Spirit of a Fighter – Chapter 569
वो कुछ देर चुप रहे। फिर उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"वीर," उन्होंने कहा, "तुझमें वो साँस है। मैंने इसे पहचाना जब तू पहली बार अखाड़े के बाहर खड़ा था। तेरी साँस वैसी ही थी जैसी रणवीर की थी — धीमी, हल्की, पर गहरी। तू भीड़ में खो जाता है, पर मिट्टी में नहीं।"
"तो मुझे क्या करना होगा?" मैंने पूछा।
"तू साँस सीखेगा," उन्होंने कहा। "पूरी। और जिस दिन तू अपनी साँस दस मिनट पकड़ लेगा, उस दिन कोई तुझे गिरा नहीं सकेगा। पर…" उन्होंने मेरी तरफ़ झुककर कहा, "मैं तुझे उस साँस से मिलवाऊँगा जो मिट्टी से आती है। जमीन से जुड़ी साँस। जो पहलवान मिट्टी में पैर गाड़कर लड़ता है, उसकी साँस भी ज़मीन से जुड़ जाती है। तब कोई उसे उखाड़ नहीं सकता।"
उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा और मेरी छाती पर रख दिया।
"यहाँ देख," उन्होंने कहा। "तेरी साँस यहाँ से आ रही है। पर जड़ यहाँ नहीं है। जड़ तेरे पैरों में है। मिट्टी में। याद रख — जब भी डर लगे, अपने तलवों पर ध्यान दे। मिट्टी से जुड़। और फिर साँस खींच।"
उस रात मैंने घंटों कसरत की। कालू काका मेरे पास बैठे रहे। मीरा दूर बैठी थी और जड़ी-बूटियाँ छाँट रही थी, पर उसकी नज़रें बार-बार मेरी तरफ़ उठती थीं।
जब मैंने साँस पकड़ी तो मेरा चेहरा लाल हो गया। मेरी आँखें फटने लगीं। पर मैंने छोड़ा नहीं। कालू काका गिन रहे थे — धीरे-धीरे, हर नंबर के साथ उनकी उँगली उठती जाती थी।
"चालीस," उन्होंने कहा। "अड़तालीस। पचास। बस। छोड़।"
मैंने साँस छोड़ी। मेरा सिर घूमा। मैं मिट्टी पर गिर पड़ा।
मीरा दौड़कर आई। उसने मेरा सिर अपनी गोद में रखा और कटोरे से पानी मेरे होंठों पर लगाया।
"बेवकूफ," उसने कहा। "इतनी जल्दी क्या है?"
"जल्दी है," मैंने कहा, हाँफते हुए। "कल सुबह अमर मैदान में खड़ा होगा। और मैं उससे लड़ूँगा नहीं — मैं उसे बचाऊँगा।"
उसका हाथ मेरे माथे पर रुका।
"तू अकेले नहीं हो," उसने कहा।
तीन शब्द। छोटे। सीधे।
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखें मेरी थीं। और उस पल मेरे अंदर कुछ हुआ जो मैं समझा नहीं — एक गर्माहट जो मिट्टी से नहीं आ रही थी, ऊपर से आ रही थी। छाती से।
"मीरा," मैंने कहा।
"हूँ।"
"तू… तू आज से रोज़ आएगी?"
उसने मेरे माथे पर से हाथ हटाया और मेरी आँखों में देखा।
"मैं तो रोज़ आ रही हूँ," उसने कहा। "एक हफ़्ते से। तुझे पता नहीं चला?"
मैं चुप हो गया।
कालू काका खाँसे और उठकर चले गए — बिना कुछ कहे, बस मुस्कुराकर। मीरा का चेहरा लाल हो गया। उसने अपनी नज़रें चुराईं और पोटली समेटने लगी।
"वो… वो मैं जाती हूँ," उसने कहा। "सुबह जल्दी आऊँगी। तेरे लिए दवा लाऊँगी। और…" वो रुकी। "और तेरी माँ के लिए भी कुछ लाऊँगी। उनके हाथ दुखते हैं चक्की से।"
"मीरा," मैंने कहा।
वो रुकी।
"थैंक्यू।"
वो मुस्कुराई। पहली बार। एक छोटी-सी मुस्कान, जो ज़्यादा देर नहीं टिकी — पर टिक गई मेरे अंदर।
"सॉरी," उसने कहा। "मैडम कहने के लिए।"
मैं हँस पड़ा। वो चली गई, और उसकी गंध — अदरक, काली मिर्च, तुलसी — मिट्टी में घुल गई।
मैं अकेला लेटा रहा। तारों को देखता रहा।
और फिर वो हुआ।
एक पत्थर आया — अखाड़े की दीवार पर ज़ोर से लगा। कटक। मैं उठ बैठा।
पत्थर पर काग़ज़ लिपटा था, और उस काग़ज़ में एक छोटी-सी ईंट बँधी थी। मैंने खोला।
लिखा था —
"तेरे भाई का पैर ठीक हो गया। पर अगली बार वो मैदान में तेरे सामने खड़ा होगा। ठाकुर का वादा।"
मैंने काग़ज़ को सूँघा।
स्याही। तेल। और मिट्टी के नीचे दबी वो पुरानी दवा।
वही गंध। वही आदमी।
मैंने काग़ज़ मुट्ठी में भींच लिया और दीवार के पार देखा। अंधेरा था। पर मुझे पता था वो वहीं खड़ा था — देख रहा था, और चाह रहा था कि मैं जानूँ कि वो देख रहा है।
कालू काका दौड़कर आए।
"क्या हुआ?" उन्होंने पूछा।
मैंने काग़ज़ उन्हें दिया। उन्होंने पढ़ा और उनका चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
"ये…" उनकी आवाज़ काँपी। "ये लिखाई…"
"क्या हुआ, कालू काका?"
