Spirit of a Fighter – Chapter 669
उसने एक काग़ज़ उठाया।
"ये पहला है। बीस साल पहले की रात। जिस रात तेरे पापा जले थे।"
मैंने काग़ज़ लिया। उस पर दादी की लिखाई थी — काँपती, टेढ़ी, पर साफ़।
"आज रात माधव ने भैरव को बुलाया। कहा — 'शेर सिंह को खत्म करो, पर ऐसे कि कोई जान न पाए।' भैरव ने पूछा — 'क्यों?' माधव ने कहा — 'क्योंकि अखाड़ा मेरा है। मैंने इसे खून से खरीदा है। और आज शेर सिंह उस काग़ज़ पर हस्ताक्षर करने वाला है जो सब कुछ मेरे नाम कर देगा। उसे ज़िंदा नहीं रहने देना।'"
मेरे हाथ काँपने लगे। मैंने काग़ज़ मीरा को दिया। उसने पढ़ा और उसकी आँखें भर आईं।
"ये…" मीरा ने धीरे से कहा। "ये तो सबूत है। सीधा सबूत।"
दादी ने सिर हिलाया। "और ये आख़िरी काग़ज़ है। कल रात का।"
उसने ज़मीन पर पड़ा एक काग़ज़ उठाया। उस पर सिर्फ़ दो लाइनें थीं।
"माधव ने भैरव से कहा — 'कल अदालत में सब खत्म करना। वीर को फँसाना है। अगर ज़रूरत पड़े तो माँ को भी…' और फिर भैरव ने कहा — 'मैं अब तुम्हारा नहीं हूँ।'"
मैंने काग़ज़ पढ़ा। फिर दोबारा पढ़ा।
"भैरव ने मना किया," मैंने कहा। "उसने कहा कि वो अब माधव का नहीं है।"
दादी ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में कुछ था — शायद दर्द, शायद उम्मीद।
"भैरव मेरा बेटा है," उसने कहा। "मैंने उसे जन्म दिया। पर माधव ने उसे मुझसे छीन लिया जब वो छोटा था। उसने उसके कान में यही बोया — 'तेरी माँ मर गई। तेरा बाप शेर सिंह है।' और भैरव सारी ज़िंदगी यही समझता रहा।"
"पर भैरव ने तो खुद कबूल किया कि उसका असली नाम मोहन है," मीरा ने कहा। "और माधव उसका बाप है।"
दादी ने सिर हिलाया। "वो कल ही जाना। माधव ने कल मैदान में सबके सामने कहा — 'तू मेरा बेटा नहीं, तू मेरा खरीदा हुआ गुलाम है।' और भैरव टूट गया।" उसकी आवाज़ भारी हो गई। "जब वो कल रात यहाँ आया, तो बोला — 'माँ, मुझे माफ़ कर दे।'"
मेरा दिल रुक गया।
"भैरव यहाँ आया था?"
"हाँ। कल रात। वो इसी कमरे में आया। मेरे पैरों पर गिरा। उसने कहा — 'मैंने तुझे बीस साल इस कमरे में बंद देखा और कुछ नहीं किया। मैं तेरा बेटा नहीं, मैं जानवर हूँ।'"
दादी की आवाज़ रुकी। उसने आँखें पोंछीं।
"मैंने उसे गले लगाया। बीस साल बाद। और उसने रोते हुए कहा — 'माँ, मैं आज सब कुछ ठीक करूँगा।'"
कमरे में सन्नाटा छा गया। लालटेन की लौ हिली, और दीवारों पर परछाइयाँ नाचीं।
"तो भैरव ने माधव के खिलाफ़ गवाही क्यों दी?" मीरा ने पूछा। "अगर वो सब ठीक करना चाहता था, तो उसने ऐसा क्यों किया?"
दादी ने लाठी पर झुककर साँस ली।
"क्योंकि उसने सोचा था कि माधव उसे जेल भेज देगा। पर माधव सिर्फ़ अपने बेटे को बचाना चाहता था — और उसका बेटा है राघव। भैरव तो बस औज़ार था। भैरव जानता था कि अगर वो खुद नहीं टूटा, तो माधव उससे सब कुछ छीन लेगा। इसलिए उसने खुद को हारा घोषित कर दिया।"
मैंने दीवार की तरफ़ देखा। बाहर बारिश की आवाज़ आ रही थी।
"दादी," मैंने कहा, "मुझे ये सारे काग़ज़ चाहिए। अदालत में। कल।"
उसने डिब्बी मेरी तरफ़ बढ़ा दी।
"ले जा। सब ले जा।" उसने मेरा हाथ पकड़ा। उसकी पकड़ कमज़ोर थी, पर उसमें वो ज़िद थी जो मैंने माँ में देखी थी। "पर एक वादा कर। माधव को सिर्फ़ जेल मत भेजना। उसे वो सब कुछ दिखाना जो उसने बीस साल में छीना है। उसे दिखाना कि उसके ज़हर से कितनी माँएँ रोईं।"
"मैं वादा करता हूँ," मैंने कहा।
तभी दीवार की दूसरी तरफ़ से आवाज़ आई — खुरचने की आवाज़। टिंकू।
"भाई! भाई, तू अंदर है? हम पहुँच गए!"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा और मुस्कुराया।
"हाँ," मैंने ज़ोर से कहा। "हम अंदर हैं। और हमें वो मिल गया जो हम ढूँढ रहे थे।"
दीवार की दूसरी तरफ़ से खुरचना तेज़ हो गया। मैंने दादी की तरफ़ देखा।
"तुम चलोगी?" मैंने पूछा। "बाहर? बीस साल बाद?"
