Spirit of a Fighter – Chapter 561
और फिर उन्होंने मेरे कान के पास झुककर, इतना धीरे कि सिर्फ़ मैं सुन सकूँ, कहा, "भैरव ने तुम्हें जो लाल पोटली दी थी, वो अपनी माँ को वापस कर देना। उसमें जो लाल धागा है, वो मेरी पहली पत्नी का है। उसने उसे भैरव के गले में बाँधा था जिस दिन वो पैदा हुआ था।"
मेरे पैरों के नीचे की मिट्टी खिसक गई। मैंने पलक झपकाई। ठाकुर साहब सीधे हो गए और मुस्कुराए। वो मुस्कान जो अब मेरे लिए सिर्फ़ मुस्कान नहीं थी। वो एक दीवार थी जिसके पीछे बहुत कुछ छुपा था।
वो पलटे और अपनी कुर्सी की तरफ बढ़े। चलते हुए उन्होंने कहा, "भैरव, इन्हें उस कमरे में ले जाओ जहाँ मिट्टी सबसे ज़्यादा गहरी है।"
भैरव ने सिर हिलाया। उसकी मुस्कान अब मेरे लिए किसी और चीज़ का नाम थी।
मैंने मीरा की तरफ देखा। उसके चेहरे पर वो सवाल था जो मेरे दिमाग में भी था। हमने कुछ नहीं कहा। कहते तो सब सुन लेते।
टिंकू ने मेरा हाथ पकड़ा। उसकी पकड़ कसकर थी।
"भाई," उसने फुसफुसाया, "मुझे यहाँ अच्छा नहीं लग रहा।"
"मुझे भी नहीं," मैंने कहा। "पर हमें रात यहाँ रुकना है।"
"क्यों?"
"क्योंकि अगर हम भागे, तो कल का मुकाबला नहीं होगा। और अगर मुकाबला नहीं हुआ, तो सच नहीं खुलेगा।"
टिंकू ने मेरी तरफ देखा। फिर मीरा की तरफ। फिर अपनी जेब में हाथ डाला और वो रसीद निकाली जो उसने राख में पाई थी।
"ठीक है," उसने कहा। "पर भाई, एक बात।"
"क्या?"
"अगर आज रात कुछ हो जाए, तो याद रखना — मेरी मिठाई अभी बाकी है।"
मैं हँसा। ज़ोर से। इतनी ज़ोर से कि भैरव ने पलटकर देखा। और उसकी आँखों में वो चीज़ थी जो मैंने पहली बार देखी — हैरानी।
हम भैरव के पीछे-पीछे चले। अखाड़े के पीछे की तरफ़। वहाँ एक कमरा था जिसका दरवाज़ा लोहे का था। भैरव ने उसे खोला। अंदर लालटेन जल रही थी। फर्श पर मिट्टी बिछी थी — गहरी, लाल, और उसमें कुछ चमक रहा था जैसे रात में आसमान।
"यहाँ सोना," भैरव ने कहा। "सुबह मैं आऊँगा।"
वो पलटा। फिर रुका। मेरी तरफ देखा।
"वीर," उसने कहा। उसकी आवाज़ में वो मिठास नहीं थी जो गाँव में थी। अब वो सीधी थी। सपाट। "ठाकुर साहब तुमसे कुछ कहा? कान में?"
मैंने उसकी आँखों में देखा। वहाँ कुछ था। डर नहीं। बेचैनी। जैसे कोई बच्चा जानना चाहता हो कि उसके बारे में क्या बात हुई।
"हाँ," मैंने कहा।
"क्या?"
"ये कि तुम्हारी मिट्टी भी अब बासी हो गई है।"
भैरव का चेहरा नहीं बदला। पर उसकी आँखें बदलीं। उनमें वो चीज़ आई जो बरसों से सोई थी और अब जाग रही थी।
"अच्छा," उसने कहा। "तो खेल शुरू हो गया।"
वो बाहर निकला और दरवाज़ा बंद कर दिया। लोहे की सिटकनी चढ़ी। उसकी आवाज़ आई — दरवाज़े के पार से।
"सुबह पाँच बजे। देर मत करना।"
उसके कदम दूर गए।
कमरे में सन्नाटा था। टिंकू ने अपनी टोपी उतारी और मिट्टी पर बैठ गया। मीरा दीवार से टेक लगाकर खड़ी हो गई। मैंने उस लालटेन को देखा जो एक कोने में जल रही थी और उसकी रोशनी में मिट्टी के कण सोने जैसे चमक रहे थे।
"वो क्या था?" मीरा ने पूछा। "ठाकुर ने तुम्हारे कान में क्या कहा?"
मैंने लंबी साँस ली। फिर मैंने उन दोनों को बताया — लाल पोटली, लाल धागा, ठाकुर की पहली पत्नी।
टिंकू ने सीटी बजाई। "मतलब भैरव ठाकुर का बेटा है?"
"नहीं," मीरा ने कहा। उसकी आवाज़ में वो ठंडक थी जो सच बोलने से पहले आती है। "लाल धागा ठाकुर की पहली पत्नी का है। पर इसका मतलब ये नहीं कि भैरव उसका बेटा है। इसका मतलब ये है कि ठाकुर की पहली पत्नी ने भैरव को गले लगाया था — जिस दिन वो पैदा हुआ।"
"तो?" टिंकू ने कहा।
"तो," मैंने कहा, "ठाकुर की पहली पत्नी भैरव की माँ नहीं थी। पर वो उसे अपने बेटे जैसा मानती थी। और ठाकुर अब भी उस धागे को याद रखे हुए हैं।"
मीरा ने मेरी तरफ देखा। "तुम क्या कहना चाह रहे हो?"
