Spirit of a Fighter – Chapter 591
"तुम क्या?"
मैं चुप हो गया। मैंने प्याला अपने घुटनों के बीच रखा।
"मैं ईंट ढोता हूँ," मैंने कहा। "मेरे पास धोती है, बनियान है, और एक टूटी चप्पल। मेरे पापा भी पहलवान बनना चाहते थे, और मरे। मेरी माँ चार बजे उठकर चक्की चलाती है। मेरी बहन रोज़ स्कूल से लौटकर पूछती है — 'भैया, आज क्या जीता?' और मैं उससे झूठ बोलता हूँ।"
मीरा ने प्याला रख दिया।
"तुम झूठ क्यों बोलते हो?"
"क्योंकि सच ये है कि मैंने कुछ नहीं जीता," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ में वो कड़वाहट थी जो मैंने कभी किसी को नहीं दिखाई थी। "मैं बाहर खड़ा रहता हूँ। रोज़ सुबह। और अखाड़े की मिट्टी की गंध सूँघता हूँ। और मन में कुश्ती लड़ता हूँ। मन में मैं सबको हरा देता हूँ, मीरा। मन में मैं बड़ा पहलवान हूँ। पर जब मिट्टी में उतरने की बात आती है—"
"तो?"
"तो मेरे पैर नहीं उठते।" मैंने अपनी हथेलियाँ देखीं। उन पर चक्की के छाले थे। "मुझे लगता है कि सब देख रहे हैं। सब हँस रहे हैं। और मेरी माँ—"
"तुम्हारी माँ क्या?"
"मेरी माँ को पता है," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ फट गई। "वो जानती है कि मैं रातों को अखाड़े के बाहर खड़ा रहता हूँ। और वो कुछ नहीं कहती। बस दाल में नमक कम डाल देती है।"
मीरा कुछ नहीं बोली।
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखें चमक रही थीं, पर वो रो नहीं रही थी। वो बस मुझे देख रही थी, और उसका देखना अजीब तरह से आराम दे रहा था — जैसे कोई तुम्हारी सबसे शर्मनाक बात सुनकर भी वहाँ से हिले नहीं।
"वो नमक कम इसलिए डालती है," मीरा ने धीरे से कहा, "ताकि तुम समझो कि कुछ बदला है। ताकि तुम पूछो — 'माँ, आज नमक कम क्यों है?' और तब वो तुमसे बात कर सके।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। "तुझे कैसे पता?"
"क्योंकि मेरे पापा भी वही करते हैं," उसने कहा। "जब वो मुझसे कुछ कहना चाहते हैं और कह नहीं पाते, तो वो अपनी घड़ी की चाबी घुमाने लगते हैं। वो घड़ी जो चलती नहीं। और मैं समझ जाती हूँ कि आज उन्हें कुछ कहना है।"
मैं हँसा। पता नहीं क्यों। शायद इसलिए कि अब मुझे पता चल गया था कि दुनिया में मेरे घर के अलावा भी एक घर है जहाँ लोग बात करने के लिए चीज़ें तोड़ते-मरोड़ते हैं।
"तेरे पापा की घड़ी," मैंने कहा। "जो चलती नहीं।"
"हाँ।" उसने मेरी तरफ़ देखा। "और मैंने वो घड़ी तुम्हें दी थी। याद है? कहा था — जिस दिन सच खुलेगा, चलती हुई लौटाना।"
"याद है," मैंने कहा।
"तो फिर कब लौटाएगा?"
मैंने उसकी आँखों में देखा। नीचे नहर बह रही थी, और मुझे लगा कि वो मेरी ही साँसों की आवाज़ है।
"जिस दिन वो चलेगी," मैंने कहा, "उस दिन मैं खुद चलकर लाऊँगा। दौड़कर नहीं। चलकर।"
मीरा ने कुछ नहीं कहा। वो धीरे से मेरी तरफ़ सरकी, और उसका कंधा मेरे कंधे से लगा। मैंने नहीं हिलाया। न वो हिली।
कुछ देर बाद उसने कहा, बहुत हल्की आवाज़ में — "वीर।"
"हाँ।"
"तुम्हारे पास जो शक्ति है ना… सूंघने की।" उसने अपनी उँगली से मेरी बाँह पर एक छोटा सा गोला बनाया, धूल में। "वो तुम्हें कब पता चली?"
मैंने सोचा। बहुत पीछे तक।
"जब मैं छोटा था," मैंने कहा। "मेरे पापा बीमार थे। माँ उनके सिरहाने बैठी रहती थी। एक दिन मैंने कहा — 'माँ, पापा के पसीने में कुछ कड़वा है।' माँ ने पूछा — 'कैसे पता?' मैंने कहा — 'बू आ रही है।' और माँ ने मुझे एक थप्पड़ मारा।"
मीरा की उँगली मेरी बाँह पर रुक गई।
"थप्पड़? क्यों?"
