Spirit of a Fighter – Chapter 54
लालटेन की रोशनी मेरे चेहरे पर पड़ी और मैं जम गया। टिंकू की उँगलियाँ मेरी कलाई पर कस गईं। मीरा ने मेरी कमीज़ पीछे से खींची — "भाग," उसने फुसफुसाया, पर मेरे पैर जैसे ज़मीन में गड़ गए थे।
भैरव ने लालटेन ऊपर उठाई। उसकी बड़ी मूँछों पर पड़ी रोशनी में तेल चमक रहा था। "देखा?" वो बोला। "मैंने कहा था ना, मैं तेरा इंतज़ार कर रहा था।"
"लालटेन रख," वो आगे बोला, "वरना हाथ जल जाएगा।"
मेरे हाथ में लालटेन थी। मैंने उसे और ऊँचा उठाया। "तो जलने दे," मैंने कहा। "पर जब ये लालटेन गिरेगी, तो तेरी ये सारी मिट्टी जल जाएगी।"
भैरव का चेहरा एक पल के लिए बदला। बस एक पल। फिर वो फिर हँसा। "तेरे पास तेल कितना है, बेटा? उतना ही जितना तेरे पापा के पास था।"
मेरी छाती में कुछ जल उठा। मैंने लालटेन पीछे खींची और ज़ोर से घुमाया। मिट्टी पर तेल की बूँदें टपकीं। भैरव एक कदम पीछे हटा। बस एक कदम — और वही मेरे लिए काफ़ी था।
"अब!" मैंने चिल्लाया।
मैंने लालटेन उसकी तरफ़ फेंकी और मुड़कर भागा। लालटेन मिट्टी पर गिरी और फूट गई। पीछे से आग की लपट की जैसी आवाज़ आई — पर मैंने पलटकर नहीं देखा।
मेरे सामने अखाड़े की मिट्टी की ऊँची दीवार थी। ग्यारह फुट ऊँची, ऊपर से थोड़ी ढलान वाली। मैंने दौड़कर पैर जमाया और छलाँग लगाई। हाथ ऊपर के किनारे तक पहुँचा। मैंने पूरी ताकत से खींचा। मेरी छाती दीवार से रगड़ी, धोती उलझी, पर मैं चढ़ गया।
और तभी मेरी दाईं हथेली दीवार की ईंट पर पड़ी।
ईंट का किनारा उस तरह चीरा कि पहले झन्नाहट आई और फिर गरम पानी की तरह खून बहने लगा। मैंने देखा तक नहीं। मैं दूसरी तरफ़ कूदा। नीचे गिरते वक़्त मेरा घुटना मुड़ा और मैं धूल में मुँह के बल गिरा।
पीछे दीवार के उस पार से भैरव की आवाज़ आई — "भागता है तो जानता है वो। भाग, भाग!" उसकी आवाज़ में गुस्सा नहीं था। उसकी आवाज़ में एक अलग ही चीज़ थी — जैसे कोई शिकारी हिरण को दौड़ते देख मज़ा ले रहा हो।
मैं उठा। हथेली से खून टपक रहा था, गरम, और मेरी उँगलियों के बीच से फिसल कर धूल पर गिर रहा था। मैंने धोती के छोर से हाथ को लपेटा और सीधा नहर की तरफ़ भागा।
रास्ते में नीम के पेड़ की जड़ें मेरे पैरों से उलझीं। एक बार मैं गिरा, फिर उठा। मेरी साँस ऐसे फूट रही थी जैसे सीने में कोई दरवाज़ा टूट गया हो। अंधेरे में कुआँ, दीवारें और पेड़ सब एक जैसे लग रहे थे। पर मुझे रास्ता पता था। मैं बचपन से यही रास्ता दौड़ता आया था।
नहर का पानी रात में काला दिख रहा था। मैं घुटनों के बल गिरा और हाथ पानी में डाल दिया। ठंडे पानी ने मेरी हथेली को ऐसे काटा जैसे नमक डाल दिया हो। मेरे मुँह से एक आवाज़ निकली — बिना किसी शब्द के। मैंने दाँत भींचे और हाथ पानी में डुबोए बैठा रहा।
खून पानी में घुलकर बह गया। एक जगह छोटी-सी लाल लकीर पानी के साथ दूर तक गई और फिर गायब हो गई।
मैंने अपनी कलाई उलटकर देखी। कट गहरा था — हथेली के नीचे से कलाई की तरफ़ तीन उँगली जितना। खून अब भी रिस रहा था, पर धीरे।
मैंने कपड़ा फाड़कर बाँधा… नहीं, मेरे पास कुछ नहीं था। मैंने धोती का कोना फाड़ा। फटा हुआ कपड़ा हाथ पर लपेटा और दूसरे हाथ से दाँतों से खींचकर गाँठ लगाई। गाँठ बनाते वक़्त मेरी उँगलियाँ काँप रही थीं और मुझे अपनी ही उँगलियों पर गुस्सा आ रहा था।
फिर मैं पानी के किनारे पीठ के बल लेट गया।
ऊपर आसमान था। तारे जैसे किसी ने मिट्टी के बर्तन में छेद कर दिए हों। नहर के पानी की आवाज़ आ रही थी — धीमी, बिना रुके, जैसे कोई बूढ़ी माँ बच्चे को पंखा झल रही हो। मेरी साँस धीरे-धीरे आई।
मैंने आँखें बंद कीं और अचानक मुझे माँ की दाल की खुशबू आई। जीरा, हींग, और हल्की-सी धुआँ। मेरे पेट में ज़ोर से कुछ हिला।
