Spirit of a Fighter – Chapter 541
"ये दुकान नहीं जाएगी," टिंकू ने कहा। उसकी आवाज़ काँप रही थी, पर वो काँप नहीं रहा था। "ये दुकान मेरी माँ के हाथ की है। और मेरी माँ के हाथ से निकली चीज़ पर ठाकुर जी की मोहर नहीं लगती।"
लंबे आदमी ने अपना जबड़ा कसा। उसने हाथ उठाया।
मैं बीच में आ गया।
"दुकान का मालिक आज नहीं आएगा," मैंने कहा, और अपनी आवाज़ को जितना ठंडा कर सका, किया। "पर उसका दोस्त ज़रूर आया है।"
आदमी रुका। उसने मुझे ऊपर से नीचे देखा।
"तू वो मज़दूर है," उसने कहा। "जो भैरव को जेल भिजवा कर आया।"
"हाँ," मैंने कहा। "और मैं तुझे एक बात बता दूँ — मैंने भैरव को जेल भिजवाया, पर मैंने उससे पहले उसकी अलमारी खोली थी। उस अलमारी में जो काग़ज़ थे, उनमें से कुछ पर तेरे ठाकुर के हस्ताक्षर थे।"
आदमी का रंग उड़ गया। बस एक पल के लिए। फिर उसने मुस्कुराने की कोशिश की।
"झूठ," उसने कहा।
"झूठ नहीं।" मैंने जेब से पीतल का कोना निकाला। "ये देख। ये उसी अलमारी की दीवार में छुपा था। जिस रात तूने दीवार गिरवाई, उस रात मेरे हाथ में ये पहुँच गया।" मैंने उसे हवा में उठाया। "जो कुछ उस दीवार में था, वो अब मेरे पास है। और जब पंचायत में सबके सामने खुलेगा, तो ठाकुर जी को अपनी अंग्रेज़ी स्कूल वाली बेटी के स्कूल के बाहर भीड़ देखनी पड़ेगी।"
वो मेरी तरफ़ बढ़ा। उसके साथी ने डंडा उठाया।
तभी पीछे से आवाज़ आई — "हट जाओ।"
सुक्खी बुआ थीं। साड़ी का पल्ला कंधे पर, हाथ में पान का बीड़ा, और पीछे-पीछे दस औरतें, हाथों में डंडे, बेलन, कुछ भी नहीं।
"अरे मैंने तो सुना है," सुक्खी बुआ ने कहा, और मैंने पहली बार उनकी आवाज़ में खौफ़ सुना, "कि ठाकुर जी के आदमी हमारे गाँव में घुसकर काग़ज़ दिखाते हैं। काग़ज़?" उन्होंने पान थूका। "हमारे यहाँ काग़ज़ ज़मीन नहीं खरीदता। पसीना खरीदता है।"
औरतें आगे बढ़ीं।
लंबा आदमी पीछे हटा। उसने तीनों की तरफ़ देखा, फिर मेरी तरफ़।
"ये तेरा आख़िरी दिन नहीं है," उसने कहा। "पर ये दुकान का आख़िरी दिन होता, अगर तू चुप रहता।"
वो अपने साथियों के साथ मुड़ा और बैलगाड़ी पर बैठकर चला गया।
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा। उसके होंठ हिल रहे थे, पर आवाज़ नहीं निकली। फिर उसने कुछ ऐसा किया जो मैंने उसे कभी करते नहीं देखा — वो मेरे गले लग गया।
"भाई," उसने फुसफुसाया, "मैं डर गया था।"
"मुझे पता है," मैंने कहा। "मैं भी डरा था।"
सुक्खी बुआ ने बीच में आकर हमें अलग किया।
"ये सब बाद में," उन्होंने कहा। "पहले बता — वो पीतल का टुकड़ा क्या है? और वो रात में तू किससे मिलने गया था? अरे मैंने तो सुना है…"
"बुआ," मैंने कहा, "अभी नहीं।"
"अभी नहीं?" उनकी आँखें बड़ी हो गईं। "अरे मैंने तो सुना है कि तेरा कोई बड़ा भाई है —"
मैं जम गया।
"किसने कहा?"
"किसने नहीं कहा?" उन्होंने पल्ला झटका। "रात तेरे दरवाज़े के सामने एक लंगड़ा आदमी खड़ा था, बैसाखी टेकते हुए। मैंने देखा। पूरी रात खड़ा रहा, और सुबह जब तेरी माँ ने दरवाज़ा खोला, तो वो फुसफुसाया — 'माँ, मैं हूँ।' और तेरी माँ उसे अंदर ले गईं, और आधे घंटे तक दरवाज़ा बंद रहा।"
मैं उल्टे पैर भागा।
घर पहुँचा तो दरवाज़ा खुला था। आँगन में चक्की अब भी खड़ी थी, पर उसके पाट अलग-अलग पड़े थे, जैसे किसी ने तोड़े हों। माँ कोने में बैठी थीं, और उनकी गोद में एक पुरानी मिट्टी की गुड़िया थी, जिसका एक हाथ टूटा हुआ था।
"माँ?" मैंने कहा।
उन्होंने सिर उठाया। उनके गाल पर हथेली का निशान था। लाल।
"उसने मुझे मारा?" मेरी आवाज़ निकल गई।
"नहीं," माँ ने कहा, और उनकी आवाज़ चीज़ों से नहीं, किसी और दुनिया से आ रही थी। "मैंने उसे मारा। और फिर खुद को।" उन्होंने गुड़िया अपने सीने से लगाई। "वो इस घर में चार साल का था जब उसे ले गए थे। उसने अभी तक मुझे माँ नहीं कहा। सिर्फ़ एक बार, दरवाज़े पर, फुसफुसाकर। फिर वो अंदर आया, और मेरी मिट्टी की गुड़िया देखी, और कहा — 'तूने इसे नहीं फेंका।' और मैंने कहा — 'ये तेरी थी।' और फिर वो बैठ गया, और मुझे बताने लगा कि वो क्या कर रहा है।"
"क्या कर रहा है?"
