Spirit of a Fighter – Chapter 524
"सर," मैंने कहा, "आपका रजिस्टर नकली है।"
मैदान में एक हल्की हँसी उठी। राघव मुस्कुराया। "बेटा, तुम्हें क्या लगता है, कोई अदालत इस पर —"
"मैंने आपको पूरा नहीं सुना," मैंने कहा। "असली रजिस्टर की कॉपी मीरा के पास है। और उस पर आपके हाथ की स्याही लगी है।"
राघव की मुस्कान जम गई। मीरा खड़ी हुई। उसने अपना बैग खोला और एक फ़ाइल निकाली। उसमें काग़ज़ थे — पन्ने के पन्ने, छोटे-छोटे अक्षरों में।
"ये उन पन्नों की कॉपी है जो असली रजिस्टर में थे," मीरा ने कहा। "मैंने इन्हें कल रात खुद उतारा है। और इन पन्नों पर एक जगह मिट्टी लगी है — लाल मिट्टी। जो अखाड़े के कुएँ के पास ही है। और इन पन्नों की स्याही के नीचे एक और स्याही है। पुरानी। जिसे मिटाया गया है।"
उसने एक पन्ना ऊपर उठाया।
"इस पन्ने पर पुरानी स्याही में एक नाम लिखा है। जिसे किसी ने मिटाने की कोशिश की। पर मिट्टी ने उसे बचा लिया। और वो नाम है — राघव।"
मैदान में अब पूरा सन्नाटा था। राघव ने एक कदम पीछे रखा।
"ये — ये बकवास है," वो बोला। पर उसकी आवाज़ में वो मिठास नहीं थी। उसमें कुछ टूट रहा था।
"सर," मैंने कहा, "आप कल रात घर आए थे। आपने माँ को धमकाया। आपने कहा था कि अगर सबूत नहीं मिले तो भैरव ज़मानत पर निकल जाएगा। पर आप ये नहीं जानते थे कि भैरव खुद कबूल कर चुका है। आप ये भी नहीं जानते थे कि रजिस्टर की एक कॉपी माँ ने पहले ही छुपा दी थी। और आप ये भी नहीं जानते थे कि माँ के पास एक और चीज़ है — वो चीज़ जो आप कल रात ढूँढ रहे थे।"
मैंने जेब से वो काग़ज़ निकाला जो माँ ने कुएँ के पास छोड़ा था। उसे ऊपर उठाया।
"ये लिखाई माँ की है," मैंने कहा। "और इसमें लिखा है कि जिसने मेरे पापा को ज़हर दिया, वो अभी ज़िंदा है। और वो मेरा बाप है।"
भीड़ में एक आवाज़ उठी। सुक्खी बुआ ने मुँह पर हाथ रख लिया। बसंता की माँ ने आँखें बंद कर लीं।
"अब आप बताइए सर," मैंने कहा, "माँ ने ये किसके बारे में लिखा? किस आदमी के बारे में? जो अभी ज़िंदा है। जो मेरा बाप है।"
राघव ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में अब वो ठंडक नहीं थी जो वकीलों की होती है। उसमें कुछ और था। कुछ ऐसा जो मैंने पहले किसी और की आँखों में देखा था — जब भैरव ने कुर्सी पकड़ी थी।
वो बोला नहीं। बस रजिस्टर को अपने बैग में रखने लगा।
"रुकिए," दयाराम ने कहा। वो आगे आया। "राघव, तुमने पिछली रात मेरे पास एक फ़ोन किया था। कहा था कि रजिस्टर मिल गया है। और तुमने वो रजिस्टर मुझे दिया नहीं। तुमने कहा था — 'पहले मैं इसे साफ़ कर दूँ, फिर दिखाऊँगा।' साफ़ करने से मतलब क्या था?"
राघव का चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
मैंने उस पल देखा — भीड़ में, सबसे पीछे, नीम के पेड़ के नीचे — माँ खड़ी थीं। पीतल का ढक्कन उनके हाथ में था। और वो मेरी तरफ़ देख रही थीं। उनकी आँखों में पानी था। पर वो मुस्कुरा रही थीं। पहली बार। बीस साल में पहली बार।
राघव ने बैग उठाया। वो मंच से उतरने लगा। दयाराम के दो आदमी उसके पास पहुँचे।
"मैं वकील हूँ," राघव ने कहा। उसकी आवाज़ ऊँची हो गई थी। "मुझे पकड़ने का हक़ तुम्हें नहीं है।"
"वकील हो तो काग़ज़ दिखाओ," दयाराम ने कहा। "फ़ीस का हिसाब। जो आदमी बीस साल से मरे हुए पहलवानों का केस लड़ता है, उसके पास हिसाब होगा।"
राघव ने एक गहरी साँस ली। वो पलटा। उसने मेरी तरफ़ देखा।
और फिर मेरे पास आया। उसकी आवाज़ अब धीमी थी। सिर्फ़ मेरे कान तक।
"तेरी माँ को मैं जानता हूँ," उसने कहा। "वो भी इस जाल में थी। बीस साल पहले उसने अपना मुँह बंद रखने का वादा किया था। और उस वादे की कीमत — तेरा जीवित रहना है। पूछ लेना उससे। पूछ लेना कि तेरे पापा की मौत की रात वो कहाँ थी।"
और वो हँसा। एक छोटी-सी हँसी। और फिर दयाराम के आदमियों के साथ चल दिया।
मैं वहीं खड़ा रह गया। पत्थर जैसा। मेरा पूरा शरीर ठंडा हो गया था। माँ के काग़ज़ वाली जेब अचानक भारी लगने लगी। मैंने पलटकर नीम के पेड़ की तरफ़ देखा।
माँ वहाँ नहीं थीं। जगह खाली थी। सिर्फ़ मिट्टी पर उनके पैरों के निशान बचे थे।
मैं भागा। भीड़ में से, चबूतरे से, सीधे घर की तरफ़। मीरा पीछे-पीछे आई। टिंकू भी। मैंने दरवाज़ा खोला।
माँ आँगन में बैठी थीं। चक्की के पास। उनके हाथ में पीतल का ढक्कन था। और वो उसे देख रही थीं, जैसे उस पर कोई लिखा हो।
मैंने दरवाज़ा बंद किया। मैं उनके सामने बैठा। मेरी साँस फूल रही थी।
"माँ," मैंने कहा। "वो वकील जाते-जाते कह गया — 'तेरी माँ को मैं जानता हूँ, वो भी इस जाल में थी।' सच क्या है, माँ? तू उस वकील को कैसे जानती है?"
