Spirit of a Fighter – Chapter 562
मैंने मिट्टी को देखा। फिर मीरा की शीशी को। फिर अपने हाथों को। मुझे लगा जैसे ये कमरा छोटा होता जा रहा है, और दीवारें मेरी तरफ आ रही हैं।
"एक बात समझ लो," मैंने कहा। "ठाकुर ने मुझे अंदर बुलाया। मेरा नाम खुद लिखवाया। मेरे कान में बात कही। और अब हमारी डिब्बी में चिट्ठी। ये सब जुड़ा हुआ है, मीरा। तुम्हारे पिता की दवा, हरनाम की मौत, भैरव का धागा — और अब ये चिट्ठी। हम सब एक ही जाल में फँसे हैं।"
टिंकू ने अपना सिर पकड़ लिया। "भाई, मेरी मिठाई। तीन दिन। मैंने माँ के सामने कसम खाई थी कि मैं इसे बेचकर तुम्हारे लिए नए जूते लाऊँगा।"
मेरा दिल भर आया। मैंने उसका कंधा पकड़ा।
"तेरी मिठाई अभी बाकी है," मैंने कहा। "पहले हमें ये सफ़र पूरा करना है। जब ये सब ख़त्म होगा, तब मैं खुद तेरे साथ बैठकर पूरी डिब्बी बनाऊँगा। और उसमें चिट्ठी नहीं होगी। सिर्फ़ बादाम और खोया होगा।"
टिंकू ने अपनी आँखें पोंछीं। "वादा?"
"वादा।"
मीरा ने मेरी तरफ देखा। उसकी नज़र में कुछ बदल गया था। जैसे उसने मुझे पहली बार ठीक से देखा हो।
"चलो," वो बोली। "शहर पहुँचना है। और ठाकुर का अखाड़ा ऐसी जगह नहीं जहाँ देर की जाए।"
हम निकल पड़े। रास्ते भर टिंकू चुप रहा, जो उसके लिए किसी करामात से कम नहीं था।
शहर पहुँचकर हम बड़े अखाड़े के बाहर खड़े हुए। पत्थर की ऊँची दीवार, लोहे का बड़ा गेट, और अंदर से कुश्ती की आवाज़ें — मिट्टी में पैरों की थाप, साँसों की भारी आवाज़, और बीच-बीच में कोई दाँत भींचकर चिल्लाता।
गेट पर पहरेदार ने मेरा रास्ता रोक दिया। मोटा आदमी, हाथ में लाठी।
"नाम?"
"वीर सिंह।"
वो हँसा। "बहुत वीर सिंह हैं यहाँ।"
तभी अंदर से एक आवाज़ आई — भारी, धीमी, जैसे किसी पुराने पीपल के पेड़ की जड़ बोली हो।
"छोड़ दो। ये वही लड़का है जिसका नाम ठाकुर साहब ने खुद लिखवाया है।"
पहरेदार का हाथ झट से उठ गया। गेट खुला।
अंदर जाकर मैंने पहले भैरव को देखा — एक कोने में खड़ा, मुस्कुरा रहा था। वो मुस्कान ऐसी थी जैसे किसी ने उसे चेहरे पर चिपका दी हो। और उसके पीछे एक बड़ी कुर्सी पर बैठे थे ठाकुर महेंद्र सिंह — चौड़े शरीर, सफ़ेद दाढ़ी, हाथ में सोने की छड़ी। उनकी आँखें मुझ पर ऐसे टिकी थीं जैसे बाज़ अपने शिकार पर।
टिंकू मेरे कान के पास झुका। "भाई, ये तो मेरे गाँव के ज़मींदार से भी बड़ा दिखता है।"
मैं मुस्कुराया। "हाँ, पर इसकी मिट्टी की गंध भी वैसी ही है — झूठ की।"
ठाकुर उठे। धीरे-धीरे मेरी तरफ आए। उनकी छड़ी ज़मीन पर ठक-ठक कर रही थी। मेरे सामने रुके, और उनका भारी हाथ मेरे कंधे पर रखा। उनकी हथेली गरम थी, जैसे ऊपर से धूप में तपी हो।
"बेटा," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ में मधुरता थी, पर वो मधुरता उस शहद जैसी थी जिसमें ज़हर घुला हो। "मैं तुम्हारी सूंघने की शक्ति के बारे में सब जानता हूँ… और मैंने तुम्हारे लिए एक खास इंतज़ाम किया है।"
मेरे कंधे पर उनका हाथ भारी हो गया। भैरव की मुस्कान चौड़ी हो गई। और मुझे तभी समझ आया — ये अखाड़ा नहीं, एक जाल है। और मैं उस जाल में अपने पैरों से नहीं, अपनी सूंघने की शक्ति से आया हूँ।
॥
ठाकुर महेंद्र सिंह का हाथ मेरे कंधे पर था, और उनकी आँखों में वो चमक थी जो शिकारी की आँख में होती है जब वो जान लेता है कि शिकार जाल में आ गया।
"चलो, अंदर चलो," उन्होंने कहा। "तेरे लिए कुछ लोगों से मिलवाता हूँ।"
मैं उनके पीछे चला। भैरव मेरे ठीक पीछे था, इतना पास कि उसकी साँस मेरी गर्दन पर लग रही थी। उसकी साँस में वही पुरानी गंध थी — तेल, पान, और उसके नीचे दबी हुई वो कड़वाहट जो बोतलों से आती थी। मेरी नाक ने पहचान लिया, पर मैंने चेहरे पर कुछ नहीं आने दिया।