"क्योंकि उस वक़्त माँ को लगा कि मैंने कुछ और देखा-सुना है," मैंने कहा। "और उस रात माँ ने मुझे सीने से लगाकर कहा — 'बेटा, ये बात किसी को नहीं बतानी। वरना लोग तुझे पागल कहेंगे, या कुछ और।' और मैंने वही किया। बीस साल। मैंने किसी को नहीं बताया।"
"मुझे बताया," मीरा ने कहा, और उसकी आवाज़ में एक अजीब सी गर्मी थी।
"तुझे बताया," मैंने कहा। "और तूने मुझे पागल नहीं कहा।"
"मैंने तो तुम्हें कभी पागल कहा ही नहीं," उसने कहा। "मैंने सिर्फ़ ये कहा था कि तुम मिट्टी में जूते पहनकर घुसे थे। ये पागलपन नहीं है, वीर। ये बदतमीज़ी है।"
मैं ज़ोर से हँसा। इतना ज़ोर से कि माँ ने चारपाई पर करवट बदली और बड़बड़ाई — "गुड़िया सो रही है, तेज़ मत बोल।" पर उनकी आवाज़ में डाँट नहीं थी।
मीरा हँस रही थी, और हँसते हुए उसने मेरे कंधे पर हाथ रखा। और फिर उसका हाथ वहीं रुक गया।
"तुम अकेले नहीं हो," उसने कहा। बिना हँसी के। बिना मज़ाक के। बहुत सीधे।
मेरे गले में कुछ अटक गया।
मैंने कुछ नहीं कहा। मैंने बस अपनी उँगली बढ़ाई और उसकी उँगली पकड़ ली। छोटी सी उँगली। उसकी त्वचा पर अदरक की गंध थी, और उससे नीचे उसी हल्दी वाली चाय की गंध। और उससे भी नीचे — कुछ अपना सा। कोई इत्र नहीं। बस वो।
हम चुप बैठे रहे। कितनी देर, पता नहीं। तारे थोड़े नीचे आ गए थे, या मैं थोड़ा ऊपर उठ गया था।
फिर नींद आई, और वो भी अजीब तरह से — नींद नहीं, बस आँखें बंद करके बैठे रहना, उसकी उँगली पकड़े हुए।
सुबह की पहली आवाज़ मेरे कानों में आई — चिड़िया नहीं, कदमों की। तेज़, बेकाबू, भागते हुए कदम।
मैंने आँखें खोलीं। आसमान में हल्की लाली थी। मीरा का सिर मेरे कंधे पर था। मैंने धीरे से उसे हिलाया।
नीचे से आवाज़ आई, बहुत पुरानी, बहुत घबराई हुई —
"वीर! वीर!"
मैं उठा और छत के किनारे तक गया। नीचे कालू काका खड़े थे। उनके हाथ में जली हुई रस्सी थी, और उनका कुबड़ा शरीर पहले से ज़्यादा झुका हुआ था। उनकी सफ़ेद दाढ़ी में राख लगी थी और उनकी आँखों में वो डर था जो मैंने पहले कभी उनमें नहीं देखा था।
"कालू काका?" मैंने नीचे झाँककर कहा। "क्या हुआ? इतनी सुबह—"
"नीचे आ," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ काँप रही थी। "नीचे आ, वीर। मैं छत तक नहीं चढ़ सकता। मेरी साँस टूट रही है।"
मैं सीढ़ियों से उतरकर नीचे भागा। मीरा भी पीछे आई। माँ छत पर गुड़िया के पास खड़ी रहीं, और उनका हाथ छत की मुंडेर पर था।
मैंने दरवाज़ा खोला। कालू काका बाहर खड़े थे, और उनके हाथ की जली रस्सी से धुआँ नहीं आ रहा था — बस जली हुई गंध आ रही थी।
"क्या हुआ?" मैंने फिर पूछा।
कालू काका ने मेरा कंधा पकड़ा। उनकी उँगलियाँ ठंडी थीं।
"अखाड़े की मिट्टी," उन्होंने कहा, और हर शब्द जैसे उनके मुँह से खींचकर निकल रहा था। "किसी ने रात में सारी मिट्टी में नमक मिला दिया है।"
मैं सुन्न रह गया।
"नमक?" मीरा ने पीछे से कहा।
"पूरी मिट्टी," कालू काका ने कहा। "जो अखाड़े में मिट्टी थी — लाल, गीली, तैयार — सब में। बोरी-बोरी नमक आया है। मैंने उँगली से चखा। ज़ुबान जल गई।"
मेरे पैरों के नीचे की मिट्टी मुझे ठंडी लगी। मैंने कालू काका की आँखों में देखा।
"अगर तुम उस मिट्टी में उतरे," कालू काका ने कहा, और उनकी आवाज़ फूट गई, "तो तुम्हारी खाल जल जाएगी। छाले पड़ जाएँगे। तुम खड़े नहीं रह पाओगे। और बलवंत—"
वो रुके। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"बलवंत ताज़ी मिट्टी में उतरेगा," उन्होंने धीरे से कहा। "उसके लिए नई मिट्टी आई है। बोरी बंद। मुहर लगी।"
मेरे अंदर कुछ बैठ गया। मैंने जली रस्सी की तरफ़ देखा।
"ये कहाँ से?" मैंने पूछा।
"अखाड़े के फाटक पर बँधी थी," कालू काका ने कहा। "सुबह जब मैं पानी देने गया, तो फाटक पर ये लटक रही थी। और मिट्टी—" उन्होंने गला साफ़ किया — "मिट्टी में किसी ने पैरों के निशान छोड़े हैं। जूतों के। बहुत सारे। भारी जूते।"
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