मैं उठकर बैठ गया। मेरी नज़र अपनी हथेली पर गई। कपड़ा लाल हो चुका था।
उस रात मैं नहर के किनारे एक पुराने पीपल के नीचे बैठा रहा। घुटने सीने से लगाए। कभी सोचता कि अगर भैरव मुझे पकड़ लेता तो क्या होता। कभी कालू काका की बात याद आती — "पहलवान अलमारी तक नहीं पहुँचता।" कभी माँ का चेहरा आता, जैसे वो मुझे दूर से देख रही हों, चक्की रोककर, हाथ में आटा लिए।
पौ फटने से पहले मुझे नींद आ गई। बस थोड़ी, एक झपकी। और उसी झपकी में मैंने सपना देखा — अखाड़े की लाल मिट्टी, और उसमें पैरों के निशान। बड़े-बड़े पैरों के निशान, और एक जोड़ी छोटे पैरों के। छोटे निशान एक बच्चे के थे, जो किसी और का हाथ पकड़कर चल रहा था।
सुबह की पहली किरण मेरी आँखों पर पड़ी तो मैंने आँख मलकर खोली। पानी के ऊपर कोहरा था, सफ़ेद, जैसे किसी ने कपास बिछा दी हो। मेरी हथेली अब सूजी हुई थी। कपड़ा सूखकर सख़्त हो गया था और उस पर खून की काली पपड़ी जम गई थी।
और तभी मुझे पैरों की आवाज़ सुनाई दी। कोई भागता हुआ आ रहा था।
मैं उठकर खड़ा हो गया, दूसरा हाथ मुट्ठी में। पर जो आ रहा था वो टिंकू था।
वो दौड़ता हुआ आया, टोपी एक तरफ़ झुकी हुई, हाथ में मिठाई की डिब्बी, और माथे पर पसीना। दूर से ही मेरी हालत देखकर उसके कदम धीमे पड़ गए।
"भाई…" वो पास आया। उसकी आवाज़ बदल गई। "तेरा हाथ…"
"कुछ नहीं," मैंने कहा। "ईंट लग गई।"
टिंकू ने डिब्बी ज़मीन पर रखी और मेरा हाथ पकड़कर खोला। जब उसने खून से सना कपड़ा देखा, तो उसके होंठ काँपने लगे। उसका चेहरा उतर गया — वैसे, जैसे बच्चे का चेहरा गिरता है जब उसका खिलौना टूट जाए।
"ये… ये क्या किया तूने?" उसकी आवाज़ फटी हुई थी।
"भाग रहा था," मैंने कहा। "दीवार फाँदी।"
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखें भरी हुई थीं। फिर उसने अपनी टोपी उतारी। उस टोपी को उसने तीन साल पहले अपनी माँ से मोल लिया था — मैं जानता था, उसने मुझे बताया था, बड़े शौक से, एक बार चाय की दुकान पर।
"ये क्या कर रहा है?" मैंने कहा। "टोपी रख।"
पर उसने नहीं सुना। उसने टोपी को दाँतों से चीरकर दो हिस्से किए।
"टिंकू!"
"चुप रह।" उसकी आवाज़ अब काँप रही थी और वो इससे छुपाने की कोशिश कर रहा था, इसलिए उसने सिर झुकाकर मेरा हाथ पकड़ा।
उसने खून से सना कपड़ा खोला। घाव देखकर उसकी साँस रुकी।
"ओ भाई…" उसने धीरे से कहा।
फिर उसने टोपी का कपड़ा मेरे हाथ पर रखा और कसकर बाँधने लगा।
और तभी उसका हाथ काँपा। बहुत हल्का। मुझे महसूस हुआ। मैंने उसकी आँखों में देखा तो वो जल्दी से नीचे झुक गया, जैसे कुछ खोज रहा हो।
"भाई," वो बोला, गाँठ कसते-कसते, "तू मर गया तो मेरी मिठाई कौन खाएगा?"
मैं हँसा — ज़ोर से, पेट से।
"बेवकूफ़ है तू," मैंने कहा। "इसीलिए तुझे पहलवानी नहीं आती।"
"हाँ," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में हल्की-सी हँसी आई। पर आँखें नीचे थीं।
वो गाँठ बाँधकर उठा। मेरे हाथ से खून अब भी टपक रहा था, टोपी के कपड़े के बीच से बाहर आकर। टिंकू ने देखा। फिर उसने मेरी तरफ़ देखा और उसके चेहरे पर जो था, वो हँसी नहीं थी।
"पट्टी कसी जा रही है," मैंने कहा। "बाँध ठीक से।"
वो मेरे सामने बैठ गया। ज़मीन पर कपड़े का एक और टुकड़ा फाड़ा और ऊपर से लपेटा।
"भैया," उसने धीरे से कहा। "मुझे लगा… सुबह जब मैं तेरे घर पहुँचा और माँ ने कहा कि तू रात को निकला और लौटा नहीं… मुझे लगा कि…"
उसकी आवाज़ बीच में ही रुक गई।
"कि क्या?" मैंने कहा।
"कि तू भैरव का शिकार हो गया।" उसने कहा। फिर उसने मेरी कलाई पकड़ी और दोनों हाथों से दबाकर पट्टी कसी।
दर्द से मेरी आँखों में पानी आ गया। पर मैंने कुछ नहीं कहा।
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