Spirit of a Fighter – Chapter 582
“तेरे पापा को ज़हर उस आदमी ने दिया था जिसे तू अपना सबसे बड़ा सहारा समझता है।”
मैंने काग़ज़ पकड़ा। मेरे हाथ काँप रहे थे। मीरा मेरे पास आई और उसने मेरा हाथ सहारा दिया। काग़ज़ पर उबड़-खाबड़ लिखाई थी, जली हुई, फिर भी पढ़ी जा सकती थी। और उस पर एक नाम था।
मैंने उसे पढ़ा। एक बार। दो बार।
और फिर मेरे हाथ से काग़ज़ गिर गया।
मीरा ने उसे उठाया। उसने पढ़ा, और उसकी आँखें फैल गईं।
“वीर,” उसने कहा, और उसकी आवाज़ काँप रही थी। “ये नाम… ये तो…”
“हाँ,” मैंने कहा। मेरी आवाज़ ऐसी थी जैसे किसी और की हो। “ये वही है।”
वो लंगड़ा आदमी मेरे सामने खड़ा था, और उसकी आँखों में वो सच था जो बीस साल से दबा हुआ था।
“तेरी माँ ने कहा था,” उसने धीरे से कहा, “कि जिस दिन ये सच बाहर आएगा, उस दिन रामपुर की मिट्टी बदल जाएगी।”
मैंने काग़ज़ को अपनी मुट्ठी में कस लिया। मेरे भीतर कुछ ऐसा जल रहा था जो आग नहीं थी, ज़हर नहीं थी — वो सच था जो अब तक मेरे हाथ में नहीं आया था।
“तो अब,” मैंने कहा, और मेरी आवाज़ में वो ठंडक आ गई जो मैंने पहले कभी महसूस नहीं की थी, “अब मैं उस आदमी से वो सवाल पूछूँगा जो मैंने आज तक किसी से नहीं पूछा।”
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा।
“कौन-सा सवाल?” उसने पूछा।
मैंने उसकी तरफ़ देखा, और मेरी आँखों में वो पानी था जो बहुत देर से रुका हुआ था।
“ये सवाल,” मैंने कहा, “कि जिस आदमी ने मेरे पापा को मारा, वो अब तक मेरे साथ क्यों खड़ा है — और मेरी माँ उसे रोज़ चाय क्यों पिलाती है।”
॥
काग़ज़ मेरे हाथ से गिरा, और मीरा ने उसे झट से उठा लिया। वो लंगड़ा आदमी मेरे सामने खड़ा था, लाठी पर झुका हुआ, और उसकी आँखों में वो पानी अभी सूखा नहीं था।
मीरा ने काग़ज़ पढ़ा। एक बार नहीं, दो बार। उसके होंठ हिल रहे थे, पर आवाज़ नहीं निकली।
“ये नाम…” वो बोली, और उसकी आवाज़ जैसे गले में अटक गई। “वीर, ये नाम तो…”
“हाँ।” मैंने उसके हाथ से काग़ज़ ले लिया। जली हुई लिखाई पर उबड़-खाबड़ अक्षर थे, पर नाम साफ़ पढ़ा जा सकता था — रघुवीर।
मेरे कानों में गूँज उठी। माँ की आवाज़, जो कल तहखाने में कह रही थी कि जो शीशी मैंने रखी थी, वो रघुवीर की बनाई दवा थी। वो रघुवीर, जिसे मैं सबसे बड़ा सहारा समझता था। जिसके काग़ज़ मुझे मुंशीजी से मिले थे। जिसकी लिखाई माँ की अलमारी में छिपी थी।
“रुको।” मैंने अपना सिर हिलाया, जैसे कोई कीड़ा कान में घुस गया हो। “रुको। ये नाम गलत पढ़ा है तुमने। ये रघुवीर नहीं है। ये…”
“पढ़ो,” लंगड़े ने कहा। “आवाज़ से पढ़ो, ताकि ये लड़की भी सुने।”
मैंने काग़ज़ आँखों के करीब लाया। पुरानी स्याही, जली हुई, पर अक्षर साफ़ थे। और मैंने पढ़ा, धीरे-धीरे, हर शब्द जैसे मुँह में काँटा हो।
“जो ज़हर मैंने बनाया, वो मैंने खुद पिया। पर एक आदमी ने उसे औरों के गिलास में डाला। उसका नाम रघुवीर है। और उसके पीछे वो बैठा है जिसके हाथ में रामपुर की मिट्टी है — माधव सिंह।”
मैं रुका। मीरा की आँखों में पानी था।
“ये रघुवीर की लिखाई है,” लंगड़े ने कहा। “मैंने ये काग़ज़ बीस साल अपनी छाती पर रखा। जिस रात माधव ने तेरे पापा को ज़हर दिया, उस रात रघुवीर ने ये लिखकर मुझे दिया था। कहा था — ‘अगर मैं न रहूँ, तो ये वीर को देना।’”
“तो तुमने अब तक क्यों नहीं दिया?” मेरी आवाज़ फट गई। “बीस साल! बीस साल तुम ये जेब में लिए घूमते रहे?”
