Spirit of a Fighter – Chapter 616
"मैंने उसे ज़हर बनाना सिखाया," बूढ़े ने कहा, "ताकि वो ज़हर को पहचान सके। ज़हर बनाना सीखे बिना ज़हर को पहचानना नामुमकिन है। शेर सिंह नहीं जानता था कि उसके ही हाथों से ज़हर उसे पिलाया जाएगा।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। "और तूने माधव को क्यों सिखाया?"
बूढ़े की आँखें मेरी आँखों में आ गईं। और उनमें जो था, वो मैंने पहले कभी किसी की आँखों में नहीं देखा था — पछतावा। बहुत गहरा, बहुत पुराना पछतावा।
"मैंने माधव को नहीं सिखाया," उसने कहा। "मैंने रघुवीर को सिखाया। और रघुवीर ने माधव को सिखाया। मेरी गलती यही थी — मैंने अपने सबसे होशियार शागिर्द को सिखाया, और वो मेरे ही पीछे पड़ गया।"
"रघुवीर?" मैंने कहा। "मेरा बड़ा भाई?"
"हाँ," बूढ़े ने कहा। "तेरा बड़ा भाई। जिसे मैंने अपने हाथों से तहखाने में दफ़न किया।"
मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई। मैंने दीवार का सहारा लिया।
"तूने… तूने उसे मारा?"
"मैंने उसे नहीं मारा," बूढ़े ने कहा। "मैंने उसे बचाया था। पर वो बच नहीं सका।"
उसने अपनी आँखें बंद कीं, और कुछ पल चुप रहा। उसकी साँस धीमी थी, जैसे हर शब्द उसके अंदर से निकलते वक़्त उसका कुछ ले रहा हो।
"रघुवीर जानता था कि माधव क्या कर रहा है," उसने कहा। "उसने माधव को रोकने की कोशिश की। पर माधव ने उसे उसी ज़हर से पिलाया जो रघुवीर ने खुद बनाया था। और जब रघुवीर मरने लगा, तो उसने मुझे बुलाया। उसने कहा — बाबा, मेरे भाई को बचा लो।"
मेरी आँखों में पानी आ गया। मैंने उसे पोंछा नहीं। मैंने उसे बहने दिया।
"और तूने बचाया?" मीरा ने पूछा। उसकी आवाज़ नरम हो गई थी।
"मैंने कोशिश की," बूढ़े ने कहा। "रघुवीर की आख़िरी साँस में जो ज़हर था, वो मैंने अपने अंदर लिया। और उसी दिन से मैं यहाँ हूँ। इस चटाई पर। बीस साल से।"
वो रुका। उसकी आँखें खुलीं और मेरी तरफ़ देखने लगीं।
"मैं बाहर नहीं जा सकता," उसने कहा। "मेरा शरीर उस ज़हर से बना है। अगर मैं धूप में जाऊँगा, तो जल जाऊँगा।"
मैंने अपना हाथ उसकी तरफ़ बढ़ाया। मैं नहीं जानता क्यों। मैं बस उसे छूना चाहता था — ये देखना चाहता था कि वो असली है या मैं सपना देख रहा हूँ।
उसने मेरा हाथ पकड़ लिया।
उसकी उँगलियाँ ठंडी नहीं थीं। वो गर्म थीं — बहुत गर्म, जैसे किसी को बुखार हो।
"तेरे पापा की आँखें मेरी आँखों जैसी हैं," उसने कहा। "क्योंकि मैं उनका भाई हूँ।"
मैंने अपना हाथ खींच लिया। "क्या?"
"शेर सिंह और मैं — हम दोनों एक ही माँ के बेटे थे," उसने कहा। "पर हमारी माँ ने हमें अलग-अलग रखा। मुझे जंगल में भेज दिया, और शेर सिंह को अखाड़े में। वो चाहती थी कि एक पहलवान बने, और एक ज़हर बनाने वाला। ताकि कोई भी अकेला न बचे।"
मेरा सिर घूमने लगा।
"तो तू मेरे… तू मेरे चाचा है?"
