Spirit of a Fighter668 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 668

7 min read November 5, 2026

"जो अखाड़े की मिट्टी बीस साल से सींच रहा है," मैंने धीरे से दोहराया।

मीरा ने तस्वीर मेरे हाथ से ली। उसने एक पल देखा, फिर उसकी आँखें बड़ी हो गईं।

"कालू काका," उसने कहा। "कालू काका ही रोज़ सुबह अखाड़े की मिट्टी सींचते हैं। बीस साल से।"

टिंकू ने अपनी टोपी पीछे धकेली। "पर कालू काका तो खुद डर के मारे चुप रहते हैं। वो क्या सच बताएँगे?"

मैंने तस्वीर वापस ली और उसे सीने से लगाया। तस्वीर में मेरे पापा हँस रहे थे — मिट्टी में लिपटे, पसीने से भीगे, पर आँखों में वो चमक जो मैंने सपने में भी नहीं देखी थी।

"डरा हुआ आदमी ही सबसे सच्चा गवाह होता है," मैंने कहा। "क्योंकि उसने खुद देखा है कि झूठ बोलने की कीमत क्या होती है। कालू काका ने देखा कि सच बोलने वालों का क्या हुआ — रामदीन कुएँ में बंद हुआ, मेरे पापा जल गए, रघुवीर बीस साल छुपे रहे। वो डरा इसलिए है क्योंकि उसने सब कुछ अपनी आँखों से देखा है।"

मैंने दीवार के छेद में फिर झाँका। लालटेन अब भी जल रही थी।

"अंदर वाला आदमी इंतज़ार कर रहा है," मैंने कहा। "पर ये दीवार खोदने में घंटों लगेंगे। और अगर माधव को पता चला कि हमने रास्ता ढूँढ लिया, तो वो सबूत मिटा देगा।"

मीरा ने अपना बैग खोला। उसने अंदर से एक काग़ज़ निकाला — वो काग़ज़ जिसमें रघुवीर की लिखाई थी, जो माँ ने ढक्कन में छुपाया था।

"वीर, तहखाने का रास्ता हमें पता है। नीम के पेड़ के पास पत्थरों के नीचे लोहे के छल्ले वाला रास्ता। अगर ये घर उसी तहखाने से जुड़ा है, तो शायद वो आदमी उसी तहखाने की दूसरी तरफ़ है।"

"तो हमें दोनों तरफ़ से जाना होगा," मैंने कहा। "टिंकू, तू भोलू काका के साथ नीम के पेड़ के रास्ते से जा। मैं और मीरा इस दीवार को खोदेंगे। अगर तुम पहले पहुँचे, तो शोर मत करना — बस इंतज़ार करना।"

टिंकू ने एक पल मेरी तरफ़ देखा। फिर उसने अपनी टोपी ठीक की, जैसे कोई पहलवान अखाड़े में उतरने से पहले करता है।

"भाई, एक बात कहूँ?"

"कह।"

"तू हमेशा अकेले जाना चाहता है। पर आज नहीं। आज मैं भी अंदर जाऊँगा। अगर मैं वहाँ पहुँचा और तू नहीं आया, तो मैं अकेले दीवार खोल दूँगा।" उसने अपनी कलाई दिखाई, जिस पर लाल धागा बँधा था। "माँ ने मुझे भी बाँधा था, याद है? आज सुबह, जब तू बाहर था।"

मेरा गला भर आया। मैंने उसका कंधा पकड़ा।

"ठीक है। पर सावधानी से।"

टिंकू और भोलू बारिश में निकल गए। उनके जाने के बाद मैंने फिर कड़छी उठाई और दीवार पर काम शुरू किया।

ईंट के बाद ईंट झड़ती गई। मीरा पास बैठी ईंटें हटाती रही। उसके हाथ मिट्टी से भर गए, पर उसने एक बार भी शिकायत नहीं की।

आधे घंटे बाद छेद इतना बड़ा हो गया कि मैं उसमें से गुज़र सकूँ। अंदर से आती हवा में अब साफ़ गंध थी — जली मिट्टी, पुरानी लकड़ी, और उसके ऊपर हल्की-सी हल्दी।

"मीरा," मैंने कहा। "ये गंध मैं जानता हूँ।"

"कैसी गंध?"

"वैसी जैसी मेरी माँ के हाथों से आती है। जब वो चक्की चलाती हैं और पसीना माथे पर आता है, तो उनके हाथों से यही गंध आती है।"

मीरा एक पल मेरी तरफ़ देखती रही। फिर उसने धीरे से कहा, "तो अंदर कोई औरत है?"

मेरा दिल ज़ोर से धड़का। मैंने पहले सोचा नहीं था। भोलू ने कहा था — बूढ़ी आवाज़। मैंने सोचा था कोई बूढ़ा आदमी होगा। पर ये गंध…

मैंने छेद में से आवाज़ दी — "कौन हो तुम? अंदर?"

