Spirit of a Fighter – Chapter 619
बाबा हरिदास ने अपना सिर ऊपर उठाया और वो पहली बार सीधे मेरी तरफ़ मुड़े — पूरे शरीर से, जैसे एक शेर अपना मुँह घुमाता है।
"दो नहीं," उन्होंने कहा। "तीन हैं।"
मैं ठिठका।
"तीन?"
"माधव के पास एक और काग़ज़ है," बाबा हरिदास ने कहा। "बीस साल से उसकी जेब में है। और वो काग़ज़ किसी की मौत का नहीं, किसी की ज़िंदगी का है।"
"किसकी?"
बाबा हरिदास ने अपनी सफ़ेद आँखें मुझ पर टिका दीं।
"तेरे बाप का," उन्होंने कहा। "शेर सिंह का जन्म काग़ज़।"
मेरा सिर घूम गया।
"पर वो तो मर गए —"
"मरा हुआ आदमी जन्म काग़ज़ में नहीं रहता," बाबा ने कहा। उनकी आवाज़ अब धीमी नहीं थी। वो साफ़ थी, हड्डी की तरह साफ़। "मैंने बीस साल सोचा कि शेर सिंह मर गया। रजिस्टर में लिखा है, गाँव में कहा गया, मंदिर में उसका नाम चढ़ाया गया। पर आज रात जब मैंने कुएँ के पास वो आवाज़ सुनी, मुझे एक बात याद आई जो मैं बीस साल से भूला हुआ था।"
"क्या?"
"शेर सिंह के मरने के बाद माधव ने उसका जन्म काग़ज़ जलाया नहीं।" बाबा ने अपनी लाठी ज़मीन पर टिकाई, और उसकी ठक-ठक आँगन में गूँजी। "उसने उसे अपनी जेब में रख लिया। जो आदमी मरा है, उसका काग़ज़ क्यों रखता कोई? काग़ज़ तो उसका रखा जाता है जो ज़िंदा हो, और जिसकी ज़िंदगी का इस्तेमाल होना हो।"
मीरा खड़ी हो गई। उसकी कॉपी हाथ से छूटकर ज़मीन पर गिरी, और वो उसे उठाना भूल गई।
"बाबा," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में पहली बार काँप था, "आप कह रहे हैं कि शेर सिंह आज भी ज़िंदा हो सकते हैं?"
बाबा हरिदास ने अपना सिर हिलाया। धीरे-धीरे, पर साफ़।
"मैं नहीं कह रहा कि वो ज़िंदा है," उन्होंने कहा। "मैं कह रहा हूँ कि मुझे कोई उसकी लाश नहीं दिखी। मैंने सिर्फ़ उसका जला हुआ कमरा देखा था। और आज रात उसकी आवाज़ कुएँ के पास से आई।"
मैं उठ खड़ा हुआ। मेरे हाथ काँप रहे थे, और इस बार मैंने उन्हें छिपाया नहीं। मीरा ने कहा था — काँपना ठीक है।
"माँ," मैंने कहा। मेरी आवाज़ फट गई। "आपने कभी सोचा कि पापा—"
माँ ने अपना हाथ उठाकर मुझे रोक दिया। वो चूल्हे के पास से उठीं, और उनकी आँखें लाल थीं, पर उनका चेहरा पत्थर था।
"बीस साल से मैंने एक बात अपने अंदर दबाकर रखी है," उन्होंने कहा। "मैंने कभी किसी को नहीं बताया।" उन्होंने बाबा हरिदास की तरफ़ देखा। "भैया, उस रात जब शेर सिंह मरा, तो उसकी लाश मैंने देखी थी।"
बाबा हरिदास ने अपना सिर उठाया। उनके होंठ खुले रह गए।
"तूने लाश देखी थी?" उन्होंने धीरे से कहा।
"हाँ।" माँ की आवाज़ में कोई भावना नहीं थी। "उसका चेहरा जला नहीं था। सिर्फ़ सीना जला था। और उसके हाथ में पीतल की डिबिया थी — वही डिबिया जो आज वीर की जेब में है।"
मेरा हाथ अपने आप जेब पर गया।
"तो वो मरा था?" मैंने पूछा। मेरी आवाज़ बच्चे जैसी निकली।
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में कुछ था जो मैंने कभी नहीं देखा था — बीस साल का एक सवाल, जो अब बाहर आ रहा था।
"मैंने उसका चेहरा देखा था," उन्होंने कहा। "पर आँखें बंद थीं। मैंने कभी उन्हें खोलकर नहीं देखा।"
सन्नाटा।
"माँ," मैंने धीरे से कहा, "आप कह रही हैं कि—"
"मैं कुछ नहीं कह रही," माँ ने कहा, और उनकी आवाज़ पहली बार टूटी। "मैं बस इतना कह रही हूँ कि मुझे भी कुछ नहीं पता। बीस साल से मैं उस आदमी की याद में जल रही हूँ जो शायद मेरे सामने मरा पड़ा था, और शायद नहीं था।"
बाबा हरिदास ने अपनी लाठी ज़मीन पर पटकी। "तो अब सिर्फ़ एक रास्ता है," उन्होंने कहा। "सुबह पंचायत में हम माधव से वो जन्म काग़ज़ माँगेंगे। अगर उसने जलाया, तो राख दिखाए। और अगर नहीं जला, तो हम काग़ज़ देखेंगे। और उस काग़ज़ पर जो तारीख़ है, वो हमें बताएगी कि शेर सिंह आख़िरी बार कब ज़िंदा गिना गया था।"
मैंने पीतल की डिबिया जेब से निकाली। मैंने उसे खोला। उसमें लाल धागा था, हल्दी थी, और मेरे पापा की लिखी हुई एक पीली चिट्ठी थी।
मैंने चिट्ठी खोली। मैंने उसे सुबह पढ़ा था, सुरंग में। पर अब मैंने उसे फिर पढ़ा, और इस बार मेरी आँखें उस आख़िरी लाइन पर अटक गईं जो मैंने पहले नहीं देखी थी।
पापा की लिखाई में नीचे, कोने में, छोटे अक्षरों में लिखा था:
"मैं मरा नहीं। मैं बदल गया। — तेरा बाप"
मेरे हाथ से चिट्ठी फिसल गई।
टिंकू ने उसे हवा में ही पकड़ लिया। वो उसे पढ़ नहीं सकता था — उसकी पढ़ाई कम थी — पर उसने मेरा चेहरा देखा और उसकी आँखें भर आईं।
"वीर," उसने कहा, "क्या लिखा है?"
