Spirit of a Fighter618 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 618

7 min read November 5, 2026

"हाँ।" बाबा की आवाज़ में पहली बार कुछ तेज़ हुआ। "क्योंकि माधव ने उसकी अखाड़े से ज़मीन छीन ली थी, उसका नाम मिटा दिया था, और उसकी औरत को —" वो रुके। उन्होंने अपना मुँह बंद कर लिया।

माँ ने चूल्हे की तरफ़ देखा, और उनका चेहरा आग की रोशनी में लाल हो गया।

"मेरी तरफ़ इशारा मत करो, भैया," माँ ने कहा। उनकी आवाज़ शांत थी, पर उसमें वो ठंडक थी जो सिर्फ़ बहुत ज़्यादा गुस्से से आती है। "जो हुआ, हुआ। अब बच्चा सुन रहा है। साफ़ बोलो।"

बाबा ने गहरी साँस ली।

"शेर सिंह उस रात माधव के घर गया। बोतल जेब में थी। पर माधव उससे चालाक निकला। उसने शेर सिंह को पहले ही पीला दिया था।" बाबा ने अपना सिर नीचा किया। "शेर सिंह लौटकर मेरे पास आया। उसके हाथ काँप रहे थे। उसने कहा — भाई, मैंने उसकी बोतल से पी लिया। मुझे पता नहीं था। माधव ने मुझे अपने हाथ से पिलाया, ये कहकर कि ये ताकत की दवा है।"

आँगन में टिंकू की साँस सुनाई दी। वो अपनी डिब्बी से चिपका बैठा था, और उसकी आँखें बड़ी थीं।

"फिर?" मैंने कहा। मेरी आवाज़ मुझे पराई लगी।

"फिर मैंने उसे बचाने की कोशिश की। तीन रात। तहखाने की मिट्टी, जड़, हल्दी, गाय का घी — जो जानता था, सब लगाया। पर ज़हर उसकी हड्डियों में उतर चुका था।" बाबा ने अपना हाथ उठाया, और उसे हवा में रोक दिया। "वो मरते वक़्त मेरा हाथ पकड़े था। उसने कहा — भाई, मेरी औरत को मत बताना कि मैंने पिया था। उसे लगेगा मैंने उसे बचाने के लिए नहीं, अपनी इज़्ज़त के लिए पिया था। उसे यही लगेगा कि मैंने उसका सुहाग खुद अपने हाथ से जलाया।"

माँ के हाथ से प्याला छूटा। वो चूल्हे के पास बैठी रहीं, और उनकी आँखों से पानी चूल्हे की आग में गिरा, और आग ने चटक कर जवाब दिया।

"तो बीस साल से मुझे ये कहा गया," माँ ने धीरे से कहा, "कि मेरे हाथ से मेरे पति को ज़हर गया। और तुम्हें पता था कि ऐसा नहीं था?"

"मुझे पता था," बाबा ने कहा। "और मैं बोल नहीं सका।"

"क्यों?"

"क्योंकि मैंने एक बार बोलने की कोशिश की थी।" बाबा ने अपना सिर उठाया, और उनकी आवाज़ में पहली बार कुछ ऐसा आया जो डर नहीं था — हड्डी में बैठी ठंड थी। "शेर सिंह के जाने के तीसरे दिन मैं पंचायत में जाने वाला था। मैंने काग़ज़ लिख लिया था। मैंने माधव का नाम लिखा था। उस रात मेरे घर में आग लगी। मेरी औरत थी, मेरा बेटा था — दोनों सो रहे थे।"

मीरा की कलम रुक गई।

"मेरी औरत बच गई," बाबा ने कहा। "पर मेरा बेटा नहीं बचा। वो सात साल का था। और आग के बाद माधव ने गाँव में कहलवाया — देखा, बाबा हरिदास का दीया ही उलट गया, उसके हाथ में कोई दोष नहीं।" उन्होंने अपना सूखा हाथ मेरी तरफ़ बढ़ाया। "उस रात मैंने अपनी आँखें बंद कर लीं, वीर सिंह। मैंने खुद बंद कीं। क्योंकि जो आग मैंने देखी, वो मैं हर रात देखता था।"

मैंने उनकी तरफ़ देखा। सफ़ेद परदा उनकी आँखों पर पड़ा था, और परदे के नीचे से एक पतली सी लकीर पानी की निकलकर दाढ़ी में गिर रही थी।

"ये परदा," मैंने धीरे से कहा। "आपने बाँधा है?"

"मैंने बाँधा है।"

"क्यों?"

"क्योंकि जब मैंने आँखें बंद कीं, तो वो बंद नहीं हुईं।" उन्होंने अपना हाथ परदे पर रखा। "डर लगता था कि कोई मुझे देख रहा है। परदा बाँधने के बाद लगा कि अब कोई नहीं देख सकता।"

मीरा ने अपनी कॉपी बंद कर दी। उसने अपना हाथ बाबा के घुटने पर रखा — ऐसे, जैसे कोई डॉक्टर मरीज़ को देखता है।

"बाबा," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो लहजा था जो मैंने पहले कभी नहीं सुना — न सख़्त, न नरम, बस सीधा। "अब आप अपनी आँखें खोलिए।"

बाबा हरिदास ने अपना सिर उठाया।

"नहीं," उन्होंने कहा।

"बाबा।"

"मैं नहीं खोलूँगा।"