एक पल चुप्पी। फिर आवाज़ आई।

"अंदर आ, बेटा। दीवार से बातें मत कर।"

मैंने मीरा की तरफ़ देखा। उसने सिर हिलाया।

मैं पहले छेद में घुसा। मेरे घुटने ज़मीन पर टिके, फिर पेट के बल सरका। पीछे मीरा आई। अंदर की जगह संकरी थी, पर जैसे ही मैं आगे बढ़ा, जगह खुलती गई।

मैं एक छोटे से कमरे में उतरा। छत नीची थी, फर्श मिट्टी का। कोने में लालटेन जल रही थी, और उसके सामने एक चारपाई पर कोई बैठा था।

मैंने आँखें सिकोड़ीं। लालटेन की पीली रोशनी में एक बूढ़ी औरत दिखी। सफ़ेद बाल, झुर्रीदार चेहरा, आँखें धँसी हुईं। उसने सिर पर एक फटा हुआ दुपट्टा ओढ़ा था और हाथों में लकड़ी की लाठी पकड़ी थी।

"तू आ गया," उसने कहा। उसकी आवाज़ टूटी थी, पर उसमें वो बात थी जो मैंने कहीं सुनी थी।

"कौन हो तुम?" मैंने पूछा।

वो मुस्कुराई। उसकी मुस्कान में दाँत कम बचे थे, पर आँखों में एक चमक थी जो जानी-पहचानी लगी।

"मैं वो हूँ," उसने कहा, "जिसे माधव सिंह ने बीस साल पहले इस दीवार में चुनवा दिया था। मैं वो हूँ जिसने भैरव को ज़हर बनाना नहीं सिखाया — वो मेरा बेटा था, मेरा अपना बेटा, और माधव ने उसे मुझसे छीन लिया।"

मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई। मैंने पीछे देखा। मीरा दरवाज़े के पास खड़ी थी, उसका हाथ मुँह पर था।

"तुम… तुम कौन हो?" मैंने फिर पूछा, इस बार आवाज़ काँप रही थी।

बूढ़ी औरत ने लाठी टिकाई और धीरे से खड़ी हुई। वो मेरे पास आई। उसने अपना हाथ बढ़ाया और मेरे सिर पर रखा।

"मैं शेर सिंह की माँ हूँ," उसने कहा। "तेरी दादी।"

कमरे में एक पल के लिए सब कुछ रुक गया। मुझे अपने कानों पर यक़ीन नहीं हुआ।

"मेरी दादी तो…" मैं रुक गया। मुझे याद आया — माँ ने कभी दादी के बारे में नहीं बताया था। मैंने कभी पूछा भी नहीं था। बचपन में एक बार पूछा था, तो माँ ने कहा था — "बहुत पहले चल बसीं।"

"मैं मरी नहीं थी," उसने कहा, जैसे मेरे मन की बात सुन ली हो। "माधव ने सबको बताया कि मैं मर गई। और मुझे इस कमरे में बंद कर दिया। बीस साल। इसी लालटेन के सहारे।"

मेरा गला भर आया। मैं उसके पैरों पर गिर पड़ा। मेरे हाथ उसके घुटनों को पकड़े हुए थे और मेरे कंधे काँप रहे थे।

"तुम यहाँ…" मैं बोल नहीं पा रहा था। "बीस साल… अकेली…"

उसने मेरे बालों में हाथ फेरा। उसकी उँगलियाँ ठंडी थीं, सूखी थीं, पर उनमें वो हल्दी की गंध थी।

"रो मत, बेटा। रोने का वक़्त नहीं है। मेरे पास सिर्फ़ एक रात है।"

मैंने अपनी आँखें पोंछीं और ऊपर देखा।

"क्यों? तुम बीमार हो?"

वो हँसी। उसकी हँसी सूखी थी, जैसे पुराने पत्ते।

"बीमार नहीं। माधव ने मुझे बीस साल तक खाना दिया — सिर्फ़ इतना कि मैं ज़िंदा रहूँ। पर कल रात उसने आख़िरी बार आकर कहा — 'अब तेरा काम खत्म। कल के बाद तुझे कोई खाना नहीं मिलेगा।'"

मीरा ने कदम बढ़ाया। "क्यों? उसे क्यों खत्म करना है?"

दादी ने मीरा की तरफ़ देखा। उनकी आँखें सिकुड़ीं।

"ये कौन है?" उन्होंने मुझसे पूछा।

"मीरा," मैंने कहा। "वो… मेरी…"

"मैं उसकी साथी हूँ," मीरा ने खुद कहा। "हम सच की लड़ाई लड़ रहे हैं। और अब आप भी हमारे साथ हैं।"

दादी ने मीरा को ऊपर से नीचे देखा। फिर वो मुस्कुराई — इस बार सच में।

"हिम्मत है लड़की में," उसने कहा। "शेर सिंह की बहू जैसी।"

मीरा के गाल लाल हो गए। मैंने नज़र चुराई।

"दादी," मैंने कहा, "माधव क्यों तुम्हें खत्म करना चाहता है? तुम्हारे पास क्या है?"

दादी ने लाठी उठाई और चारपाई के नीचे से एक पुरानी लोहे की डिब्बी निकाली। उसकी चाबी उसने अपने गले के माला में छुपा रखी थी। उसने डिब्बी खोली।

अंदर काग़ज़ों का ढेर था। पीले, भूरे, कुछ जले हुए किनारों वाले।

"बीस साल," उसने कहा। "माधव हर महीने आता था। मुझसे पूछता था — 'बता, शेर सिंह ने अपना हिसाब कहाँ छुपाया है?' और मैं हर बार चुप रहती थी। पर मैं भी चुप नहीं बैठी। जब वो जाता, मैं दीवार की दरारों से उसकी बातें सुनती। जो सुनती, काग़ज़ पर लिख लेती। रात में, इसी लालटेन के सहारे।"

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