मैंने कोई जवाब नहीं दिया। मैं बाबा हरिदास की तरफ़ देख रहा था। वो बैठे थे, अपनी लाठी पकड़े, और उनकी सफ़ेद आँखों में वो सब था जो मैं शब्दों में नहीं कह सकता था।
"बाबा," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ इतनी धीमी थी कि मुझे खुद सुनाई नहीं दिया। "मेरे पापा नहीं मरे।"
बाबा हरिदास ने अपना सिर हिलाया।
"मुझे पता है," उन्होंने कहा। "मुझे आज रात पता चला।"
"तो वो कहाँ है?"
बाबा हरिदास ने अपनी लाठी उठाई और उसे मेरी तरफ़ बढ़ाया। उसकी नोक मेरे सीने के ठीक सामने थी, और वो काँप रही थी।
"ये सवाल सुबह पंचायत में पूछना," उन्होंने कहा। "पर एक बात याद रखना। जो आदमी बीस साल से अपने बेटे की नज़रों से दूर रहा, वो अपनी मर्ज़ी से दूर नहीं रहा। उसे दूर रखा गया। और जिसने उसे दूर रखा, वो आज भी गाँव में है।"
मीरा ने मेरा हाथ पकड़ा। उसकी उँगलियाँ ठंडी थीं, पर उनमें ज़ोर था।
"वीर," उसने कहा, "सुबह पंचायत में माधव सिंह तेरे पापा का काग़ज़ दिखाएगा। वो उसे इसलिए दिखाएगा कि सब सोचें — देखो, बेटा बाप जैसा ही है। पर वो नहीं जानता कि वीर के हाथ में क्या है।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"क्या है मेरे हाथ में?"
मीरा ने मेरी हथेली खोली और उसमें पीली चिट्ठी रख दी।
"एक ज़िंदा आदमी की लिखाई," उसने कहा। "बीस साल पहले की लिखाई, जो कहे कि वो मरा नहीं। और जो आदमी मरा नहीं, उसका जन्म काग़ज़ किसी और की जेब में क्यों है?"
मैंने चिट्ठी को अपनी छाती से लगाया।
बाहर आँगन में हवा चली, और दीया हिला। माँ ने उसे हाथ से बचाया, और उनकी उँगली आग में लग गई। उन्होंने झटके से हाथ पीछे किया, पर कुछ नहीं बोलीं।
"माँ," मैंने कहा, "आपका हाथ जल गया।"
"जलने दो," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ में वो आग थी जो चूल्हे में नहीं, उनकी छाती में जल रही थी। "बीस साल से ये हाथ ठंडे थे। अब जलेंगे, तो पता चलेगा कि हम ज़िंदा हैं।"
टिंकू ने अपनी डिब्बी से एक और लड्डू निकाला और उसे बाबा हरिदास की तरफ़ बढ़ाया। "आपको रोज़ आना चाहिए," उसने कहा। "मेरी मिठाई अच्छी है ना?"
बाबा हरिदास ने लड्डू पकड़ा और उनके होंठों पर पहली बार कुछ ऐसा आया जो मुस्कान जैसा था।
"बहुत अच्छी है," उन्होंने कहा। "पर तू जानता है, मैंने बीस साल से मिठाई नहीं खाई।"
"अब खाइए," टिंकू ने कहा। "अब रोज़ खाइए। हम रोज़ आएँगे।"
मैं आँगन के बीच में खड़ा था, और मेरे हाथ में पीली चिट्ठी थी, और मेरे सीने में एक ऐसा सवाल धड़क रहा था जो बीस साल से सो रहा था।
अगर पापा ज़िंदा हैं, तो उन्होंने मुझसे मिलने क्यों नहीं आए?
अगर वो ज़िंदा हैं, तो उन्होंने माँ को अकेले क्यों छोड़ा?
और सबसे बड़ा सवाल — अगर वो ज़िंदा हैं, तो आज रात उन्होंने बाबा हरिदास से ये क्यों कहा — "अब भी वक़्त है"?
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno