Spirit of a Fighter – Chapter 525
"राघव ने उस रात तेरे पापा से कहा था — 'तुम मेरे साथ आ जाओ, सबूत दो, और मैं भैरव को फँसा दूँगा, तुम्हें इनाम मिलेगा।' तेरे पापा ने कहा — 'मैं किसी को फँसाने का काम नहीं करता, मैं सच बोलकर जीता हूँ।' यही सुनकर राघव की आँखें बदल गईं।"
"वो गुस्सा हुआ?"
"गुस्सा नहीं, बेटा। डरा। क्योंकि तेरे पापा ने उससे कह दिया था — 'राघव, मुझे पता है तेरे बाप ने भैरव के बाप के साथ क्या किया था। मुझे पता है कि तू उस पैसे से पढ़ा है।'"
टिंकू ने पहली बार कुछ कहा। उसकी आवाज़ छोटी थी। "मतलब राघव के बाप भी…?"
माँ ने सिर हिलाया। "राघव जी उस ज़मीन के सौदे में शामिल थे जिस पर अखाड़ा बना। वो काग़ज़ात बदलते थे। तेरे पापा ने वो काग़ज़ देख लिए थे। और उसी रात तेरे पापा बीमार पड़े।"
कमरे में सन्नाटा छा गया। दूर किसी के घर से रेडियो की आवाज़ आ रही थी, कोई पुराना गाना। और मुझे लगा कि मैं सुन नहीं रहा, बस उस सन्नाटे को चीरता हुआ अपनी साँस सुन रहा हूँ।
"माँ, तूने इतने साल चुप क्यों रही?" मेरी आवाज़ फूट गई। "तू जानती थी और चुप? तेरे सामने पापा मरे और तू चुप?"
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में पानी नहीं था। सिर्फ़ वो थकान थी, और उस थकान के नीचे कुछ और — जो मैंने पहली बार देखा। एक डर। बीस साल का डर।
"उस रात राघव ने मेरे कान में कहा था," माँ की आवाज़ धीमी हो गई। "'अगर तूने कुछ बोला, तो तेरा बेटा भी तेरे पति के पास चला जाएगा। और तू जानती है कि मैं अपनी बात पूरी करता हूँ।'"
मेरा पूरा शरीर ठंडा हो गया।
"मैंने उस रात से अपना मुँह बंद कर लिया," माँ ने कहा। "तेरे लिए। सिर्फ़ तेरे लिए। जब तू स्कूल जाता था, मैं दरवाज़े पर खड़ी रहती थी और सोचती थी — आज वो लौटेगा या नहीं। जब तू बीमार पड़ा, मैं तेरे सिरहाने बैठी रोती थी और सोचती थी — शायद यही वो दिन है जो राघव ने चुना है।"
मैंने अपनी आँखें बंद कर लीं। मुझे याद आया — जब मैं छोटा था, माँ हर सुबह मेरे मुँह पर हाथ फेरती थी, जैसे जाँच रही हो कि मैं ज़िंदा हूँ। मैंने उसे हमेशा यही सोचा था कि माँ का प्यार है। पर वो प्यार नहीं था। वो डर था।
"तो अब?" मीरा ने धीरे से पूछा। "अब क्या होगा? राघव पकड़ा गया है।"
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। उन्होंने ढक्कन से पत्थर निकाला और मेरी हथेली पर रख दिया।
"अब वो जानता है कि मैंने अपना मुँह खोल दिया है," माँ ने कहा। "अब उसके पास फँसाने का एक ही रास्ता बचा है — या तो वो सब कुछ कबूल कर दे, या वो उस आदमी का नाम ले दे जो उसके पीछे खड़ा है। और मैं तुझे उस आदमी का नाम बताने वाली हूँ।"
वो रुकीं। उन्होंने कमरे की खिड़की की तरफ़ देखा। बाहर किसी की परछाईं गुज़री। सबकी साँस रुक गई।
"पर एक बात सुन ले," माँ ने कहा। "जब उस आदमी का नाम सुनकर तेरे हाथ काँपेंगे — और काँपेंगे, मैं जानती हूँ — तो याद रखना कि उसने तुझे मारने की कोशिश की थी, तू मरा नहीं। तू ज़िंदा है। और आज तू मेरे सामने खड़ा है।"
मैंने मुट्ठी भींची। पत्थर मेरी हथेली में चुभ रहा था। दर्द हो रहा था, पर मैंने उसे जाने नहीं दिया।
"बोल माँ," मैंने कहा। मेरी आवाज़ अब नहीं काँप रही थी।
माँ ने कहा —
"दयाराम।"
कमरे में हवा रुक गई। मीरा की आँखें बड़ी हो गईं। टिंकू के हाथ से पीला काग़ज़ गिर गया।
"दयाराम?" मेरी आवाज़ फूट गई। "माँ, दयाराम ने आज चबूतरे पर मेरा साथ दिया। दयाराम ने राघव को पकड़वाया।"
"हाँ," माँ ने कहा। "क्योंकि राघव अब उसके लिए ख़तरा बन गया था। दयाराम वो आदमी है जिसका नाम राघव जानता है। और दयाराम चाहता है कि राघव मुँह खोले ही नहीं।"
"तो ज़मानत पर…"
"भैरव ज़मानत पर नहीं छूटेगा," माँ ने कहा। "इसकी फ़िक्र तू मत कर। चिंता ये कर कि राघव अगर बोलने से पहले मर गया, तो सारा सच उसके साथ चला जाएगा।"
मैं उठ खड़ा हुआ। पत्थर मेरी मुट्ठी में था, और मुझे लगा कि वो गरम हो रहा है, माँ के हाथों की गरमी से।
"तो फिर हमें अभी जाना होगा," मीरा ने कहा। वो पहले ही खड़ी हो चुकी थी। "राघव के पास। उससे पहले कि कोई और उसके पास पहुँचे।"
टिंकू ने काग़ज़ उठाया। "और ये?"
