Spirit of a Fighter597 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 597

7 min read November 5, 2026

मैं उठा और छत के किनारे पर गया।

अखाड़े के पिछले हिस्से में, जहाँ दीवार सबसे ऊँची है, तीन परछाइयाँ थीं। मैंने उन्हें देखा। एक लंबी, एक मोटी, और एक जो झुककर चल रही थी।

वो मिट्टी में कुछ डाल रहे थे।

मैंने इंतज़ार नहीं किया। मैंने छत से छलाँग लगाई और सीधे उनकी तरफ़ दौड़ा। मेरे पैरों के नीचे ताज़ी मिट्टी फिसली, पर मैं गिरा नहीं। मैंने चिल्लाया — "रुक!"

वो तीनों पलटे। चाँदनी में उनके चेहरे दिखे नहीं, पर मैंने उनकी गंध पकड़ी — काले तेल की, और उसके नीचे वही हरी शीशी वाली कड़वाहट। एक ने कुछ फेंका — एक छोटा पीतल का डिब्बा। मैंने उसे पकड़ने के लिए हाथ बढ़ाया, पर वो मेरे हाथ से छूटकर मिट्टी में गिर गया। मैंने उसे उठाया।

जब मैंने सिर उठाया, तो तीनों भाग रहे थे। मैंने उनका पीछा किया, पर वो दीवार के उस पुराने छेद से निकल गए जो कभी कालू काका ने दिखाया था।

मैं रुक गया। साँस फूल रही थी। और मैंने अपनी हथेली में देखा।

वो पीतल का डिब्बा था — छोटा, गोल, ढक्कन पर एक निशान। और वो निशान मैं पहचानता था। ठाकुर की मुहर। वही मुहर जो उसने उस काग़ज़ पर लगाई थी जिस पर मेरे हस्ताक्षर थे।

मैंने डिब्बा खोला। अंदर एक पुड़िया थी, और पुड़िया में एक चीज़ जो मैंने कभी नहीं देखी थी — छोटा-सा, सफ़ेद, काँच जैसा टुकड़ा।

और उसके साथ एक काग़ज़ था। उस पर सिर्फ़ एक लाइन —

"मिट्टी बदल ली। पर बीज तो चारों तरफ़ बोया जा चुका है।"

मेरे हाथ में वो डिब्बा था, और मेरे दिल में ये सवाल — कि वो सफ़ेद टुकड़ा क्या है? और वो बीज कौन-से हैं जो बोए जा चुके हैं?

कालू काका की आवाज़ पीछे से आई। "वीर?"

मैं पलटा। वो दीवार के पास खड़े थे, लालटेन हाथ में, और उनका चेहरा ऐसा था जैसे उन्होंने सब देख लिया हो।

"काका," मैंने कहा, और मैंने डिब्बा उनकी तरफ़ बढ़ाया, "ये क्या है?"

कालू काका ने लालटेन ऊपर उठाई और डिब्बे में देखा। और उनके हाथ काँपने लगे। लालटेन झूल गई, और उसकी रोशनी दीवार पर नाचने लगी।

"ये…" उन्होंने धीरे से कहा, और आवाज़ ऐसी थी जैसे किसी पुरानी कब्र से आ रही हो, "ये तो वो बीज है, वीर। जो तहखाने की मिट्टी में बोया जाता था — बीस साल पहले, रघुवीर के हाथों। और जिसे भैरव ने नष्ट करने की कसम खाई थी।"

उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, और उनकी आँखों में वो डर था जो मैंने कभी नहीं देखा।

"अगर ये बीज मिट्टी में गया, तो ये अखाड़ा फिर कभी नहीं उठेगा।"

॥

मैंने कालू काका की लालटेन देखी। उसकी रोशनी में वो सफ़ेद टुकड़ा चमक रहा था, जैसे चाँद का कोई टूटा हिस्सा मिट्टी में गिर गया हो।

"काका, इसे फेंक देना चाहिए?" मैंने पूछा।

कालू काका ने बहुत देर तक मेरी तरफ़ देखा। फिर उन्होंने लालटेन नीचे रखी, अपनी कमर से एक छोटी थैली निकाली, और उसमें से एक चीज़ मेरी हथेली पर रख दी।

सूखी हल्दी। काली मिर्च के दाने। और एक लाल धागा।

मेरी साँस रुक गई।

"काका… ये—"

"ये वही पोटली है, वीर," कालू काका ने धीरे से कहा। "जो भैरव ने तुझे दी थी। तूने इसे जलाया नहीं। तूने इसे कहीं रख दिया, और अब ये यहाँ है।"

मेरा सिर घूमने लगा। मैंने अंदर की जेब टटोली — खाली। मैंने घर की तिजोरी याद की। जो पोटली भैरव ने मुझे दी थी, वो मैंने तहखाने की मिट्टी में रख दी थी, ये सोचकर कि माँ की चीज़ है, इसे मिट्टी में ही रहने दो।

"ये वो पोटली नहीं है," मैंने धीरे से कहा। "वो मैंने तहखाने में छोड़ी थी।"

"तो फिर ये किसकी है?" कालू काका ने पूछा।

मैंने उनकी तरफ़ देखा। और अचानक मुझे याद आया — उस रात जब तीन परछाइयाँ मिट्टी में कुछ डाल रही थीं। उन्होंने मुझे पीतल का डिब्बा फेंका था। और उस डिब्बे में ये पुड़िया थी।

मैंने पोटली सूँघी। हल्दी की तीखी गंध। काली मिर्च की चुभन। और उसके नीचे…

मैं रुक गया।

"काका," मैंने कहा, "इसमें एक और गंध है।"

"कैसी?"