अंदर का हॉल बड़ा था। फर्श पर लाल मिट्टी बिछी थी, दीवारों पर पुराने पहलवानों की तस्वीरें टँगी थीं। हवा में पसीने, तेल और मिट्टी की वो गंध थी जो अखाड़े में ही मिलती है। पर इस हवा में कुछ और भी था — कुछ ऐसा जो मुझे गाँव के अखाड़े में नहीं मिला था। एक मीठी सी बू, जैसे कोई चीज़ सड़ रही हो पर उस पर इत्र डाल दिया गया हो।
हॉल में दर्जन भर से ज़्यादा पहलवान बैठे थे। कुछ दंड लगा रहे थे, कुछ मिट्टी गूंध रहे थे, कुछ बैठकर मालिश करवा रहे थे। जैसे ही हम अंदर आए, सबकी नज़र हम पर पड़ी। और फिर ठाकुर ने अपनी सोने की छड़ी ज़मीन पर एक बार ठोकी।
ठक।
पूरा हॉल चुप हो गया। छड़ी की आवाज़ इतनी छोटी थी, पर उसका असर ऐसा था जैसे किसी ने ढोल बजा दिया हो।
"ये लड़का," ठाकुर ने मेरी तरफ इशारा किया, "गाँव से आया है। रामपुर से।" उन्होंने रुककर चारों तरफ देखा। "और इसका दावा है कि ये इस बार भारत केसरी जीतेगा।"
एक पल की चुप्पी रही। फिर हॉल गूँज उठा।
हँसी। ज़ोर की हँसी। कोई पेट पकड़कर हँस रहा था, कोई मिट्टी में हाथ पटक रहा था। एक पहलवान तो इतना हँसा कि उसका चेहरा लाल हो गया और वो कुर्सी से फिसलकर नीचे गिर पड़ा।
मैं वहीं खड़ा रहा। मेरे चेहरे पर कोई भाव नहीं था। मैंने बस उन सबको सुना — उनकी हँसी में जो गंध थी। कुछ की हँसी में डर था, कुछ में ताना, और कुछ में वो खोखलापन जो उन लोगों में होता है जो सालों से एक ही जगह पर बंधे हुए हैं।
तभी एक पहलवान उठा। मोटा, भारी, छोटी मूँछें, पेट ऐसा जैसे किसी ने ऊपर से ड्रम रख दिया हो। उसने अपनी गर्दन दोनों तरफ घुमाई, हड्डियाँ चटकीं, और वो सीधा मेरे सामने आकर खड़ा हो गया।
"गाँव वाले," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो घमंड था जो सिर्फ़ शहर के अखाड़े में पलता है, "यहाँ आने के लिए किसने कहा तुम्हें?"
उसने मेरे कंधे पर धक्का दिया। ज़ोर का धक्का। मैं एक कदम भी नहीं हिला। मेरे पैर मिट्टी में गड़े थे — वो मिट्टी जो मैंने बचपन से अपने हाथों में भरी थी, जो मेरी माँ की चक्की की आवाज़ में बसी थी।
पहलवान ने मुझे हिलते न देखा तो उसकी आँखें तन गईं। उसने फिर धक्का दिया, और इस बार मैंने उसका हाथ पकड़ लिया। उसकी कलाई मेरी मुट्ठी में आई, और मैंने आँखें बंद करके साँस खींची।
गंध आई। साफ़, तेज़।
"तुम कल रात देर तक जागे हो," मैंने धीरे कहा। मेरी आवाज़ हॉल में फैल गई। "रात के तीन बजे तक। तुमने कुछ पिया भी है — कड़वा, गाढ़ा। और तुम्हारी कमर में दर्द है। नीचे से ऊपर तक, बाईं तरफ़ ज़्यादा। तुम आज लड़ने लायक नहीं हो। अगर लड़ोगे, तो तुम्हारी कमर वहीं टूट जाएगी जहाँ से दर्द शुरू होता है।"
पहलवान का चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
उसने अपना हाथ छुड़ाने की कोशिश की, पर मैंने नहीं छोड़ा। मैं उसकी कलाई में धड़कन महसूस कर रहा था — वो तेज़ थी, बेकाबू, किसी डरे हुए जानवर की तरह।
"तुम्हें कैसे पता?" उसने फुसफुसाया। उसकी आवाज़ अब घमंड की नहीं, डर की थी।
मैंने उसका हाथ छोड़ दिया। "गंध से," मैंने कहा। "तुम्हारे शरीर में दर्द की गंध है। और देर रात तक जागने की। मैं गलत बोलूँ तो सबके सामने बताओ।"
वो कुछ नहीं बोला। उसका मुँह खुला रह गया, जैसे कोई मछली हवा में तड़प रही हो। फिर वो पीछे हटा, अपनी जगह पर बैठ गया, और अपना सिर नीचे कर लिया।
हॉल में फिर चुप्पी छा गई। पर इस बार वो चुप्पी हँसी वाली नहीं थी। इस बार वो सन्नाटा था। ऐसा सन्नाटा जिसमें लोग अपनी साँसें भी रोक लेते हैं।
मैंने पीछे मुड़कर ठाकुर की तरफ देखा। उनकी आँखों में वो चमक आ गई थी जो पहले नहीं थी। ये लालच की चमक नहीं थी। ये किसी और चीज़ की चमक थी — जैसे किसी ने सालों बाद कोई खोई चीज़ देखी हो।
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