माँ ने ढक्कन को धीरे से नीचे रखा। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। और उनकी आँखों में वो पानी नहीं था जो चबूतरे पर था। उसमें कुछ और था। एक थकान। बीस साल की थकान।
"बेटा," उन्होंने कहा, "मैं उसे नहीं जानती। मैं उसे बहुत अच्छी तरह जानती हूँ।"
माँ ने ढक्कन को अपनी गोद में रख लिया। उनकी उँगलियाँ उस पर धीरे-धीरे घूम रही थीं, जैसे कोई अंधा आदमी अपने रास्ते की दीवार टटोलता है।
"मुझे बता," मैंने कहा। मेरी आवाज़ काँप रही थी। "माँ, प्लीज।"
माँ ने मेरी तरफ़ देखा। फिर मीरा की तरफ़। फिर टिंकू की तरफ़। टिंकू दरवाज़े के पास खड़ा था, उसके हाथ में वही पीला काग़ज़ था, और वो उसे अपनी छाती से चिपका रहा था जैसे कोई डरा हुआ बच्चा अपनी मिठाई छिपाता है।
"तू बैठ जा," माँ ने मीरा से कहा। "और तू भी, टिंकू। ये बात खड़े होकर नहीं सुनी जाती।"
हम बैठ गए। आँगन में दोपहर की धूप आ रही थी, और चक्की के पास पड़ी मिट्टी की गंध मुझे बचपन से आती थी। माँ के हाथों की गंध। मैंने आँखें बंद कर लीं। अगर माँ ने कुछ ऐसा कह दिया जो मुझे तोड़ दे, तो मुझे यही गंध थामे रखनी थी।
"राघव मेरे गाँव का था," माँ ने शुरू किया। "यहीं से, इसी गली से। उसका बाप राघव जी भी वकील था। पर राघव पढ़ने में तेज़ निकला। शहर गया, पढ़ा, बड़ा वकील बना।"
"तो फिर तू कह रही थी कि तू उसे नहीं जानती?" मेरी आवाज़ में गुस्सा आ गया था। "चबूतरे पर तेरी आँखों में पानी था। तू मुस्कुरा रही थी। अब कहती है कि तू उसे अच्छी तरह जानती है। माँ, कौन-सी बात सच है?"
माँ ने ढक्कन उठाया। उसके अंदर कुछ था। सूखा हुआ। एक टुकड़ा, जैसे किसी पुरानी मिठाई का। पर वो मिठाई नहीं था।
"ये तेरे पापा की अंगूठी का पत्थर है," माँ ने कहा। "जो उस रात टूटकर गिर गया था। जिस रात उन्हें ज़हर दिया गया।"
मेरा गला सूख गया।
"राघव उस रात यहाँ था," माँ ने कहा। उनकी आवाज़ एकदम सपाट थी। जैसे कोई पुरानी कहानी सुना रही हो। "तेरे पापा के पास आया था। रात को, पिछले दरवाज़े से। मैंने उसे चाय दी थी। उसने कहा था कि भैरव का केस लड़ना चाहता है, पर तेरे पापा ने मना कर दिया था।"
"क्यों मना किया?"
"क्योंकि तेरे पापा जान गए थे कि भैरव झूठ बोल रहा है। कि असली दोषी भैरव नहीं, कोई और है। और वो कोई और उन्हीं के बीच से था। मेरे ही गाँव से।"
मीरा ने धीरे से कहा, "कौन?"
माँ ने उसकी तरफ़ देखा। "बेटी, जिसका नाम लूँगी, वो अभी भी इस गाँव की हवा में साँस ले रहा है। पर आज सुबह चबूतरे पर जो हुआ, उसके बाद मैंने अपना मुँह खोलने का फ़ैसला कर लिया है।"
"तो बोल, माँ!" मैं उठ गया। "कौन था?"
"बैठ जा," माँ ने कहा। और उनकी आवाज़ में वो डाँट थी जो बचपन में मुझे सुबह जल्दी उठाती थी। मैं बैठ गया।
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