Spirit of a Fighter – Chapter 559
वो कुछ नहीं बोला। अपना हाथ छुड़ाया और चला गया।
॥
हम तीनों उस हवेली से निकले तो रात खत्म हो रही थी। आसमान में वो हल्की सी लाली आ रही थी जो सूरज को छुपाने की कोशिश करती है, पर खुद पकड़ी जाती है। टिंकू अपने दोनों हाथ जेब में डाले हुए चल रहा था और हर दो कदम पर पीछे मुड़कर देख रहा था।
"भाई, वो सूट वाला अभी भी हमें देख रहा है," उसने फुसफुसाया।
"देखने दे," मैंने कहा। "हमें रास्ता चलना है।"
मीरा मेरे बराबर में चल रही थी। उसके कंधे पर बैग था और उसका चेहरा शांत था, पर मैंने देखा उसकी उँगलियाँ बैग के पट्टे पर बहुत कसकर जमी थीं। जब कोई डरता है और नहीं दिखाना चाहता, तो उसके हाथ उसका सच बोल देते हैं।
हम शहर के बाहर निकले तो एक ठेला चाय वाला मिला। हमने तीन कटोरी चाय पी और चल पड़े। रास्ते में टिंकू की जेब से एक कागज़ निकला और हवा में उड़ गया। वो दौड़ा, उसे पकड़ा और सीने से लगाकर लौटा।
"क्या है ये?" मीरा ने पूछा।
"नहीं, कुछ नहीं," टिंकू ने जल्दी से जेब में ठूंस दिया।
"टिंकू।" मैंने उसकी तरफ देखा। "हम तीन लोग एक ही रास्ते पर हैं। तेरी जेब में जो है, वो भी हमारा है।"
टिंकू ने मेरी तरफ देखा। फिर मीरा की तरफ। फिर आसमान की तरफ, जैसे वहाँ से कोई जवाब आएगा। नहीं आया। उसने जेब से कागज़ निकाला और मेरी तरफ बढ़ा दिया।
ये एक रसीद थी। एक पुरानी, ज़र्द पड़ी रसीद। ऊपर लिखा था — "टिंकू मिष्ठान भंडार। बिक्री: बीस किलो। बकाया: कुछ नहीं।"
मैंने नीचे की तरफ देखा। नीचे एक लाइन थी जो टिंकू की लिखाई में नहीं थी — किसी बड़े आदमी की लिखाई थी, सीधी और साफ़।
"बेटा, तेरी मिठाई पहले किसी ने नहीं खाई। अब खाएगा। तैयार रह।"
"ये कहाँ से आई?" मैंने पूछा।
"दुकान जलने वाली रात," टिंकू ने धीरे से कहा। "राख में पड़ी थी। मुझे लगा कोई हिसाब की पर्ची है। पर ये…" उसने गला साफ़ किया। "भाई, ये मेरे बाप की लिखाई है। मैंने उनकी कोई चीज़ नहीं देखी थी। वो जब मरा, मैं पाँच साल का था।"
मीरा ने रसीद मेरे हाथ से ली। उसने उसे ध्यान से पढ़ा।
"तुम्हारे बाप मिठाई बनाते थे?" उसने पूछा।
"हाँ," टिंकू ने कहा। "गाँव में सबसे अच्छी। पर फिर…"
"फिर क्या?"
"फिर वो अखाड़े में जाने लगे। माँ कहती थी वो भैरव के साथ उठता-बैठता था। और एक दिन…" टिंकू ने हाथ हिलाया। "बस, एक दिन वो नहीं उठे।"
मैं रुक गया। सड़क के बीच में।
"टिंकू," मैंने कहा। "तेरे बाप भी अखाड़े में जाते थे?"
"हाँ, पर वो पहलवान नहीं थे। वो खाना बनाते थे। पहलवानों के लिए।"
मीरा ने मेरी तरफ देखा। उसकी आँखों में वही बात थी जो मेरे दिमाग में चल रही थी।
"खाना," मीरा ने कहा। "पानी में ज़हर घोलने वाला तो भैरव था। पर खाने में?"
टिंकू का चेहरा उतर गया। "मतलब मेरे बाप…"
"मतलब ये है," मैंने कहा, "कि तेरा बाप शायद उन लोगों में से था जो सच जानते थे। और इसीलिए…"
"इसीलिए उन्हें चुप करा दिया गया," मीरा ने पूरा किया।
टिंकू कुछ देर चुप खड़ा रहा। फिर उसने रसीद वापस ली, तह करके जेब में रखी और आगे चल पड़ा।
"तेरे बाप की मिठाई," मैंने उसके पीछे-पीछे चलते हुए कहा, "मुझे लगता है वो अब भी हमारे साथ है।"
टिंकू ने पलटकर देखा। उसकी आँखें भरी हुई थीं, पर वो हँसा।
"भाई, तू बातें बड़ी अच्छी करता है। पर पहले ये सफ़र पूरा कर।"
हम दोपहर तक नहर के पुल पर पहुँचे। यहाँ से रास्ता दो हिस्सों में बंटता था — एक गाँव की तरफ, एक शहर की तरफ। पुल के नीचे पानी बहुत धीमा चल रहा था, जैसे वो भी सोच रहा हो कि कहाँ जाना है।
टिंकू ने अपना बैग खोला। उसमें से एक लोहे का डिब्बा निकाला। उस डिब्बे को उसने बड़े प्यार से खोला — जैसे कोई संदूक खोल रहा हो जिसमें सारी दुनिया की दौलत हो।
डिब्बा खुला। मैंने अंदर देखा।
खाली।
नहीं — खाली नहीं था। उसमें कागज़ का एक टुकड़ा था। छोटा-सा। मुड़ा हुआ।
टिंकू ने उसे निकाला। उसके हाथ काँप रहे थे। उसने खोला और पढ़ा। उसका चेहरा पत्थर जैसा हो गया।
"क्या है?" मीरा ने पूछा।
टिंकू ने कागज़ मेरी तरफ बढ़ा दिया। उस पर सिर्फ़ तीन शब्द थे, काले रंग में, मोटे अक्षरों में।
रास्ता बंद है।
"ये मेरी तीन दिन की मेहनत थी," टिंकू ने धीरे से कहा। उसकी आवाज़ टूट रही थी। "तीन दिन। मैंने उसमें घी खुद फेंटा। खोया खुद बनाया। बादाम भिगोकर रात भर रखे। माँ ने भी मदद की। और उसने…" उसने कागज़ को मुट्ठी में कस लिया। "उसने मेरी डिब्बी खाली कर दी और ये कागज़ रख दिया।"
मैंने उसका हाथ पकड़ा। उसकी मुट्ठी ढीली की। कागज़ निकाला।
"टिंकू," मैंने कहा। "देख।"
"क्या देखूँ?"
"ये कागज़। इसे सूंघ।"
टिंकू ने मेरी तरफ अजीब तरह देखा। फिर भी उसने कागज़ नाक के पास लाया। मीरा भी पास आ गई।
"क्या है?" उसने पूछा।
"तेल," मैंने कहा। "भैरव के मूँछों वाला तेल। और…" मैंने गहरी साँस ली। "और मिट्टी। तहखाने की मिट्टी।"
मीरा की आँखें फैल गईं। "मतलब भैरव ने…"
"भैरव ने खुद ये डिब्बा खोला," मैंने कहा। "या उसके आदमी ने। पर जो भी किया, उसने यहाँ तक पहुँचने के लिए हमारा रास्ता पहले ही तय कर लिया था।"
"पर कैसे?" टिंकू ने कहा। "हम तो अभी-अभी शहर से निकले हैं।"
"टिंकू," मैंने कहा, "भैरव आज ठाकुर के पास था। हमने खुद देखा। उसके आदमी बाहर खड़े थे। जब हम ठाकुर के कमरे में थे, तब किसी ने हमारा बैग खोला।"
मीरा ने अपना बैग खोला। उसमें सब कुछ वैसा ही था। उसने बैग की ज़िप बंद की और सीधी हो गई।
"तो अब?" उसने पूछा।
मैंने कागज़ को अपनी जेब में रखा। फिर टिंकू के कंधे पर हाथ रखा।
"तेरी मिठाई अभी बाकी है," मैंने कहा। "अभी ये डिब्बा खाली है। पर मैं तुझसे वादा करता हूँ — जिस दिन ये भरेगा, उस दिन तेरा नाम पूरा शहर बोलेगा। पहले हमें ये सफ़र पूरा करना है।"
टिंकू ने मेरी तरफ देखा। उसकी आँखों में पानी था, पर वो रोया नहीं। उसने अपनी टोपी उतारी, बाल सहलाए, और फिर से टोपी पहनी — जैसे कोई सिपाही अपना हेलमेट ठीक करता है।
"ठीक है," उसने कहा। "पर सुन भाई — जब मेरी मिठाई जीतने वाले पहलवान के मुँह में जाएगी, तो पहला टुकड़ा तेरे मुँह में जाएगा। और दूसरा…" वो मीरा की तरफ देखकर हँसा। "दूसरा मैडम के मुँह में।"
मीरा ने उसकी तरफ देखा। "मैडम?"
"माफ़ करना," टिंकू ने हाथ जोड़े। "मीरा जी। मीरा जी के मुँह में।"
मीरा हँसी। पहली बार उस दिन में हँसी। और उस हँसी में वो बात थी जो मुझे अच्छी लगी। जैसे किसी बंद कमरे में हवा आ गई हो।
हम आगे बढ़े।
शहर का अखाड़ा गाँव वाले अखाड़े से तीन गुना बड़ा था। मैंने उसकी दीवार देखी और मेरा मुँह खुला रह गया। पत्थर की ऊँची दीवार — लाल मिट्टी से नहीं, सीमेंट से। लोहे का बड़ा गेट जिस पर सोने का रंग चढ़ा था। गेट के ऊपर एक बड़ा सा साइन बोर्ड — "वीरभद्र अखाड़ा।" और नीचे छोटे अक्षरों में — "स्थापना: एक सौ साल पहले।"
अंदर से आवाज़ें आ रही थीं। पैरों के नीचे मिट्टी के गिरने की आवाज़। किसी के गिरने की आवाज़। फिर तालियाँ। फिर एक आवाज़ जो किसी को डाँट रही थी।
टिंकू ने मेरी बाँह पकड़ी। "भाई, ये अखाड़ा नहीं है। ये तो किला है।"
"हाँ," मैंने कहा। "और किले में सबसे पहले दरवाज़ा देखना पड़ता है।"
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