उसने अपना सिर हिलाया।
"हाँ," उसने कहा। "और तेरी माँ जानती है।"
मैंने पीछे देखा। मीरा मेरे पीछे खड़ी थी, और उसके हाथ मुँह पर थे। टिंकू ज़मीन पर बैठा था, उसकी डिब्बी उसके सामने थी, और वो हड्डियों को देख रहा था, पर अब उसकी आँखों में डर नहीं था — सिर्फ़ सवाल।
दीनू ने अपनी लालटेन नीचे रखी और बूढ़े के पास जाकर बैठ गया।
"बाबा," उसने कहा। "अब बताओ। अब सब बताओ।"
बूढ़े ने दीनू की तरफ़ देखा। उसकी आँखों में कुछ पिघला।
"तू बड़ा हो गया, दीनू," उसने कहा। "तू उस दिन से डरता रहा जिस दिन तूने मुझे ज़हर पीते देखा था।"
दीनू ने अपना सिर झुका लिया।
"अब बताओ," दीनू ने कहा। "जो मैंने बीस साल दबाकर रखा है।"
बूढ़े ने एक लंबी साँस ली। और फिर उसने अपनी पीतल की डिबिया खोली।
उसके अंदर से एक काग़ज़ निकला। पीला, मुड़ा हुआ, जिस पर मिट्टी की धूल जमी थी।
"ये तेरे पापा की लिखाई है," उसने कहा, और मेरी तरफ़ बढ़ा दिया।
मैंने उसे पकड़ा। काग़ज़ इतना कमज़ोर था कि डर लगा कि हाथ में ही न गल जाए।
"पढ़," बूढ़े ने कहा।
मैंने पढ़ा।
"मैं शेर सिंह, अपने बेटे के नाम एक बात लिखकर छोड़ रहा हूँ। जिस दिन तू ये पढ़े, मैं नहीं रहूँगा। पर तुझे एक बात पता होनी चाहिए — तेरा बाप मरा नहीं है। तेरा बाप तेरे अंदर है। और जब तू अखाड़े की मिट्टी में खड़ा हो, तो वहाँ मैं भी खड़ा होऊँगा। पता नहीं तुझे किसने पहलवानी सिखाई, पर मैं तुझे ये सिखाकर जा रहा हूँ कि असली पहलवान वो है जो अपनी मिट्टी को जानता है। और तू जानता है। तुझे सिर्फ़ याद दिलाना है।"
मेरी आँखों से पानी बह रहा था। मैं उसे रोक नहीं पा रहा था।
"आगे पढ़," बूढ़े ने कहा।
मैंने आगे पढ़ा।
"और एक बात — तेरा बाप तुझे जानता है। जिस दिन तू पैदा हुआ, उस दिन मैंने तेरे हाथ में मिट्टी की एक गोली रखी थी, और तूने उसे अपने मुँह में डाल लिया था। तब मैंने सोचा — ये बच्चा इसी मिट्टी का है। ये किसी और का नहीं। मेरा।"
मैंने काग़ज़ नीचे किया।
"ये… ये कब लिखा?"
"उस रात," बूढ़े ने कहा। "जिस रात उसे ज़हर दिया गया था। उसे पता था कि वो मर रहा है। उसने ये लिखा, और मुझे दे दिया।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। "और तूने मुझे अब तक क्यों नहीं दिया?"
बूढ़े ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में अब भी वही पछतावा था।
"क्योंकि मैं डरता था," उसने कहा। "अगर मैं तुझे ये देता, तो तू सीधा माधव के पास जाता। और माधव तुझे भी उसी रास्ते भेज देता जिस रास्ते से तेरे पापा और रघुवीर गए।"
"फिर अब क्यों दिया?" मीरा ने पूछा।
बूढ़े ने उसकी तरफ़ देखा। "क्योंकि अब माधव सिंह की हवा निकल गई है," उसने कहा। "और क्योंकि अब वीर के पास वो चीज़ है जो माधव के पास नहीं थी।"
"क्या?" मैंने पूछा।
"तू," उसने कहा। "तू खुद। तू माधव जैसा नहीं है। तू अपनी मिट्टी का है। और तेरे साथ ये लड़की है — जो सबूत माँगती है। और ये रसोइया — जो मरने से पहले भी मिठाई देता है। और ये बूढ़ा दीनू — जिसने बीस साल मेरी गंध पहचानी और किसी को नहीं बताया।"
वो रुका। उसकी साँस भारी हो गई थी।
"अब जा," उसने कहा। "जा और वो कर जो मैं नहीं कर सका। माधव को उसी ज़मीन में गाड़ दे जिसमें उसने इतने बेटे गाड़ दिए।"
मैं उठा। मेरे पैर काँप रहे थे, पर मैं उठा।
"एक बात और," बूढ़े ने कहा। उसकी आवाज़ अब धीमी थी, जैसे ज़ोर खत्म हो रहा हो। "तेरी माँ को बता देना — मैंने उसकी हल्दी वापस नहीं भेजी। मैंने उसकी हल्दी अपने पास रखी। बीस साल से मेरे तकिये के नीचे है।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"क्यों?"
बूढ़े ने कुछ कहा, पर उसकी आवाज़ इतनी धीमी थी कि सुनाई नहीं दिया। मैं उसके करीब झुका।
"क्योंकि वो मेरी भाभी है," उसने फुसफुसाया। "और मैं उसे बीस साल से बचा रहा हूँ। अब जा।"
मैं उठा और सुरंग की तरफ़ बढ़ा। मीरा मेरे साथ थी। टिंकू अपनी डिब्बी उठा रहा था — उसने हड्डियों से दूर रखकर।
दीनू ने बूढ़े के पैर छुए। "बाबा," उसने कहा, "मैं वापस आऊँगा।"
"तू आएगा," बूढ़े ने कहा। "पर अगली बार मेरे पास रोटी लेकर आना। तेरी बहू की बनाई हुई। मुझे बीस साल से घर की रोटी नहीं मिली।"
दीनू हँसा। उसकी आँखों में पानी था।
हम सुरंग से ऊपर आए। चाँद बादलों से बाहर आ गया था, और नीम के पेड़ की पत्तियाँ चाँदनी में चमक रही थीं।
मैंने अपना हाथ देखा। उसमें पीला काग़ज़ था।
"वीर," मीरा ने कहा। उसकी आवाज़ धीमी थी। "अब क्या?"
मैंने काग़ज़ को अपनी छाती से लगाया।
"अब वो करेंगे," मैंने कहा, "जो बीस साल से कोई नहीं कर सका।"
"क्या?"
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