लंगड़े ने लाठी को ज़ोर से टिकाया। उसकी आँखों में जो पानी था, वो अब गुस्से की तरह जल रहा था।
“क्योंकि मैं डरता था, बेटा,” उसने कहा। “मैं डरता था कि माधव मेरी भी आधी जली रोटी चूल्हे पर छोड़ देगा। मैं डरता था कि जिस दिन मैं मुँह खोलूँगा, उस दिन रामपुर में एक और घर सूना हो जाएगा।”
वो रुका। उसने अपना घसीटता पैर सहारा दिया।
“पर आज सुबह तेरी माँ ने मुझे रास्ता रोका,” उसने कहा। “उसने मेरी लाठी पकड़ ली और कहा — ‘धन्नू, अब मत डर। अब जो डरेगा, वो मरेगा।’”
अब मैं पलटा। अब मैंने मीरा की तरफ़ देखा, फिर उन लोगों की तरफ़ जो हमें घेरकर खड़े थे। ठाकुर के आदमी। किसी के हाथ में लाठी नहीं थी। सब चुप थे। और यही सबसे डरावना था।
“ठाकुर महेंद्र सिंह तुम्हें बुला रहे हैं,” सामने खड़े एक आदमी ने कहा। “अंदर। अकेले।”
“मैं साथ चलूँगी,” मीरा ने तुरंत कहा।
“ठाकुर ने अकेले कहा है।”
“तो ठाकुर से कहो, कि लड़की अकेली नहीं जाती।” मीरा ने अपना बैग कंधे पर ठीक किया, जैसे वो किसी कोर्ट में बहस करने जा रही हो। “या तो दोनों अंदर, या दोनों बाहर।”
आदमी ने एक पल सोचा, फिर पलटकर चल दिया।
हम उसके पीछे चले। अखाड़े का फाटक पार करते वक़्त मैंने धन्नू की तरफ़ देखा। वो वहीं खड़ा रह गया, लाठी पर झुका, और उसके होंठ हिल रहे थे। जैसे कोई दुआ पढ़ रहा हो। या कोई हिसाब कर रहा हो।
ठाकुर का दालान बड़ा था। फर्श पर सफ़ेद संगमरमर, और उस पर लाल कालीन जिस पर पैर रखते हुए मुझे लगा कि मैं किसी और दुनिया में आ गया हूँ। दीवारों पर बड़े-बड़े पहलवानों की तस्वीरें टँगी थीं। सबसे ऊँची तस्वीर पर एक आदमी था जिसकी मूँछें मेरे पापा की मूँछों जैसी थीं। पर चेहरा नहीं पहचाना।
और उसके नीचे, एक ऊँची कुर्सी पर, ठाकुर महेंद्र सिंह बैठे थे।
उनका शरीर भारी था, पर बुढ़ापे की भारीपन। सफ़ेद शेरवानी, गले में मोटी सोने की चेन, और उँगली में वो अंगूठी जिसकी सील धन्नू ने दिखाई थी। उनके हाथ में सोने की घड़ी थी, और वो उसे धीरे-धीरे घुमा रहे थे। घड़ी की टिक-टिक पूरे कमरे में गूँज रही थी।
“आओ, आओ।” उन्होंने हाथ बढ़ाया, जैसे कोई रिश्तेदार बुला रहा हो। “बैठो।”
हम नहीं बैठे।
ठाकुर ने हमें देखा। उनकी नज़र मेरे कपड़ों पर गई, फिर मेरे पैरों पर, फिर मेरे हाथों पर। और मुझे लगा जैसे कोई दुकानदार माल तौल रहा हो।
“मैंने सुना तुमने भैरव को उसके ही अखाड़े में हराया,” उन्होंने कहा। घड़ी घूमती रही। “शाबाश। भैरव मेरा आदमी था, पर ईमानदारी से कहूँ, तो वो अपने ही ज़हर में डूब गया। उसकी बोतलें बहुत दिन चलतीं, अगर उसने उन्हें अपने पानी में न मिलाया होता।”
मैंने अपनी मुट्ठी कसी। ये आदमी अपनी मिट्टी में मरे हुए पहलवानों की बात ऐसे कर रहा था, जैसे दुकान का हिसाब बता रहा हो।
“पर एक बात पूछूँ?” ठाकुर ने आगे झुककर कहा। उनकी आँखें छोटी हो गईं। “तुम्हारी नाक… वो सच में कुछ ऐसा करती है? जो भैरव के ज़हर को पानी से अलग पहचान गई?”
मैं चुप रहा।
बात कुछ बनने से पहले मीरा सामने आ गई।
“सवाल हमारे और आपके बीच है,” वो बोली, और उसकी आवाज़ में वो ठंडक थी जो सिर्फ़ सच बोलने वाले में आती है। “हम भारत केसरी का न्योता लेकर आए हैं। आपका न्योता। आपने ठाकुर महेंद्र सिंह के नाम से काग़ज़ भेजा था।”
ठाकुर हँसे। हँसी मोटी थी, और उसमें वो मिठास थी जो दूध में घुली चीनी जैसी होती है — पीने तक अच्छी, पीने के बाद अंदर से खोखला।
“अच्छा।” उन्होंने घड़ी जेब में रखी। “तो सीधी बात।”
टेबल से एक काग़ज़ उठाया। मोटा काग़ज़, मुड़ा हुआ, कोनों पर लाल मोहर।
“भारत केसरी में तुम्हारा नाम जोड़ने के लिए ये शर्त है,” उन्होंने कहा। “पहले मेरे पहलवान बलवंत से लड़ना होगा। जो जीतेगा, वो मुकाबले में उतरेगा।”
“बलवंत?” मैंने कहा। “जो आपका सबसे मज़बूत है?”
“हाँ।” ठाकुर ने दाँत दिखाए। “पर शर्त सिर्फ़ लड़ने की नहीं है।”
उन्होंने काग़ज़ मेरी तरफ़ सरकाया।
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