Spirit of a Fighter – Chapter 512
वो चबूतरे के पास रुकी और भैरव को देखा।
"तू मुझे पहचानता है?" उसने पूछा।
भैरव ने उसे देखा। उसकी आँखों में कुछ नहीं था — जैसे वो उसे पहचानता ही न हो।
"गंगा की माँ," वो औरत बोली, अपना नाम खुद बताते हुए। "तेरे अखाड़े में मेरा बेटा आया था। बीस साल पहले। वो लौटा तो बुखार था — तेरे ही आदमी ने कहा था, 'बुखार है, आराम करे।' और फिर वो कभी नहीं उठा।"
उसकी आवाज़ टूटी, पर वो रुकी नहीं।
"मैंने तेरे दरवाज़े पर बारह दिन खड़ी रहकर रोटी माँगी थी। तेरे आदमी ने कहा था — 'जा, तेरा बेटा तो कमज़ोर था।' और मैं चली गई थी। क्योंकि मेरे पास और कोई नहीं था।"
वो औरत चबूतरे की तरफ़ एक कदम बढ़ी।
"आज मेरे पास कोई नहीं है," उसने कहा। "तो अब मुझे किसका डर?"
उसकी आवाज़ सुनकर भीड़ में एक और औरत रोने लगी। फिर एक और। फिर एक और। वो औरतें जो अब तक चुप खड़ी थीं, अब अपने बेटों के नाम ले रही थीं — कोई "मेरा रामू" कह रही थी, कोई "मेरा शंकर"।
भैरव के आदमियों ने एक-दूसरे की तरफ़ देखा। उनमें से एक — जिसकी उम्र पचास के आसपास थी — ने अपनी लाठी नीचे कर दी।
"सर," उसने धीरे से कहा, "मैं चलता हूँ।"
"तू रुकेगा," भैरव ने कहा।
"नहीं, सर।" उस आदमी ने एक कदम पीछे हटाया। "मेरा भी बेटा अखाड़े में आता था। मुझे नहीं पता था… मैंने कभी नहीं पूछा। मैं नहीं पूछ सका।"
वो आदमी लाठी फेंककर भीड़ में खो गया।
मैंने माँ की तरफ़ देखा। उन्होंने चाबी ताले में डाली और घुमाई।
ताला खुला।
पर मैंने अभी कुछ नहीं कहा। मैंने भैरव की तरफ़ देखा। उसका चेहरा अब सपाट था — जैसे किसी ने उसके सारे रंग उतार दिए हों।
"भैरव," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ शांत थी, "तूने अभी कहा था कि भूख सच से बड़ी होती है। पर देख — ये औरतें आज भूखी ही आई हैं। कोई उन्हें खाना नहीं दे रहा। फिर भी वो सच के लिए खड़ी हैं।"
मैंने अपनी जेब से वो बड़ी चाबी निकाली जो उसने फेंकी थी।
"और ये चाबी?" मैंने उसे हवा में उठाया। "ये किस अलमारी की है? क्योंकि मेरे पास तो हरनाम की चाबी है। और तूने मुझे ऐसे फेंकी जैसे जानता था कि मैं इसे पहचान नहीं पाऊँगा।"
भैरव ने कुछ नहीं कहा।
"तूने मुझे ये इसलिए दी," मैंने कहा, "ताकि मैं सोचूँ कि अलमारी खुल गई, और जब अंदर कुछ न मिले, तो सब कहें — 'देखा, वीर झूठा था।'"
मैंने वो बड़ी चाबी ज़मीन पर फेंक दी। वो मिट्टी में गिरी और धूल उड़ी।
"पर असली अलमारी यहाँ है।" मैंने लोहे की कोठरी की तरफ़ इशारा किया। "और असली चाबी माँ के हाथ में।"
मैंने माँ की तरफ़ देखा। उन्होंने दरवाज़ा खींचा।
लोहे का दरवाज़ा चरमराया और खुल गया।
अंदर अँधेरा था, और एक गंध — पुरानी, बंद, जैसे कोई कमरा सालों से बंद हो। पीछे से किसी ने लालटेन बढ़ाई, और रोशनी अंदर गई।
अलमारी में काग़ज़ों के बंडल थे। रसीदें, लिखे हुए पन्ने, और — सबसे ऊपर — एक मोटा रजिस्टर, जिसके कोने पर वही त्रिकोण और बिंदु का निशान था जो चाबी पर था।
मैंने रजिस्टर उठाया। पन्ने पलटे। हर पन्ने पर नाम थे, तारीख़ें थीं, और… कीमतें।
मेरा हाथ रुक गया।
"ये क्या है?" कालू काका ने पीछे से पूछा।
मैंने पन्ना पलटा और उसे दिखाया।
"ये खाता है," मैंने धीरे से कहा। "हर उस आदमी का, जो इस अखाड़े में आया। कब आया, कब बीमार पड़ा, कब लौटा… और किसने उसे भेजा।"
मैंने उँगली एक नाम पर रखी।
"गंगा का बेटा।" मैंने ऊपर देखा, उस बूढ़ी औरत की तरफ़। "यहाँ लिखा है — 'अठारह दिन बाद लौटा, तीन दिन बुखार, फिर चला गया।' और इसके नीचे… भैरव के हस्ताक्षर हैं।"
वो औरत एक लंबी साँस लेकर चबूतरे के पास आ गिरी। दो औरतें उसे सँभालने दौड़ीं।
मैंने रजिस्टर बंद किया और उसे ऊपर उठाया।