"ये लिखाई मैंने पहले देखी है," उन्होंने धीरे से कहा। "बीस साल पहले। तेरे पापा की मौत से एक रात पहले। उनकी चारपाई पर एक काग़ज़ रखा था — इसी लिखाई में।"
मेरी साँस रुक गई।
"उस पर क्या लिखा था?" मैंने पूछा।
कालू काका ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में डर था।
"उस पर लिखा था — 'रणवीर, तेरी साँस भी मेरी है।'" उन्होंने काग़ज़ को मेरी तरफ़ बढ़ाया। "और अब ये… ये उसी हाथ से लिखा है। वही आदमी अभी भी ज़िंदा है, वीर। और वो तेरे सामने आ रहा है।"
॥
कालू काका का हाथ मेरे कंधे पर था, पर उनकी उँगलियाँ काँप रही थीं। मैंने वो काग़ज़ फिर पढ़ा — "तेरे भाई का पैर ठीक हो गया।" और मेरे अंदर एक ही बात घूम रही थी — अमर का पैर ठीक हो गया, यानी वो अब मेरे सामने खड़ा हो सकता है। लड़ सकता है।
मैंने काग़ज़ कालू काका को वापस दिया और उठ खड़ा हुआ।
"कहाँ जा रहा है?" उन्होंने पूछा।
"अमर के पास।"
"इस वक़्त? रात के दो बजे हैं।"
"तो क्या सुबह का इंतज़ार करूँ, काका? जब तक सूरज निकलेगा, वो ठाकुर के आदमी उसे फिर अपने पाले में ले लेंगे।"
कालू काका ने मेरी तरफ़ देखा, फिर धीरे से सिर हिलाया। "जा। पर एक बात सुन ले।" उन्होंने मेरी कलाई पकड़ी। "अमर तेरा भाई है। भाई से बात करते वक़्त ठाकुर मत बन जाना।"
मैं रुका। उनकी बात सीधी थी, और सच थी।
मैं गाँव के उस किनारे की तरफ़ भागा जहाँ अमर ठहरा था — रघुवीर के पुराने कमरे में। बीच रास्ते में मैंने देखा कि आसमान में बादल घुल रहे थे और हवा में नमी थी। बारिश आने वाली थी।
कमरे का दरवाज़ा खुला था। अंदर लालटेन जल रही थी — धीमी, पीली। अमर चारपाई पर बैठा था, और उसका लंगड़ा पैर सामने फैला था। पैर पर पट्टी बँधी थी, और पट्टी पर ताज़ी दवा की गंध थी — अदरक, तुलसी, और कुछ जो मैं पहचान नहीं पाया।
वो मेरी तरफ़ देखकर चौंका।
"तू?" उसने कहा। "इस वक़्त?"
मैं दरवाज़े पर ही खड़ा रहा।
"तेरा पैर ठीक हो गया?"
उसका चेहरा बदल गया। वो नीचे देखने लगा।
"किसने कहा?"
"काग़ज़ आया। दीवार पर पत्थर बाँधकर। उस पर लिखा था कि तेरा पैर ठीक हो गया, और अगली बार तू मेरे सामने खड़ा होगा।"
अमर ने कोई जवाब नहीं दिया। उसने अपना हाथ घुटने पर रखा और उँगलियाँ भींचने लगा।
"अमर।" मैं अंदर आया। "मुझे सच बता।"
"क्या सच?"
"ये कि ठाकुर ने तेरा इलाज करवाया। और बदले में कुछ माँगा।"
वो चुप रहा। उसकी चुप्पी ही जवाब थी। मेरे पेट में आग जली।
"क्या माँगा?" मेरी आवाज़ भारी हो गई।
"वीर—"
"क्या माँगा, अमर?"
वो उठा। उसके पैर पर ज़ोर पड़ा और उसका चेहरा दर्द से सिकुड़ा, पर वो खड़ा हो गया। मेरे सामने।
"उसने कहा," अमर की आवाज़ धीमी थी, "कि मैं तुझे मुकाबले से हटा दूँ। वरना…"
"वरना?"
"वरना माँ और गुड़िया को नुकसान होगा।"
कमरे की हवा भारी हो गई। मैंने अपने हाथ मुट्ठी में भींचे। मेरी नसें गरम हो गईं। मैंने एक कदम बढ़ाया और उसका गला पकड़ लिया।
"तूने मुझे बताया क्यों नहीं?" मैं चिल्लाया। "तू मेरे घर के पास रहता है, माँ तुझे अपना बेटा कहती है, गुड़िया तुझे लाल धागा बाँधती है, और तू ठाकुर की बात मानने की सोच रहा था?"
अमर ने मेरा हाथ नहीं छुड़ाया। उसकी आँखें मेरी आँखों में थीं। उनमें शर्म थी — और डर।
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