माँ ने गुड़िया के टूटे हाथ को सहलाया।
"अपना नाम वापस माँग रहा है," उन्होंने कहा। "पंचायत में। महेंद्र सिंह के सामने। और वो चाहता है कि तू उसके साथ खड़ा हो।"
मेरे भीतर कुछ चटकी। "माँ, वो मुझे अभी मिला है। मुझे नहीं पता वो क्या सोचता है, क्या करता है।"
"मुझे भी नहीं पता," माँ ने कहा। "पर वो रणवीर सिंह का बेटा है। और रणवीर सिंह के बच्चे झूठ नहीं बोलते।" उन्होंने गुड़िया मेरी तरफ़ बढ़ाई। "ये ले। जिस दिन तू उसके साथ पंचायत में खड़ा हो, ये उसके हाथ में दे देना। ये उसकी है।"
मैंने गुड़िया ली। वो भारी थी, कच्ची मिट्टी की, और उस पर उँगलियों के निशान अब भी थे।
शाम को कालू काका आए। वो दौड़ते हुए आए — कुबड़ा शरीर, साँस फूलती हुई, और उनकी आँखों में वो डर था जो मैंने तहखाने में देखा था।
"वीर!" उन्होंने दरवाज़े से ही पुकारा। "अखाड़ा!"
मैं उठा। "क्या हुआ?"
"अलमारी वाली दीवार," उन्होंने हाँफते हुए कहा। "गिर गई। पूरी। आधी रात को कोई आया, कोई आवाज़ नहीं हुई, और जब मैं पानी डालने गया, तो दीवार का प्लास्टर फ़र्श पर पड़ा था, और अंदर का जो खोखला हिस्सा था…"
"क्या निकाल लिया गया?"
"सब," कालू काका ने कहा, और उनकी आवाज़ टूट गई। "जो बीस साल में जमा हुआ था। रघुवीर की असली डायरी, माधव के हस्ताक्षर वाले काग़ज़, और वो शीशी जो रघुवीर ने खुद भरी थी। सब।"
मैं भागा। टिंकू पीछे-पीछे। रास्ते में मेरे मुँह से सिर्फ़ एक शब्द निकला — भाई।
अखाड़े पहुँचे तो दीवार का वो हिस्सा खुला था, और अंदर का खोखलापन ऐसा दिख रहा था जैसे किसी ने कब्र खोद दी हो। फ़र्श पर मिट्टी बिखरी थी, और मिट्टी में पैरों के निशान।
मैं झुका। मैंने सूँघा।
और फिर मेरे भीतर कुछ ठंडा हुआ, क्योंकि वो गंध मैं पहचानता था — चमड़े के जूते की, चमकाए हुए, तेल लगे। वही जूते जो सुबह दुकान पर वो लंबा आदमी पहने था।
"ठाकुर का आदमी," मैंने कहा। "यहाँ आया।"
कालू काका ने मेरा हाथ पकड़ा। उनकी उँगलियाँ बर्फ़ जैसी ठंडी थीं।
"वीर," उन्होंने धीरे से कहा, "जो यहाँ से गया, वो तेरे भाई के हाथ में नहीं आया। वो यहाँ से सीधा शहर जाएगा। और कल सुबह तक, तेरे भाई का नाम उन काग़ज़ों में मिट जाएगा। जैसे मेरा मिट गया था। जैसे तेरे पापा का मिट गया था।"
मैंने दीवार के उस खुले हिस्से में हाथ डाला। मेरी उँगलियाँ किसी धातु से टकराईं। मैंने उसे खींचा — पीतल का एक और कोना था, इस बार संदूक का, जिस पर त्रिकोण और बिंदु का निशान खुदा था।
मैंने उसे मुट्ठी में दबाया।
"कालू काका," मैंने कहा, "जो भी उसमें था, वो अब शहर जा रहा है। पर एक चीज़ वो भूल गए।"
"क्या?"
"वो दीवार में थी," मैंने कहा। "मिट्टी में। और मिट्टी झूठ नहीं बोलती।"
मैंने कोना जेब में रखा, वैद्य की शीशी कमर में बाँधी, और पलटा।
"कहाँ जा रहा है?" टिंकू ने पूछा।
"पहले मीरा के पास," मैंने कहा। "फिर उस आदमी के पास जो खुद को मेरा भाई कहता है। और फिर उसके पास, जिसने आज मेरी माँ की गोद से उसकी गुड़िया छीनने की कोशिश की।"
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा। उसके हाथ अब नहीं काँप रहे थे।
"मैं चलूँ?" उसने पूछा।
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