Spirit of a Fighter – Chapter 547
"तेरी माँ का इलाज मैं कराऊँगा," मैंने कहा, उसके कान के पास। "पर तू एक काम करेगा। तू थैली क्यों जलाई?"
लुट्टन मेरे से अलग हुआ और अपनी आँखें पोंछीं।
"मैंने नहीं जलाई, भाई।" उसकी आवाज़ फूट रही थी। "मैं तो आज शाम यहाँ था। माँ की हालत बिगड़ी थी। फिर वो आदमी आया — दीक्षित वाला आदमी — और बोला कि अगर मैं अभी ये थैली लेकर पहुँचाऊँ अखाड़े के पीछे वाले कुएँ के पास, तो माँ की दवा का पूरा डिब्बा मिलेगा। मैं गया। पर वहाँ कोई नहीं था। बस एक काग़ज़ था जिस पर लिखा था — 'अगर तूने एक लफ़्ज़ भी उगला, तो अगली थैली तेरी माँ की होगी।'" उसने अपना हाथ पकड़ा, उँगलियाँ काँप रही थीं। "मैं डर गया भाई। घर लौटा, और तेरे आँगन की तरफ़ से धुआँ उठता देखा। मैं दौड़ा, पर तब तक वो जल चुकी थी। मैंने उसे उठाया, बुझाया, और मिट्टी में दबा दिया। मुझे मालूम था तू आएगा। मैं तेरे सामने आने की हिम्मत नहीं कर पा रहा था।"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। वो दरवाज़े पर खड़ी थी, और उसके चेहरे पर वो ठंडक थी जो मैं अब पहचानता था — जब वो कुछ जोड़ रही होती थी।
"अगर ये लुट्टन ने नहीं किया," मीरा ने धीरे से कहा, "तो किसी ने तेरे आँगन में आकर आग लगाई, और तेरी माँ सामने थीं।"
मेरे हाथ ठंडे पड़ गए।
"वो माँ को छू सकता था," मैंने कहा।
"पर उसने नहीं छुआ," मीरा ने कहा। "उसने सिर्फ़ डराने के लिए जलाया। उसे तेरी माँ नहीं चाहिए। उसे तू चाहिए। और वो तुझे अंदर से तोड़ना चाहता है।"
मैं लुट्टन की तरफ़ मुड़ा।
"तेरे पास वो काग़ज़ है? जो कुएँ के पास मिला?"
लुट्टन ने अपनी जेब से एक मुड़ा हुआ पन्ना निकाला। मैंने उसे खोला। उस पर वही लिखाई थी जो उस रात दरवाज़े के नीचे आए काग़ज़ पर थी। और नीचे वही त्रिकोण-बिंदु का निशान।
"ये निशान," मीरा ने पन्ने को पकड़कर कहा, "राघव के दफ़्तर का है। पर राघव अंदर है।"
"तो उसका कोई और इस्तेमाल कर रहा है," मैंने कहा।
"या उसका कोई और है," मीरा ने कहा। "दीक्षित। दीक्षित अभी बाहर है।"
मैंने पन्ना मोड़ा और अपनी जेब में रखा।
"लुट्टन," मैंने कहा। "तू अभी मेरे साथ चलेगा।"
उसकी आँखें फैल गईं।
"कहाँ?"
"थाने। तू अपनी गवाही वापस लेगा, और जो-जो हुआ, सब बोलेगा।"
लुट्टन ने एक बार अपनी माँ की तरफ़ देखा। फिर उसने अपना सिर हिलाया।
"माँ का क्या होगा?"
मीरा आगे आई।
"मैं यहाँ रुकूँगी," उसने कहा। "मेरे बैग में कुछ दवाइयाँ हैं। बुखार है, और साँस की तकलीफ़। मैं उन्हें अभी देखती हूँ।"
लुट्टन ने मीरा को देखा, और उसकी आँखों में पहली बार कुछ और आया — शुक्र, और एक डर भी कि कहीं ये भी कोई सौदा न हो।
"मैडम—"
"मीरा," मीरा ने कहा। "और तू मुझे कुछ नहीं दे रहा। तेरी माँ इंसान है। इलाज उसका हक़ है।"
लुट्टन ने आँखें बंद कर लीं। जैसे बहुत दिनों बाद किसी ने उसे बिना किसी कीमत के कुछ दिया हो।
हम निकले। रास्ते में लुट्टन एक बार भी नहीं रुका। उसके पैर काँप रहे थे, पर उसकी चाल में वो सीधापन आ गया था जो आदमी के अंदर से डर निकलने पर आता है।
थाने की रोशनी दूर से दिख रही थी। इंस्पेक्टर दयाराम अपनी कुर्सी पर बैठे थे, सामने बंद फ़ाइल। जब हम अंदर घुसे तो उन्होंने हमें देखा, और उनकी भौंहें चढ़ गईं।
"वीर सिंह," उन्होंने कहा। "रात के ग्यारह बजे। कुछ ऐसा है जो सुबह तक रुक नहीं सकता?"