"ये पूरे गाँव का सच है," मैंने कहा। "और ये आज सबके सामने पढ़ा जाएगा।"
पर जैसे ही मैंने ये कहा, मेरी नज़र अलमारी के सबसे अंदर गई — जहाँ एक छोटा दरवाज़ा था, लकड़ी का, जो अब तक दिखा ही नहीं था।
मैंने माँ की तरफ़ देखा। उन्होंने भी वो देखा।
॥
मैंने माँ की तरफ़ देखा। उन्होंने भी वो देखा।
अलमारी के सबसे अंदर, लकड़ी का एक छोटा दरवाज़ा — इतना छोटा कि अगर ध्यान से न देखो तो पता ही न चले। उसके किनारे अलमारी के पीछे वाले हिस्से से ज़रा अलग थे। जैसे किसी ने बाद में उसे काटकर लगाया हो।
"रुको।" माधव सिंह मंच से नीचे उतरने लगे। उनकी आवाज़ में वो ठंडक नहीं थी जो अभी माइक पर थी। "ये अलमारी अखाड़े की है। इसे खोलने का हक़ सिर्फ़ मुझे है।"
मैंने मुड़कर उन्हें देखा। उनके माथे पर पसीना था, और उनका हाथ बार-बार अपनी जेब की तरफ़ जा रहा था।
"सरपंच जी," मैंने कहा, "अभी-अभी आपने सबके सामने ऐलान किया था कि सोना चोरी हुआ है और चोर मैं हूँ। अगर ये अलमारी आपकी है, तो चलिए, खुद खोलिए। सब देख रहे हैं।"
भीड़ में से कोई बोला — "हाँ, खोलो।"
फिर कोई और बोला — "खोलो ना।"
माधव सिंह रुक गए। उनके होंठ हिले पर आवाज़ नहीं निकली।
तभी भैरव हँसा।
एक ज़ोर की हँसी — ऐसी जो डर से पैदा हुई हो। वो अपनी धोती सीधी करके खड़ा हुआ, हाथ जेब में डाले।
"खोलो," उसने कहा। "पर याद रखना, वीरा।" उसने मेरी तरफ़ ठुड्डी उठाई। "अंदर जो है वो तेरी माँ का सच है। तूने आज तक जिस औरत के आँचल में मुँह छुपाया है, वो सब देख रही है। और आज के बाद तेरे पास छुपाने को कुछ नहीं बचेगा।"
माँ ने मेरा हाथ पकड़ा। उनकी उँगलियाँ ठंडी थीं, पर पकड़ मज़बूत।
"खोलो," उन्होंने कहा। बस एक शब्द। ना काँपती आवाज़, ना डर।
मैंने चाबी ताले में डाली। ताला भारी था, जंग खाया — जैसे सालों से नहीं खुला हो। मैंने ज़ोर लगाया। चाबी घूमी, किसी चीज़ से टकराई, फिर अटक गई।
"छोड़ दे," भैरव ने कहा। "जाम हो गया है।"
मैंने हाथ नहीं छोड़ा। मैंने आँखें बंद करके चाबी को ज़रा पीछे घुमाया, फिर धीरे से आगे। ताला चरमराया। फिर एक आवाज़ आई — कट् — और चाबी मुड़ गई।
दरवाज़ा अपने आप खुल गया। जैसे अंदर से किसी ने धक्का दिया हो।
अंदर की गंध बाहर आई — पुरानी, बंद, फुफ्फुस जैसी। जैसे कोई तहखाना सालों से हवा के बिना बंद हो। पर उसके नीचे कुछ और भी था। मीठी, भारी — वही गंध जो भैरव की बोतलों से आती थी। तेज़।
मैंने मुँह अपनी बाँह पर रख लिया।
"लालटेन," मैंने पीछे कहा।
कालू काका आगे आए। उनके हाथ में लालटेन थी और उनके हाथ काँप रहे थे। उन्होंने लालटेन अंदर बढ़ाई। रोशनी दीवारों पर फैली।
अंदर। पहली नज़र में। बोतलें। पीले रंग का पतला काँच — पाँच-सात बोतलें, रैक पर सलीके से रखी। उनके नीचे रेत बिछी थी। एक बोतल लेटी थी, उसका ढक्कन खुला था, और उसके नीचे की रेत में गोल निशान बन गया था।
"ये…" किसी औरत ने पीछे से कहा। "ये क्या है?"
मीरा पहले आगे बढ़ी। उसने एक बोतल उठाई — नाक से सूंघा, कुछ पल रुकी, फिर बोली, "यही है।" उसकी आवाज़ सपाट थी, जैसे लैब में कोई नतीजा पढ़ रही हो। "यही वो पानी है। इन्हीं बोतलों से पहलवानों को दिया गया।"
मैंने रैक के पास रखी काग़ज़ों की गड्डियाँ उठाईं। रसीदें थीं। कुछ हिंदी में, कुछ अंग्रेज़ी में — पर मैंने अक्षर नहीं पढ़े। मैंने बस सूंघा। काग़ज़ों से वही गंध आ रही थी। और उसके नीचे — हल्दी, घी, और… पसीना।
"ये हिसाब है," मीरा ने काग़ज़ मेरे हाथ से लेकर कहा। उसने लालटेन की रोशनी में एक रसीद पढ़ी। "दो हज़ार रुपये — बसंता के नाम। तारीख़ — चौदह साल पहले।" वो रुकी। "बसंता तो अभी ज़िंदा है।"
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