Spirit of a Fighter – Chapter 615
चमेली। हल्दी। और उसके नीचे, बहुत गहरे में, कुछ और — जैसे बरसों पुरानी मिट्टी पर पहली बारिश पड़ी हो।
ये गंध गाँव की किसी भी औरत से नहीं आ रही थी। ये गंध भीतर से आ रही थी, दीवार के पीछे से, पत्थरों के नीचे से, उस कमरे से जो अभी तक किसी ने नहीं देखा था।
"दीनू चाचा," मैंने कहा, "ये गंध मेरी माँ के आँचल से आती है।"
दीनू ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखें झुक गईं, जैसे कोई बात वो जानता है पर कह नहीं सकता।
"मुझे पता है," उसने धीरे से कहा। "वो बूढ़ा… वो हर उस औरत के हाथ से हल्दी लेता है जो इस अखाड़े में ज़िंदा बची है।"
मैं उसकी तरफ़ घूमा। "क्यों?"
"क्योंकि वो उनकी गंध से जानता है कि वो कहाँ जाती हैं, क्या खाती हैं, किसके लिए रोती हैं," दीनू ने कहा। "वो बीस साल से इसी तरह गाँव को जानता है। और वो हल्दी… वो सिर्फ़ हल्दी नहीं है। उसमें वो मिलाता है जो उसे बताता है कि कोई उसके खिलाफ़ सोच भी रहा है या नहीं।"
मेरी मुट्ठी अपने आप बंद हो गई।
"तो मेरी माँ…"
"तेरी माँ ने बीस साल उसकी हल्दी वापस भेजी," दीनू ने कहा। "हर बार एक चुटकी। और यही उसका सबसे बड़ा बदला था।"
मीरा ने मेरा हाथ पकड़ लिया। उसकी उँगलियाँ ठंडी थीं, पर उनमें जो ज़ोर था, वो मुझे सीधा खींच रहा था — वापस, अपने आप में।
"वीर," उसने कहा। "सुन।"
मैंने अपनी साँस रोकी।
नीचे से आवाज़ आ रही थी। नहीं, आवाज़ नहीं — खुरचने की आवाज़। जैसे कोई पत्थर पर पत्थर रगड़ रहा हो। धीमी, बराबर, जैसे कोई बहुत बूढ़ा आदमी अपने नाखूनों से ज़मीन खुरच रहा हो।
दीनू ने अपनी लालटेन ऊपर उठाई। "अब चलो," उसने कहा। "अब हम वहाँ पहुँच चुके हैं जहाँ से वापसी नहीं होती।"
मैंने सामने देखा।
सुरंग का रास्ता जो अब तक सीधा था, वो अचानक मुड़ गया था। और मोड़ के बाद, दीवार में, एक छोटा-सा दरवाज़ा था। पत्थर का, घास से ढका, जिस पर वही साँप बना था — पर इस बार साँप के फन के नीचे कुछ लिखा था।
मीरा ने करीब जाकर पढ़ा।
"ये संस्कृत नहीं है," उसने कहा। "ये… ये तो गाँव की बोली है।"
"क्या लिखा है?" मैंने पूछा।
"जो भीतर आता है, वो अपना नाम छोड़कर आता है," मीरा ने धीरे से पढ़ा। "और जो अपना नाम छोड़ देता है, वो वापस नाम नहीं ले जाता।"
टिंकू ने मेरी बाँह और कसकर पकड़ी। "भाई," उसने कहा, "मुझे नहीं लगता कि ये जगह मेरे लिए है। मेरा नाम अच्छा है। मैं इसे नहीं छोड़ना चाहता। मेरा नाम टिंकू है, और मैं टिंकू ही मरूँगा।"
मैं हँसा। इस बार हँसी गले से बाहर आई। "तो तू बाहर रुक जा," मैंने कहा।
"नहीं," उसने कहा। "मैं अंदर आऊँगा, पर मैं अपना नाम अपनी जेब में रखूँगा। और अगर वो बूढ़ा मुझसे पूछेगा, तो मैं कहूँगा — मेरा नाम टिंकू है, और मैं वीर का दोस्त हूँ। यही मेरा नाम है।"
दीनू ने दरवाज़े पर हाथ रखा। "मैं अंदर जाकर उससे बात करूँगा," उसने कहा। "मैं बूढ़ा हूँ। मेरा नाम अब कोई नहीं लेता। मैं अपना नाम छोड़कर आऊँगा, और किसी को फ़र्क़ नहीं पड़ेगा।"
"नहीं," मैंने कहा। मेरी आवाज़ खुद मुझे अजीब लगी — ऊँची, साफ़। "मैं जाऊँगा।"
"वीर," मीरा ने कहा।
"मैं जाऊँगा," मैंने दोहराया। "क्योंकि वो मेरी राह देख रहा था। मेरे नाम से बुला रहा था। अगर वो मेरे पापा की आँखों वाला आदमी है, तो मैं उससे आमने-सामने मिलूँगा।"
मैंने दरवाज़े को धक्का दिया।
वो खुल गया।
अंदर अंधेरा था — इतना घुप्प कि लालटेन की रोशनी भी दीवार तक नहीं पहुँच रही थी। पर गंध और तेज़ हो गई थी। हल्दी, चमेली, और उसके नीचे — धुआँ। जैसे किसी ने अभी-अभी अगरबत्ती जलाई हो।
मैंने पहला कदम अंदर रखा।
फिर दूसरा।
और फिर मेरी आँखें अंधेरे से समा गईं।