"सर," मैंने कहा, "ये लुट्टन है। आपने इसे पंचायत वाले काग़ज़ पर हस्ताक्षर करते देखा था।"
दयाराम ने लुट्टन को देखा।
"हाँ, देखा था।"
लुट्टन आगे बढ़ा और उसने अपने हाथ जोड़ लिए।
"सर, वो गवाही झूठी थी। मैंने पैसे और दवा के लालच में हस्ताक्षर किए। वीर भाई ने सोना नहीं चुराया। मुझे एक आदमी ने बुलाया था — ऊँचा, चश्मे वाला, दीक्षित साहब के साथ आता है। उसने मुझे काग़ज़ दिया और कहा कि अगर मैं बोल दूँ, तो मेरी माँ की दवा साल भर मुफ़्त। मेरी माँ बीमार है सर, बहुत बुरी तरह। मैंने…"
उसकी आवाज़ टूट गई। दयाराम ने उसे देखा, और उनके चेहरे की सख़्ती थोड़ी ढीली पड़ी।
"तू जानता है," दयाराम ने कहा, "झूठी गवाही देने की सज़ा क्या है?"
"जानता हूँ सर।" लुट्टन ने सिर नीचा किया। "पर अब मैं सच बोलूँगा। पूरा सच। उस आदमी का चेहरा मुझे याद है। और वो काग़ज़ — जो मैंने साइन किया — वो असली नहीं था। वो मुझे बाद में दिया गया। असली काग़ज़ पर तो भैरव साहब के आदमी ने मेरा अँगूठा लिया था, कुछ दिन पहले।"
मैं ठिठक गया।
"क्या कहा तूने?"
लुट्टन ने मेरी तरफ़ देखा।
"हाँ भाई। भैरव साहब के आदमी ने मुझे अखाड़े में बुलाया था, कुछ दिन पहले। कहा कि ये हिसाब-किताब का काग़ज़ है, शागिर्दी का। मैंने अँगूठा लगा दिया। मुझे क्या पता था कि वो काग़ज़ बाद में औरत के अँगूठे वाले काग़ज़ से मिला दिया जाएगा।"
दयाराम कुर्सी से खड़े हो गए।
"ये बात तूने पहले क्यों नहीं बताई?"
"डर गया था सर।"
दयाराम ने अपनी फ़ाइल खोली, उसमें कुछ देर देखा, फिर बंद कर दी।
"ठीक है," उन्होंने कहा। "कल सुबह तेरा बयान दर्ज होगा। और नया केस बनेगा — जाली दस्तावेज़, धमकी, और किसी के घर में आग लगाने की कोशिश।"
"सर," मैंने कहा, "मेरी माँ आज रात अकेली हैं, और उनके आँगन में आग लगी है। अगर ये लोग इतनी आसानी से मेरे घर तक पहुँच सकते हैं—"
दयाराम ने मेरी बात काटी।
"मैं दो सिपाही तेरे घर के बाहर रात भर के लिए भेज रहा हूँ।" उन्होंने अपनी आवाज़ नीची की। "वीर, मैं तुझे एक बात साफ़ कह दूँ। महेंद्र सिंह शहर का बहुत बड़ा आदमी है। उसके पास वकील हैं, पैसा है, और बहुत सारे लोग हैं जो उसका नाम सुनकर काँपते हैं। मैं तेरे साथ हूँ, पर मैं अकेला नहीं लड़ सकता। तुझे सबूत चाहिए — ऐसा सबूत जिसे वो मोड़ न सके।"
"मेरे पास एक आधा जला रजिस्टर है," मैंने कहा। "और एक पीला काग़ज़ है जिस पर रघुवीर की लिखाई है।"
"वो काफ़ी नहीं है। वो कहेंगे कि वो लिखाई पुरानी है, या जाली है।" दयाराम ने मेरी तरफ़ झुककर कहा। "मुझे चाहिए वो चीज़ जो सिर्फ़ महेंद्र सिंह के पास हो, और जो साबित करे कि वो इस ज़हर के कारोबार में शामिल है। उसकी अपनी लिखाई, उसका अपना हस्ताक्षर।"
मैं चुप खड़ा रहा।
"और एक बात," दयाराम ने कहा। "आज रात तू घर जा, और अपनी माँ के पास बैठ। क्योंकि कल से तू जिस रास्ते पर चलेगा, वहाँ से वापसी आसान नहीं होगी।"
हम बाहर निकले। लुट्टन मेरे पीछे-पीछे आया, और उसकी आँखें सूखी थीं, पर चेहरा थका हुआ।
"भाई," उसने कहा, "मैं अब क्या करूँ?"
"तू अपनी माँ के पास जा," मैंने कहा। "मीरा उनके पास है। और कल सुबह तू थाने आ जाएगा।"
"और उसके बाद?"
मैंने उसकी तरफ़ मुड़कर देखा।
"उसके बाद तू मेरे साथ चलेगा। और जो तूने बीस साल में देखा है, वो सब बताएगा। भैरव के हर आदमी को पता है, लुट्टन। तू भी उनमें से एक था। तेरे अंदर वो सब है जो हमें चाहिए।"
लुट्टन ने कुछ देर मेरी तरफ़ देखा, फिर उसने सिर हिलाया।
"भाई, मैं बोलूँगा।" उसकी आवाज़ में पहली बार कुछ मज़बूत था। "चाहे जो हो जाए।"
वो चला गया। मैं थाने के बाहर कुछ देर खड़ा रहा, और मेरे अंदर जो गुस्सा था, वो कहीं और बदल रहा था। अब वो सिर्फ़ गुस्सा नहीं था। वो कुछ ठंडा था, साफ़, और सीधा — जैसे मिट्टी के नीचे पानी का रास्ता।
घर पहुँचा तो बाहर दो सिपाही खड़े थे। अंदर माँ चूल्हे के पास बैठी थीं, और उनके सामने रोटी रखी थी — ठंडी, सूखी।
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