Spirit of a Fighter – Chapter 556
इतनी दूर से? इतने हाथों से गुज़रकर भी?
मैंने लिफ़ाफ़ा खोला। अंदर एक मोटा काग़ज़ था, जिस पर बड़े अक्षरों में लिखा था — "भारत केसरी मल्लयुद्ध प्रतियोगिता।"
टिंकू ने मेरे कंधे के ऊपर से पढ़ा और ज़ोर से बोला, "भाई! भाई, ये तो वही मुकाबला है! जो शहर में होता है! जिसमें पूरे इलाक़े के पहलवान आते हैं!"
"क्या है ये?" मैंने उस लंबे आदमी से पूछा।
"ठाकुर साहब ने तुम्हारा नाम खुद लिखवाया है," उसने कहा, और मुस्कान ज़रा सी बढ़ गई। "इस साल का मुकाबला उनके ही मैदान में है। वो चाहते हैं कि रामपुर का नाम वहाँ गूँजे।"
"रामपुर का नाम?" मैंने कहा। "या उनका?"
आदमी की मुस्कान नहीं हिली। पर उसकी आँखें ज़रा सिकुड़ीं।
"तुम्हें बुलाया जा रहा है," उसने कहा। "ये बहुत बड़ी बात है। इस उम्र में, इस हाल में, कोई मज़दूर सीधा भारत केसरी में? ये किस्मत है।"
और तभी दरवाज़े की आवाज़ आई।
माँ बाहर आईं। उन्होंने दुपट्टा सिर पर रख लिया था और हाथ में वो ढक्कन था — नहीं, ढक्कन नहीं, वो पीतल की छोटी थाली जिसमें उन्होंने अभी तक दीया रखा था। दीया जल रहा था, और हवा में उसकी लौ काँप रही थी।
वो सीधी उस आदमी के सामने आकर खड़ी हुईं।
"तुम ठाकुर के यहाँ से आए हो?" माँ ने पूछा।
"जी, माता जी।"
"तो बताओ," माँ ने कहा, और उनकी आवाज़ में वो ठंडक थी जो सुबह की मिट्टी में होती है, "मेरे बेटे को बुलाने से पहले — वहाँ मेरे बेटे का दम है, या उसके ज़हर का?"
आदमी का चेहरा बदल गया। एक पल के लिए। फिर उसने खुद को सँभाला।
"माता जी, मैं कुछ समझा नहीं।"
"तुम समझ गए," माँ ने कहा, और उन्होंने दीया उसकी तरफ़ ज़रा ऊपर किया। "जो आदमी अपने घर से दूसरे के घर तक ज़हर भेजता है, वो न्योता भी ज़हर में लपेटकर भेजता है।"
आदमी ने एक कदम पीछे रखा। बहुत छोटा-सा। पर मैंने देखा।
और उस वक़्त मीरा आई। वो भीतर से आई, पर उसके हाथ में कुछ था — नहीं, वो कुछ नहीं लाई, वो सिर्फ़ आई। पर जैसे ही उसने वो काग़ज़ देखा, उसके चेहरे का रंग बदला।
"वो दो," उसने कहा।
मैंने काग़ज़ उसे दिया। मीरा ने उसे दीये के पास लाकर पढ़ा। उसके होंठ हिल रहे थे, और फिर रुक गए।
"यहाँ नीचे शर्त लिखी है," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वो तेज़ी थी जो अदालत में आती थी। "छोटे अक्षरों में। किसी ने इसे जानबूझकर छोटा रखा है।"
"क्या लिखा है?" रणवीर सिंह ने कहा। वो भी बाहर आ गए थे, और उनका व्हीलचेयर उस आदमी के ठीक सामने रुका।
मीरा ने पढ़ा, "जो पहलवान इस मुकाबले में जीतेगा, उसे रणवीर अखाड़े का पूरा हक़ मिलेगा। और जो हारेगा…" वो रुकी, और उसने मेरी तरफ़ देखा। "…उसे रामपुर छोड़ना पड़ेगा। हमेशा के लिए।"
टिंकू की खुशी उसी पल मर गई। उसने अपनी टोपी उतार ली और सीने से लगा ली।
"ये तो…" उसने कहा, और आवाज़ फँस गई, "ये तो जुआ है।"
"ये जुआ नहीं है," रणवीर सिंह ने कहा, और उनकी आवाज़ में वो गरज लौट आई जो पहलवानों की होती है। "ये शिकार है। जाल है।"
उस लंबे आदमी ने अपनी जेब से घड़ी निकाली और देखी।
"मुझे जवाब चाहिए," उसने कहा। "ठाकुर साहब इंतज़ार नहीं करते।"
और मैंने उस वक़्त कुछ किया जो शायद मुझे नहीं करना चाहिए था। पर मैंने किया।
मैं हँसा।
नहीं, हँसी नहीं थी। वो शांति थी — वो शांति जो लड़ाई से पहले आती है, जब सब कुछ तय हो जाता है।
"तो ठीक है," मैंने कहा। "मैं खुद जाकर उनसे मिलूँगा।"
"वीर," माँ ने कहा।
"माँ," मैंने उनकी तरफ़ देखा, "आपने खुद कहा था — जो लड़ाई मिट्टी में लड़ी जाती है, वो अकेले लड़ी जाती है। और उसके बाद जो सच की लड़ाई होती है, वो सब मिलकर लड़ते हैं।"
माँ मेरी तरफ़ देखती रहीं। दीये की लौ उनकी आँखों में दो बार जल रही थी।
"ये सच की लड़ाई है," मैंने कहा। "और मैं अकेला नहीं जा रहा।"
आदमी ने सिर हिलाया और मुड़ने लगा।
"कल सुबह दस बजे," उसने कहा। "गाड़ी भेज दी जाएगी।"
"रुको," मैंने कहा।
वो रुका, और पलटा।
और मैं उसके पास गया। इतने पास कि मेरी साँस उसके कान तक पहुँचे। वो मुझसे ज़रा ऊँचा था, पर मैं अपनी एड़ी पर खड़ा हो गया।
"और ठाकुर साहब से कहना," मैंने धीरे से कहा, "भैरव का तेल भी अब बासी हो गया है।"
आदमी के कदम रुक गए।
उसकी गर्दन पर एक नस उभरी और फिर बैठ गई। उसने मेरी तरफ़ देखा — और इस बार मुस्कान नहीं थी। सिर्फ़ वो चेहरा था जो कोई आदमी तब बनाता है जब उसे लगता है कि उसका हिसाब बिगड़ रहा है।
"तुम…" वो कुछ कहने को हुआ।
"मैं क्या?" मैंने कहा। "मैं तो बस एक मज़दूर हूँ। जो किसी के घर से लेकर नहीं आया।"
वो एक पल और रुका। फिर उसने अपना कोट ठीक किया, गाड़ी की तरफ़ बढ़ा, और दरवाज़ा खोलकर बैठ गया। गाड़ी शुरू हुई और सड़क के मोड़ पर मुड़कर गायब हो गई।
टिंकू ने साँस छोड़ी, जैसे वो देर तक रोका हुआ था।
"भाई," उसने कहा, "तुझे पता है तूने अभी क्या किया? तूने ठाकुर के आदमी को…"
"हाँ, पता है," मैंने कहा।
"तू पागल है।"
"हो सकता है।"
"नहीं, तू सच में पागल है," टिंकू ने कहा, और उसकी आवाज़ में रोना और हँसी दोनों थे। "पर अच्छा किया।"
रणवीर सिंह ने अपनी व्हीलचेयर घुमाई और मेरी तरफ़ देखा।
"तूने उस लिफ़ाफ़े को सूंघा," उन्होंने कहा। ये सवाल नहीं था।
मैंने एक पल रुककर सोचा। रणवीर सिंह से झूठ नहीं बोल सकता था। पर सच भी पूरा नहीं बोलना था।
"मुझे लगा उसमें कुछ अलग गंध है," मैंने कहा। "जैसे किसी पुराने तेल की।"
रणवीर सिंह ने कुछ देर मुझे देखा। फिर उन्होंने धीरे से सिर हिलाया।
"ये मुकाबला खेल नहीं है," उन्होंने कहा। "मैंने इसके बारे में सुना है। पिछले साल इसी शर्त पर एक पहलवान हार गया था — और उसका गाँव छूट गया। आज वो किसी और गाँव में मज़दूरी करता है।"
"तो ये शर्त नई नहीं है," मीरा ने कहा।
"नहीं," रणवीर सिंह ने कहा। "और ये भी नई बात नहीं है कि जो शर्त हारने वाले के लिए बनाई जाती है, उसका फ़ायदा जीतने वाले को मिलता है।"
माँ ने अपना दीया अंदर रखा और लौटकर मेरे सामने खड़ी हो गईं। उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा — पूरा हाथ, जैसे बचपन में पकड़ती थीं जब मैं रात में डरकर उठता था।
"जाना," माँ ने कहा।
"माँ…"
"सुन," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में वो बात थी जो सिर्फ़ माँ की आवाज़ में होती है। "तू जीतने नहीं जा रहा। तू सच लड़ने जा रहा है। और सच जब मिट्टी में बोया जाता है, तो वो उगता है। मुझे पता है। मैंने बीस साल देखा है।"
उनकी आँखें चमक रही थीं। पर उनमें पानी नहीं था।
"अगर तू वहाँ जाकर हार भी गया," माँ ने कहा, "तो भी तू हारा नहीं होगा। पर अगर तू वहाँ जाकर उसका ज़हर पिया, तो मैं तेरी माँ नहीं।"
मैंने उनका हाथ कसकर पकड़ा।
"नहीं पिऊँगा," मैंने कहा। "पर एक बात कहूँ?"
"कह।"
"जो आदमी कल आएगा," मैंने कहा, "उसके साथ मैं अकेला नहीं जाऊँगा।"
टिंकू तुरंत बोला, "मैं चलूँगा।"
"तू तो चलेगा ही," मैंने कहा। "पर मैं किसी और की बात कर रहा था।"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। वो मुझे देख रही थी, और उसके हाथ में वो काग़ज़ था जिसे वो अभी भी पकड़े हुए थी — इतनी ज़ोर से कि उसके किनारे मुड़ गए थे।
"मैं चलूँगी," मीरा ने कहा, और उसने मेरे सवाल का इंतज़ार नहीं किया।
"तू क्यों जाएगी?"
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