उसने लाठी उठाई। उसके हाथ काँप रहे थे, पर उसकी आँखों में वो चमक लौट आई थी जो शायद बीस साल से बुझी थी।
"मैं चलूँगी," उसने कहा। "पर पहले एक काम कर। मेरे पास एक चीज़ है जो तेरे पापा ने छोड़ी थी।"
उसने चारपाई के सिरहाने से एक पुरानी मिट्टी की गोली निकाली। उस पर हल्दी लगी थी और ऊपर एक छेद था।
"ये तेरे पापा ने बनाई थी। आख़िरी रात। उन्होंने इसे मेरे हाथ में दिया और कहा — 'माँ, अगर मैं न रहूँ, तो ये मेरे बेटे को देना। इसमें वो गंध है जो हर ज़हर को पहचान लेती है।'"
मैंने गोली हाथ में ली। उसे सूँघा। अंदर से एक गंध आई — तेज़, कड़वी, जानी-पहचानी। वही गंध जो भैरव के नशीले पानी में थी।
"ये…" मैंने कहा।
"हाँ," दादी ने कहा। "ये वही ज़हर है जो माधव ने बनवाया। और तेरे पापा ने इसे पहचानने की दवा बनाई। अगर कल अदालत में माधव कुछ भी कहे, तो ये गोली दिखा देना। हर आदमी पहचान जाएगा कि ये ज़हर माधव का है।"
दीवार का छेद बड़ा हो गया। टिंकू का चेहरा दिखा — मिट्टी से सना, आँखें चमकती हुईं।
"भाई, तू ठीक है?" उसने पूछा। फिर उसकी नज़र दादी पर पड़ी। "ये… ये कौन है?"
दादी ने टिंकू को देखा और मुस्कुराई।
"ये तेरा दोस्त है?" उसने मुझसे पूछा।
"हाँ," मैंने कहा। "टिंकू। मेरा सबसे अच्छा दोस्त।"
दादी ने टिंकू को पास बुलाया। उसने उसका सिर सहलाया।
"तूने मेरे बेटे का ख्याल रखा," उसने कहा। "मैंने सुना है — तू रोज़ उसे खीर खिलाता है।"
टिंकू का मुँह खुला रह गया। "आपको कैसे पता?"
"मैं बीस साल से दीवारों के पीछे हूँ," दादी ने कहा। "मैंने सब सुना है। हर बात।"
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा, फिर दादी की तरफ़। उसकी आँखों में पानी आ गया।
"तो आप मेरी दादी हैं?" उसने पूछा, जैसे किसी बच्चे ने पूछा हो।
दादी हँसीं। "नहीं, बेटा। मैं तेरी दादी नहीं हूँ। पर अगर तू मेरे बेटे का दोस्त है, तो तू मेरा भी है।"
टिंकू ने अपनी टोपी उतारी और दादी के पैर छुए। दादी ने उसे उठाया और उसका माथा चूमा।
फिर हम बाहर निकले। पहले टिंकू, फिर मीरा, फिर मैं, और आख़िर में दादी। जब वो बाहर आईं, तो बारिश रुक चुकी थी। आसमान में सुबह की पहली किरण दिख रही थी।
दादी ने आँगन में खड़े होकर गहरी साँस ली। बीस साल की बंद हवा उनके फेफड़ों से निकली।
"ये आसमान," उसने धीरे से कहा। "मैं इसे देखना भूल गई थी।"
मेरी आँखें भर आईं। मैंने उनका हाथ पकड़ा।
"अब रोज़ देखना," मैंने कहा। "रोज़ सुबह।"
तभी गाँव की तरफ़ से दौड़ते कदमों की आवाज़ आई। मैंने पलटकर देखा। लुट्टन दौड़ता हुआ आ रहा था। उसके हाथ में एक लाल चिट्ठी थी, और उसका चेहरा डर से सफ़ेद था।
"वीर भाई!" वो दूर से चिल्लाया। "वीर भाई, रुको!"
वो पास आकर हाँफने लगा। उसने लाल चिट्ठी मेरी तरफ़ बढ़ाई।
"तुम्हारे आँगन में ये पड़ी थी," उसने कहा। "और माँ… माँ नहीं हैं!"
मेरा दिल एक पल के लिए रुक गया।
"क्या मतलब माँ नहीं हैं?" मैंने उसका कंधा पकड़ा।
"मैं सुबह तुम्हारे घर गया था," लुट्टन ने हाँफते हुए कहा। "दरवाज़ा खुला था। चूल्हा जल रहा था, पर माँ नहीं थीं। और आँगन में ये लाल चिट्ठी पड़ी थी।"
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