माँ ने उस काग़ज़ की तरफ़ देखा। फिर मेरी मुट्ठी की तरफ़। कुछ सोचा।
"तू जा," माँ ने मुझसे कहा। "राघव से मिल। पर अकेला मत जाना। और एक बात —"
वो रुकीं। उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा। उनकी उँगलियाँ ठंडी थीं।
"दयाराम के सामने कभी मत झुकना," माँ ने कहा।
॥
दयाराम के सामने कभी मत झुकना।
माँ की वो बात मेरे कानों में गूँज रही थी, पर मेरा दिमाग़ कहीं और अटका हुआ था। मैं उठा, दरवाज़े की तरफ़ बढ़ा, फिर रुक गया। मैंने पलटकर माँ को देखा। वो वैसे ही बैठी थीं, पीतल का ढक्कन गोद में रखे, आँखें झुकी हुईं।
"माँ।" मेरी आवाज़ कुछ अजीब निकली। "तूने दयाराम का नाम इतनी देर से क्यों बताया?"
माँ ने सिर उठाया। उनकी आँखों में वो चमक थी जो मैंने बहुत कम देखी थी — डर नहीं, शर्म थी। जैसे कोई पुराना ज़ख़्म दिखाते हुए वो झिझक रही हों।
"बैठ," उन्होंने कहा। "एक मिनट बैठ।"
"माँ, राघव के पास जाना है—"
"एक मिनट," उन्होंने दोहराया। और उनकी आवाज़ में वो बात थी जिसके आगे मैं कभी नहीं खड़ा रह सका।
मैं बैठ गया। मीरा दरवाज़े के पास खड़ी थी, टिंकू ने काग़ज़ अपनी जेब में ठूँस दिया था। माँ ने मेरा हाथ पकड़ा। उनकी उँगलियाँ सूखी थीं, चक्की वाली, पर उनमें एक गरमी थी जो मेरी हथेली से सीधे मेरे सीने तक चली गई।
"वो वकील," माँ ने धीरे से कहा। "राघव।"
"हाँ?"
"वो मेरा भाई है।"
कमरे में जो चीज़ें रखी थीं — चक्की, टूटी घड़ी, पीतल का ढक्कन — सब एक पल के लिए जैसे थम गईं। मुझे लगा मेरे कानों में कुछ भर गया है। मैंने माँ का हाथ पकड़ा, फिर छोड़ा, फिर फिर पकड़ा।
"क्या बोली तू?"
"तेरा मामा," माँ ने कहा। "राघव तेरा मामा है। मेरा छोटा भाई।"
मैं खड़ा हो गया। मुझे नहीं पता क्यों, पर मेरे पैर मुझे उठा ले गए। मैं दीवार तक गया, उस पर हाथ रखा। दीवार ठंडी थी। बाहर कुत्ता भौंका, फिर चुप हो गया।
"तो वो आदमी जो आज चबूतरे पर मेरे सामने खड़ा था," मैंने कहा, "जिसने तेरी नकल में आवाज़ निकाली, जो माधव का आदमी निकला — वो तेरा भाई है?"
"हाँ।"
"और तूने मुझे ये आज तक नहीं बताया?"
माँ चुप रहीं।
मैंने उनकी तरफ़ देखा। वो वैसे ही बैठी थीं, हाथ गोद में, आँखें नीची। मुझे गुस्सा आ रहा था। गुस्सा नहीं — कुछ और था। जैसे कोई मेरे सीने में दरवाज़ा बंद करके चला गया हो और मैं उसके पीछे खड़ा हूँ।
"माँ, तू बोल क्यों नहीं रही?"
"क्योंकि बोलने से पहले मुझे खुद ये समझना था कि तुझे क्या बताऊँ," उन्होंने कहा। "कितना बताऊँ। कहाँ से शुरू करूँ।"
वो उठीं। उनकी कमर में दर्द था, मैं देख सकता था — वो उठते वक़्त एक हाथ कमर पर रखती हैं, जैसे कोई सहारा माँग रही हों। वो चूल्हे तक गईं, उसमें राख को हाथ से सहलाया, फिर पलटीं।
"बीस साल पहले," माँ ने कहा, "मैं इस गाँव में नहीं रहती थी। मैं शहर में रहती थी। तेरे नाना की दुकान थी। छोटी सी। और राघव पढ़ता था — वकील बनने की तैयारी करता था। होशियार था। बहुत होशियार।"
उन्होंने रुककर मेरी तरफ़ देखा।
"तेरे पापा — रघुवीर — उन दिनों शहर आते थे। कुश्ती के लिए। मैं उन्हें देखने जाती थी। एक बार मैं दुकान पर खड़ी थी, वो आए, और मैंने उन्हें चाय पिलाई। बस। फिर जो हुआ वो तू जानता है — शादी हुई, मैं इस गाँव में आ गई।"
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno