Spirit of a Fighter – Chapter 549
"वीर, उस काग़ज़ को मत छूना।"
मैं पलटा। माँ आ रही थीं, अखाड़े की मिट्टी में उनकी चप्पलें धँस रही थीं। उनके पीछे मीरा और कालू काका।
"अरे बहन," उस औरत ने कहा, और उसकी आवाज़ में अब वो मिठास नहीं थी। "तुम तो समझदार हो। बेटे को समझाओ।"
माँ सीधी उस औरत के सामने आकर खड़ी हो गईं। माँ बहुत दुबली हैं, उस औरत के सामने वो छोटी लग रही थीं। पर उनकी आँखें देखकर लगा जैसे उस औरत को दीवार मिल गई हो।
"मैं तुम्हें पहचानती हूँ," माँ ने कहा।
वो औरत हँसी। "बीस साल हो गए। तुम्हारी याददाश्त…"
"मेरी याददाश्त अच्छी है," माँ ने कहा। "तुम वही हो ना? जो उस रात नहर किनारे आई थी? जब शेर सिंह मरा था?"
उस औरत की हँसी उसके होंठों पर ही रुक गई।
"मैं…" वो कुछ कहने लगी।
"तुम्हारा नाम शांति है," माँ ने कहा। "और तुम महेंद्र सिंह की पहली पत्नी नहीं हो। तुम दूसरी हो।"
भीड़ में सन्नाटा छा गया। जो लोग अखाड़े में खड़े थे, जो गाँव के बूढ़े, औरतें, बच्चे — सबने सुना।
"और उस रात," माँ ने कहा, और उनकी आवाज़ नीची हो गई, "तुमने नहर में कुछ फेंका था। एक लाल पोटली। और उसमें क्या था, वो मुझे पता है।"
शांति का चेहरा सफ़ेद पड़ गया। उसने लिफ़ाफ़ा वापस अपनी तरफ़ खींच लिया, और उसके हाथ काँप रहे थे।
"तुम झूठ बोल रही हो," उसने कहा।
"मैं बीस साल से चुप हूँ," माँ ने कहा। "आज नहीं रहूँगी।"
और तभी गेट की तरफ़ से एक आवाज़ आई।
"अरे, मेरी बहन! तू यहाँ?"
मैंने पलटकर देखा। सुक्खी बुआ आ रही थीं, चमकीली साड़ी में, हाथ में पान का बीड़ा, और उनके पीछे-पीछे गाँव की आधी औरतें।
"अरे मैंने तो सुना है," सुक्खी बुआ ने कहा, और उनकी आवाज़ में वो मिठास थी जो सिर्फ़ चुगली में आती है, "कि अखाड़े में आज कुछ बड़ा होने वाला है। सो मैं सोचूँ, चलकर देख आऊँ।"
उन्होंने शांति को देखा और उनकी आँखें सिकुड़ गईं।
"और ये कौन है?" उन्होंने पूछा। "इसके कपड़ों में तो बहुत पैसा है।"
"ये ठाकुर महेंद्र सिंह की पत्नी है," मीरा ने कहा, और उसकी आवाज़ में वो ठंडक थी जो मैंने अदालत में सुनी थी। "और ये वीर को रिश्वत देने आई है।"
सुक्खी बुआ का मुँह खुला रह गया। फिर वो फट पड़ीं।
"रिश्वत?" उन्होंने कहा। "अरे, ठाकुर की औरत आकर हमारे गाँव के लड़के को रिश्वत दे रही है? और तू खड़ी है, शांति, हमारे गाँव में, हमारे अखाड़े में, और हमारे बेटे को…"
"चुप रहो," शांति ने कहा, और उसकी आवाज़ में अब वो मिठास बिलकुल नहीं थी। "तुम्हें कुछ नहीं पता।"
"मुझे कुछ नहीं पता?" सुक्खी बुआ हँसीं। "अरे, मैं तो वो भी जानती हूँ जो तेरे पति ने अपने घर में छुपा रखा है।"
शांति का चेहरा पत्थर हो गया।
"तुम झूठ बोल रही हो," उसने कहा, पर उसकी आवाज़ काँप रही थी।
"मैं झूठ नहीं बोलती," सुक्खी बुआ ने कहा, और उन्होंने पान का बीड़ा मुँह में डालकर चबाना शुरू किया, "मैं तो सिर्फ़ सुनी गई बात बताती हूँ। और मैंने सुना है कि ठाकुर साहब के घर में एक बंद कमरा है। जिसमें बीस साल से एक आदमी रहता है। खुद ठाकुर नहीं जाते उसके पास। कोई और जाता है। और उस आदमी का नाम…"
"सुक्खी!" माँ ने कहा, और उनकी आवाज़ में वो चेतावनी थी जो मैं बचपन से जानता हूँ।
सुक्खी बुआ रुकीं। उन्होंने माँ को देखा, और कुछ समझकर चुप हो गईं।
पर देर हो चुकी थी।
"कौन?" मैंने पूछा। "उस कमरे में कौन है?"
शांति ने लिफ़ाफ़ा मेरी तरफ़ फिर बढ़ाया, और इस बार उसके हाथ नहीं काँप रहे थे। उसकी आँखें ठंडी हो गई थीं।
"इस काग़ज़ को ले लो, वीर सिंह," उसने कहा। "और भूल जाओ कि तुमने मुझे कभी देखा था। वरना…"
"वरना क्या?" मैंने कहा। "मेरी माँ को उठवा लोगी? मेरी बहन को?"
वो मुस्कुराई। "वरना तुम्हारे गाँव में एक और नाम जुड़ जाएगा उन मरने वालों के साथ जो अखाड़े से लौटे ही नहीं।"
मैंने लिफ़ाफ़ा उसके हाथ से छीन लिया। और फिर मैंने उस काग़ज़ को फाड़ दिया — एक, दो, तीन बार। टुकड़े हवा में उड़े और मिट्टी पर गिरे।
शांति की आँखों में पहले झटका आया, फिर गुस्सा।
"तुमने…" वो बोली।
"आपने सुना," मैंने कहा। "टिंकू की दुकान का काग़ज़ फाड़ दिया। अब आप जाइए।"
"तुम्हें पता है क्या किया तुमने?" उसने कहा, और उसकी आवाज़ में अब बहुत ऊँची गरज थी। "तुम गरीब हो। तुम्हारे पास कुछ नहीं है। और तुमने ठाकुर की ज़मीन…"
"वो ज़मीन टिंकू की है," मैंने कहा। "और ज़मीन किसी की जागीर नहीं होती। जिसके पसीने से सिंची जाए, वो उसकी है। और टिंकू ने उस दुकान में अपना सब कुछ डाला है।"
शांति मेरी तरफ़ एक कदम बढ़ी। "तुम पछताओगे, वीर सिंह।"
और तभी एक आवाज़ आई, जो पूरे अखाड़े में फैल गई। भारी, टूटी, पर गरजती हुई।
"नहीं।"
सबने पलटकर देखा।
गेट पर रणवीर सिंह का व्हीलचेयर खड़ा था। उनके पीछे दो आदमी थे। और रणवीर सिंह की आँखें शांति पर जमी थीं।
"तुम्हारे पति ने मेरे पैर हमेशा के लिए सुन्न कर दिए," रणवीर सिंह ने कहा, और उनकी आवाज़ काँप रही थी, "पर मेरी आवाज़ नहीं। और आज इस अखाड़े में, मेरी आवाज़ से बड़ी कोई आवाज़ नहीं है।"
शांति उनकी तरफ़ देख रही थी, और उसके चेहरे पर पहली बार डर दिखा।
"रणवीर सिंह," उसने कहा, और उसकी आवाज़ रुक-रुक कर आ रही थी, "मैं सिर्फ़ अपने पति की इच्छा पूरी करने आई थी।"
"तुम्हारे पति की इच्छा," रणवीर सिंह ने कहा, और उन्होंने व्हीलचेयर की तरफ़ हाथ बढ़ाया, "मेरी मिट्टी में ज़हर बोना है। और वो आज ख़त्म हो गया।"
वो अपनी कुर्सी में थोड़ा आगे झुके। उनकी मूँछें काँप रही थीं।
"पर एक बात है," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ धीमी हो गई, "जो सुक्खी बहन ने कहा — उस बंद कमरे वाले आदमी के बारे में। मैं जानता हूँ वो कौन है।"
शांति ने अपना मुँह खोला, पर रणवीर सिंह ने हाथ उठाकर उसे रोक दिया।
"मुझे नहीं बोलने दोगी?" उन्होंने कहा। "बीस साल से तुम्हारे पति ने मुझे बोलने नहीं दिया। आज मैं बोलूँगा।"
वो सबकी तरफ़ देखकर बोले।
"उस कमरे में जो आदमी है, वो कोई कैदी नहीं है। वो ठाकुर का गुरु है। वो वही है जिसने भैरव को ज़हर बनाना सिखाया। वो वही है जिसने मुझे…"
उनकी आवाज़ रुक गई। मीरा तेज़ी से अपने पिता के पास गई और उनका हाथ पकड़ लिया।
"पापा," उसने कहा।
रणवीर सिंह ने उसके हाथ को थामा, और फिर उन्होंने अपनी आँखें बंद कर लीं। जब खोलीं, तो उनमें कुछ और था।
"मुझे उस आदमी का नाम नहीं पता," उन्होंने कहा। "पर मैं उसकी आवाज़ कभी नहीं भूला। क्योंकि जिस रात मेरे पैर गए, उस रात उसने मेरे कान के पास कुछ कहा था।"
शांति ने एक कदम पीछे लिया।
"रणवीर सिंह," उसने कहा, "अगर तुमने एक भी शब्द…"
"क्या कर लोगे?" रणवीर सिंह ने कहा। "मुझे और क्या छीन लोगे? मेरे पैर छीन लिए। मेरा अखाड़ा छीन लिया। मेरी बेटी का बचपन छीन लिया। अब क्या?"
अचानक शांति का चेहरा बदला। डर गायब हो गया, और उसकी जगह कुछ और आ गया — गुस्सा, ठंडा और तेज़।
"तुम ठीक कहते हो," उसने कहा। "अब और क्या छीन सकते हैं?"
और उसने अपनी साड़ी की जेब से एक छोटा मोबाइल निकाला। उसने स्क्रीन देखी, फिर रणवीर सिंह की तरफ़ मुड़ी।
"मेरे पति ने कहा था कि तुम ऐसे ही करोगे," उसने कहा। "इसलिए उन्होंने एक तैयारी कर रखी है।"
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