"मैं ये कहना चाह रहा हूँ कि भैरव सिर्फ़ माधव का बेटा नहीं है। उसका कोई और भी है। कोई जिसे ठाकुर बीस साल से ढूँढ रहे हैं। और वो उसे मेरे ज़रिए ढूँढ रहे हैं।"
टिंकू ने अपना सिर खुजाया। "भाई, मेरा दिमाग खराब हो रहा है।"
"मेरा भी," मैंने कहा। "पर एक बात साफ़ है।"
"क्या?"
"ठाकुर आज रात हमें अकेला नहीं छोड़ेगा। वो कुछ देख रहा है। कुछ सुन रहा है। हमें ऐसा कुछ नहीं करना जो वो देख न सके।"
मीरा ने अपना बैग खोला और उसमें से एक छोटी सी शीशी निकाली — पीली, धुंधली। उसे खोला और उसमें से कुछ मिट्टी पर डाल दिया।
"क्या है ये?" मैंने पूछा।
"नींबू का रस और नमक," उसने कहा। "मेरी दादी बताती थीं — जहाँ मिट्टी में मिलाया जाए, वहाँ का ज़हर बेअसर हो जाता है। अगर यहाँ की मिट्टी में कुछ मिला है, तो ये उसे बेकार कर देगा।"
मैंने उसकी तरफ देखा। उसकी आँखों में वो चीज़ थी जो मुझे पहली बार उस दिन अच्छी लगी थी जब उसने मुझे अखाड़े से बाहर धक्का दिया था — ज़िद। और उस ज़िद के पीछे एक और चीज़ थी। परवाह।
"तुमने ये पहले क्यों नहीं बताया?" मैंने पूछा।
"क्योंकि मुझे पता था तुम पूछोगे 'क्या ये काम करता है?' और मैं सच नहीं बोल पाती।"
"तो सच क्या है?"
"सच ये है," उसने कहा, "कि मैंने इसे अपने पिता पर आज़माया है। उनके कमरे की मिट्टी में। और उनकी हालत में फ़र्क पड़ा था।"
टिंकू ने अपना मुँह खोला। "मतलब तुम्हारे पिता…"
"मेरे पिता को ज़हर दिया जा रहा है," मीरा ने कहा। उसकी आवाज़ सपाट थी, पर उसके हाथ काँप रहे थे। "बीस साल से। और अब मुझे पता है कैसे।"
कमरे में सन्नाटा छा गया। लालटेन की लौ हिली। मैंने मिट्टी को देखा जिस पर नींबू का रस गिरा था। वो जगह अब थोड़ी गीली लग रही थी, जैसे उसने कुछ कहा हो।
"मीरा," मैंने धीरे से कहा। "तुम्हारे पिता को ज़हर कैसे दिया जा रहा है? वो तो अखाड़े में आते ही नहीं?"
"वो नहीं आते," उसने कहा। "पर उनकी दवा आती है। हर हफ्ते। एक आदमी लाता है — सफ़ेद कुर्ता, चश्मा। मुंशीजी का आदमी कहकर।"
मेरे अंदर कुछ ठंडा हुआ। "चश्मा? पतला आदमी?"
"हाँ।"
मैंने टिंकू की तरफ देखा। टिंकू ने मेरी तरफ देखा। उसका मुँह खुला रह गया।
"हरनाम," हम दोनों ने एक साथ कहा।
मीरा ने हम दोनों को देखा। "कौन हरनाम?"
"वो जो मरा मिला था," मैंने कहा। "नहर किनारे। मुँह से झाग।"
मीरा का चेहरा बदल गया। वो दीवार से हटी और मेरे पास आकर बैठ गई।
"तो जिस आदमी ने मेरे पिता को ज़हर दिया, वो मर गया?" उसकी आवाज़ में गुस्सा था। "बिना कुछ बताए?"
"उसने कुछ बताया था," मैंने कहा। "मुट्ठी में पीतल की चाबी छोड़ गया।"
"किसकी चाबी?"
"अभी नहीं पता। पर लगता है वो हमें कहीं ले जाएगी।"
टिंकू उठ खड़ा हुआ। "भाई, एक बात है।"
"क्या?"
"क्या?"
"वो मिठाई की डिब्बी," टिंकू ने कहा। उसका गला भरा हुआ था। "जो रास्ते में मैंने खोली थी। उसमें काग़ज़ का टुकड़ा था न — 'रास्ता बंद है'। भाई, सोच। हमने उसे मज़ाक समझा। पर क्या पता वो किसी ने… किसी ने जान-बूझकर रखा हो।"
मेरे हाथ ठंडे पड़ गए। मैंने टिंकू की तरफ देखा। उसकी आँखें लाल थीं — मिठाई के लिए नहीं, डर से।
"तुम्हारी डिब्बी किसने छुई थी?" मैंने पूछा। "आज सुबह से अब तक।"
"किसी ने नहीं।" फिर वो रुका। "रुको। पुल पर। जब हम पानी पी रहे थे। मैंने डिब्बी बोरी पर रख दी थी। दो मिनट के लिए।"
"दो मिनट काफ़ी हैं," मीरा ने कहा। उसकी आवाज़ धीमी थी, पर तेज़। "किसी को पता था कि हम इस रास्ते आ रहे हैं। किसी ने हमें पहले से देख रखा है।"
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