कमरा छोटा था। बहुत छोटा। दीवार पर एक दीया जल रहा था — बिना तेल के, जैसे हवा ही उसे जला रही हो। और उस दीये की रोशनी में, ज़मीन पर, एक चटाई बिछी थी।
चटाई पर कोई बैठा था।
मैंने उसे देखा। वो बहुत बूढ़ा था। इतना बूढ़ा कि उसकी पसलियाँ खाल से दिख रही थीं। उसके बाल सफ़ेद थे, लंबे, ज़मीन तक। उसकी आँखें बंद थीं। और उसके हाथों में कुछ था — एक पीतल की डिबिया, जिस पर वही साँप बना था।
मैंने एक कदम और बढ़ाया।
और फिर मेरी नज़र ज़मीन पर पड़ी।
फर्श पर हड्डियाँ रखी थीं।
बहुत सारी हड्डियाँ। सफ़ेद, सूखी, एक के ऊपर एक। किसी की पसली, किसी की बाँह। और सबसे ऊपर, एक खोपड़ी — जिसके दाँत अभी भी साबुत थे।
टिंकू की साँस रुक गई। मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसका चेहरा सफ़ेद था, जैसे कोई उसका खून ही निकाल ले गया हो। उसकी डिब्बी हाथ से छूट गई और ज़मीन पर गिरी।
डिब्बी खुल गई, और मिठाई वहाँ बिखर गई — हलवा, लड्डू, कुछ और भी। वो हड्डियों के पास जाकर रुकी।
टिंकू ने अपना मुँह खोला। उसकी आवाज़ काँप रही थी।
"भाई," उसने धीरे से कहा। "मैंने आज से मिठाई बनाना बंद कर दिया।"
मैं उसकी तरफ़ देखने ही वाला था कि अंधेरे से आवाज़ आई।
"तेरे बाप की हड्डियाँ नहीं हैं ये," आवाज़ ने कहा। "घबरा मत। ये उन पहलवानों की हैं जो मेरे पास इलाज कराने आए और वापस नहीं गए।"
वो आवाज़ चटाई से आई थी।
बूढ़े ने अपनी आँखें खोलीं।
और मैंने उन्हें देखा।
वो आँखें। वही आँखें। गहरी, काली, जैसे कोई कुआँ हो जिसमें बरसों बादिश न पड़ी हो। पर उनमें कुछ था जो मुझे देखते ही मेरे अंदर तक उतर गया।
मैंने उन्हें पहले कभी नहीं देखा था। पर मैंने उन्हें पहचान लिया।
"तू आ गया," बूढ़े ने कहा। उसकी आवाज़ सूखी थी, पर साफ़। "बैठ।"
मैं नहीं बैठा।
"तू कौन है?" मैंने पूछा।
बूढ़े ने अपना सिर थोड़ा हिलाया। हँसा नहीं, मुस्कुराया नहीं। बस अपनी पीतल की डिबिया को उँगलियों से सहलाया।
"मैं वही हूँ," उसने कहा, "जिसका नाम बीस साल से कोई नहीं लेता। जिसे गाँव ने भुला दिया। जिसे माधव सिंह ने ज़िंदा ज़मीन में गाड़ दिया था।"
"तू हरिदास है?" मीरा ने पूछा। वो मेरे पीछे खड़ी थी, और उसकी आवाज़ में डर नहीं था। सिर्फ़ सवाल था।
बूढ़े ने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखें मीरा पर रुक गईं, और कुछ पल के लिए वो चुप रहा।
"तू रणवीर की बेटी है," उसने कहा। "तेरी आँखें उसकी जैसी हैं। पर तेरी ज़ुबान उसकी नहीं। तेरी ज़ुबान तेरी माँ की है।"
मीरा ने अपना ठुड्डी ऊपर की। "तूने मेरे पापा के पैर कैसे लिए?"
बूढ़े ने अपनी पलकें झुकाईं। "मैंने नहीं लिए," उसने कहा। "मैंने तो उसे बचाया था। पर बचाने के लिए मुझे उसका कुछ लेना पड़ा।"
मेरे पेट में एक झटका लगा।
"क्या लिया?" मैंने पूछा।
"उसकी ताकत," बूढ़े ने कहा। "उसकी मिट्टी। उसका नाम।"
उसने अपना हाथ बढ़ाया और अपनी पीतल की डिबिया की तरफ़ इशारा किया।
"इसके अंदर तेरे पापा की आख़िरी साँस है," उसने कहा। "शेर सिंह ने मरने से पहले मुझे ये दी थी। उसने कहा था — जिस दिन मेरा बेटा आए, उसे दे देना।"
मेरे हाथ काँपने लगे। मैंने उन्हें अपनी धोती में छुपा लिया।
"मेरे पापा," मैंने कहा। "वो तुझे जानते थे?"
बूढ़े ने अपना सिर हिलाया। "वो मुझे जानते थे," उसने कहा। "और मैं उन्हें। उन्होंने मुझसे ज़हर बनाना सीखा था।"
कमरे में सन्नाटा छा गया। इतना गहरा कि मैं अपनी नसों में खून की आवाज़ सुन सकता था।
"तूने सिखाया?" टिंकू ने कहा। उसकी आवाज़ में अब डर नहीं था। गुस्सा था। "तूने उसे ज़हर बनाना सिखाया?"
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