"महँगा इत्र। पर ठाकुर का नहीं। मैं ठाकुर का इत्र जानता हूँ — वो लकड़ी और कपूर जैसा है। ये अलग है। इसमें फूलों की मिठास है। चमेली जैसी। पर इतनी तेज़ कि नाक जल जाए।"

कालू काका पीछे हट गए। उनका चेहरा लालटेन की रोशनी में पीला पड़ गया।

"चमेली," उन्होंने दोहराया। "चमेली का इत्र।"

"क्या बात है, काका?"

वो कुछ नहीं बोले। बस मिट्टी की तरफ़ देखते रहे, जैसे मिट्टी ही उनसे कोई बात कह रही हो।

मैंने डिब्बा जेब में रखा और सीधा घर की तरफ़ चला।

सुबह की पहली किरण आँगन में पड़ रही थी, जब मैंने मीरा को जगाया। वो छत पर सोई थी, कंबल सिर तक खींचे। मैंने उसके कंधे को हल्के से छुआ, और वो एक झटके में उठ बैठी — आँखें आधी खुली, हाथ सिरहाने के नीचे।

"क्या हुआ? कोई आया?"

"कुछ दिखाना है।"

मैंने उसे डिब्बा दिया। वो बैठी, बाल सँभाले, और डिब्बा खोला। पुड़िया निकाली। खोली। और उसके हाथ रुक गए।

"वीर…" उसकी आवाज़ बदल गई। "ये तो…"

"हाँ। हल्दी, काली मिर्च। और लाल धागा। बिलकुल वही जो भैरव ने मुझे दिया था।"

मीरा ने धागा उँगली पर लपेटा। फिर उसे रोशनी में देखा। फिर मेरी तरफ़ देखा।

"ये धागा नया नहीं है, वीर। देखो, इसके रेशे घिसे हुए हैं। ये बहुत पुराना है।"

"कितना पुराना?"

"मैं डॉक्टर नहीं हूँ धागों की," उसने तेज़ी से कहा। "पर माँ की अलमारी में भी ऐसे धागे रखे थे जो उन्होंने अपनी शादी के वक़्त बाँधे थे। बीस साल पुराने। और वो भी ऐसे ही घिसे हुए थे।"

मैं बैठ गया। मेरे घुटने मिट्टी पर टिके, और मिट्टी की ठंडक मेरी हड्डियों तक गई।

"मीरा, ठाकुर ने उस दिन कहा था — 'इस पोटली में जो धागा है, वो मेरी पहली पत्नी का है।'"

मीरा का हाथ रुक गया। वो धीरे से बोली, "तो इसका मतलब… भैरव और ठाकुर के बीच कोई पुराना रिश्ता है। कोई ऐसा रिश्ता जो हमें पता नहीं।"

"और ये पुड़िया उन तीनों ने मिट्टी में डालने के लिए भेजी थी," मैंने कहा। "मतलब मिट्टी में ये डालना ही बीज बोना है। हल्दी, मिर्च, धागा — यही तो वो बीज है।"

मीरा ने पुड़िया को फिर सूँघा। फिर उसके चेहरे का रंग उड़ गया।

"वीर, इसमें एक और गंध है।"

"मैंने भी सूँघी। चमेली का इत्र।"

"नहीं।" उसने मेरी तरफ़ देखा, और उसकी आँखों में कुछ ऐसा था जो मैंने पहले कभी नहीं देखा। "चमेली का इत्र सिर्फ़ एक औरत लगाती है जिसे मैं जानती हूँ। शांति। ठाकुर की दूसरी पत्नी।"

मैं चुप हो गया।

"वो औरत जो मुझे ज़मीन का लालच देने आई थी," मैंने धीरे से कहा। "टिंकू की दुकान की ज़मीन।"

"हाँ।"

"तो वो उसी रात अखाड़े में थी?"

"या उसने अपना इत्र किसी और को दिया," मीरा ने कहा। उसकी आवाज़ सख़्त हो गई थी, वैसी ही जैसी अदालत में होती है। "पर वो इत्र इतना महँगा है कि कोई ऐसे ही नहीं देता। और शांति… शांति अपनी चीज़ें किसी को नहीं देती।"

वो उठ खड़ी हुई। आँगन में चलने लगी। दो कदम इधर, दो कदम उधर। मैंने देखा कि उसके हाथ मुट्ठी में बंधे हैं।

"मीरा।"

वो रुकी। मेरी तरफ़ नहीं देखा।

"क्या बात है?"

"वीर, शांति के बारे में एक बात है।" उसकी आवाज़ धीमी हो गई। "जो मैंने किसी को नहीं बताई। मेरे पिता को भी नहीं।"

मैं उठा। उसके सामने खड़ा हो गया।

"बताओ।"

उसने एक लंबी साँस ली। जैसे कोई बोझ उतार रही हो।

"शांति मेरी मौसी है। मेरी माँ की बहन।"

मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई।

"क्या?"

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