मीरा उठी। वो उनके सामने घुटनों के बल बैठ गई। उसने अपना हाथ बढ़ाया और परदे के उस गाँठ को छुआ।

"मैं डॉक्टर हूँ," उसने कहा। "मुझे देखने दीजिए।"

बाबा हरिदास काँपे। उनका पूरा शरीर काँपा, जैसे सूखा पेड़ हवा में। फिर उन्होंने धीरे से अपना सिर झुकाया।

मीरा ने गाँठ खोली। परदा खिसका।

मैंने अपनी साँस रोक ली।

उनकी आँखें सफ़ेद थीं। पुतली नहीं थी, बस धुँधला सफ़ेद, जैसे बरसात के बाद नहर का पानी जब उसमें मिट्टी घुल जाए। आँखों के किनारों पर सूखे आँसुओं की लकीरें जमी थीं, जैसे पुरानी दीवार पर नमक।

"मैंने इन्हें बंद नहीं किया," बाबा हरिदास ने कहा। उनकी आवाज़ फूट रही थी। "इन्होंने मुझे बंद कर दिया।"

माँ ने अपना मुँह हाथों से ढक लिया। और मैंने पहली बार देखा कि माँ की आँखों में सिर्फ़ गुस्सा नहीं था — उस बूढ़े के लिए करुणा थी, और यही सबसे ज़्यादा चुभा।

टिंकू उठा। वो अपनी डिब्बी उठाकर बाबा के पास गया और उसने उनके हाथ में एक लड्डू रख दिया।

"ये मीठा है," टिंकू ने कहा, और उसकी आवाज़ भर्रा गई। "आप खाइए। मेरी माँ कहती है कि जो रोता है, उसे मीठा खिलाना चाहिए।"

बाबा हरिदास ने लड्डू पकड़ा। उन्होंने उसे सूँघा, और फिर मुँह में रखा, और उनकी सफ़ेद आँखों से पानी बहता रहा।

मैं उठा। मेरे घुटने सुन्न हो गए थे।

"बाबा," मैंने कहा, "एक बात और पूछनी है। आपने कहा कि आप तहखाने में बंद हैं। बीस साल से। किसने बंद किया?"

बाबा हरिदास ने लड्डू निगला। उन्होंने अपना सिर हिलाया।

"मैंने खुद को बंद किया," उन्होंने कहा। "आग के बाद मैं सुरंग से नीचे उतर गया और मैंने ऊपर का ढक्कन अंदर से बंद कर लिया। मैंने सोचा — जब तक माधव ज़िंदा है, मैं ऊपर नहीं आऊँगा।"

"तो आप बाहर क्यों आए आज?"

बाबा हरिदास ने अपनी सफ़ेद आँखें मेरी तरफ़ उठाईं। मुझे लगा कि वो मुझे देख नहीं रहे, पर देख रहे थे — किसी और तरीके से।

"क्योंकि कल रात कुएँ में आवाज़ आई," उन्होंने कहा। "और वो आवाज़ मेरे बेटे की थी।"

मेरी रीढ़ में ठंडी हवा दौड़ गई।

"आपका बेटा तो —"

"मेरा बेटा जला था," बाबा ने कहा। "पर आवाज़ उसकी थी। मैंने उसे बीस साल बाद सुना। वो कुएँ में नहीं था — वो कुएँ के पास से गुज़रा था, और उसने मेरा नाम लिया। उसने कहा — बाबा, अब भी वक़्त है।"

मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो सवाल था जो मेरे मन में भी था।

"बाबा," मीरा ने कहा, "आपका बेटा जला था। ये आपने खुद कहा। फिर आवाज़ कैसे?"

बाबा हरिदास ने अपना सिर झुकाया। उनके होंठ हिले, और फिर उन्होंने कुछ ऐसा कहा जो मेरे पैरों के नीचे से ज़मीन खींच ले गया।

"मैंने कभी उसे जलते नहीं देखा," उन्होंने कहा। "मैंने सिर्फ़ आग देखी थी। मैंने सोचा — जो कमरे में था, वो जल गया। पर मैंने उसे देखा नहीं। मैंने उसकी हड्डी नहीं देखी। मैंने उसका कुछ नहीं देखा। मैंने सिर्फ़ मान लिया।"

आँगन में सन्नाटा इतना गहरा हो गया कि मुझे अपने दिल की धड़कन सुनाई दी।

"मतलब," मैंने धीरे से कहा, "वो ज़िंदा हो सकता है?"

बाबा हरिदास ने अपना सिर उठाया। उनकी सफ़ेद आँखों में कुछ था। कुछ जो बीस साल से सूखा पड़ा था और अब फिर गीला हो रहा था।

"यही सवाल बीस साल से मेरे अंदर ज़िंदा है," उन्होंने कहा। "पर आज रात मैंने उसकी आवाज़ सुनी। वो बड़ा हो गया था। वो आदमी की आवाज़ थी।" उन्होंने लाठी को कसकर पकड़ा। "और उसने मुझे नाम से बुलाया। बीस साल में किसी ने मुझे उस आवाज़ में नहीं बुलाया।"

मैंने अपना हाथ पीतल की डिबिया पर रखा। वो जेब में थी, और गर्म थी, जैसे अंदर कोई दीया जल रहा हो।

"बाबा," मैंने कहा, "माधव सिंह के पास दो काग़ज़ हैं। एक मेरे पापा का, एक उसका। सुबह पंचायत में वो उन्हें दिखाएगा।"

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