।

मैंने कुछ नहीं किया। मेरे पैर जम गए थे।

"माँ?" मेरी आवाज़ निकली, पर वो मेरी नहीं लगी। "आप क्या कह रही हैं?"

उन्होंने पीतल का ढक्कन अपनी छाती से थोड़ा नीचे किया। उनकी उँगलियाँ उस पर सफ़ेद पड़ गई थीं, इतनी कसकर पकड़ा था।

"बेटा, मैं बहुत दिनों से ये बोलना चाहती थी," उन्होंने कहा। "पर हर बार डर जाती थी। डर था कि तू मुझसे दूर हो जाएगा।"

"आप मेरी माँ हैं," मैंने कहा। "आपको साबित करने की क्या ज़रूरत?"

"साबित करने की नहीं," उन्होंने धीरे से कहा। "सच कहने की।"

कालू काका मेरे पीछे खड़े थे। मैंने उनकी साँस सुनी — वो रुक-रुक कर आ रही थी, जैसे कोई बहुत दूर से दौड़कर आया हो।

"अंदर आ जाओ," रामदीन की आवाज़ फिर आई। "दरवाज़े पर खड़े रहोगे तो सब सुन लेंगे। और यहाँ दीवारों के भी कान हैं।"

हम अंदर गए। टिंकू ने मेरा हाथ पकड़ लिया। उसकी हथेली पसीने से भीगी थी, पर उसने कुछ नहीं कहा। बस पकड़े रहा।

वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।

यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।

Audio mein suno

Apni raay likho