Spirit of a Fighter508 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 508

7 min read November 5, 2026

"आप वही हैं," मैंने कहा। "जिसे मैं इन दिनों ढूँढ रहा था।"

जगदीश ने काग़ज़ की तरफ़ देखा जो मैं अभी खोल रहा था — रघुवीर की लिखाई वाली तीन लाइनें। उसने उसे अपने हाथ में लिया, और उसके हाथ काँपने लगे।

"ये इसने मरने से पहले लिखा था," उसने धीरे से कहा, जैसे खुद से बात कर रहा हो। "मैंने कहा था — मत लिख, रघुवीर, ये काग़ज़ तेरी मौत होगी। पर वो नहीं माना।" उसने काग़ज़ मेरी तरफ़ बढ़ाया। "वो जानता था। वो जानता था कि तेरे हाथ तक ये पहुँचेगा।"

माँ ने धीरे से कहा, "जगदीश भैया, उस रात आप थे?"

जगदीश ने सिर झुकाया।

"मैं था," उसने कहा। "मैंने अपनी आँखों से देखा — माधव सिंह ने अपने हाथ से बोतल से पानी में ज़हर डाला। और भैरव — पंद्रह साल का, दुबला, डरा हुआ — उसने वो गिलास उस पहलवान के हाथ में दिया जिसे उसने मरते देखा।" उसने आँखें बंद कर लीं। "मैंने रोका। मैंने कहा माधव, ये बच्चा अभी पंद्रह साल का है, इसे तू अपने हाथों से ज़हर देने वाला बना रहा है। और उसने मुझसे कहा — जगदीश, तू मेरा नौकर है। तू चुप रहेगा।"

टिंकू की साँस रुक गई थी। उसने अपने हाथ से अपना मुँह ढक लिया।

"फिर क्या हुआ?" मीरा ने पूछा। उसकी आवाज़ सख़्त थी, पर उसके हाथ कुर्ते के घेर को पकड़कर सिकोड़े हुए थे।

"फिर रघुवीर आ गए," जगदीश ने कहा। "और उन्होंने वो गिलास भैरव के हाथ से छीन लिया। और उस दिन भैरव ने पहली बार अपने जीवन में अपने बाप से—" वो रुक गया। "माफ़ी माँगी थी। उसने कहा — मैंने ज़हर नहीं दिया। मुझे नहीं पता था कि इसमें ज़हर है। और सच कहूँ तो… मुझे यकीन है, वो सच बोल रहा था।"

"क्या?" मैंने कहा। मेरा हाथ अपने आप पीतल के ढक्कन की तरफ़ बढ़ गया जो माँ ने पास रखा था।

जगदीश ने मेरी तरफ़ देखा। "वो बच्चा ज़हर देना नहीं चाहता था। वो चाहता था कि उसका बाप उसे देखकर कहे — शाबाश मोहन, तू मेरा बेटा है। बस इतना। पर माधव सिंह ने उसे पहले दिन से यही सिखाया। वो उसे इंसान नहीं बना रहा था। वो उसे औज़ार बना रहा था।"

माँ के गाल पर आँसू की एक लकीर चमकी, और उन्होंने उसे पोंछा नहीं। चूल्हे की आग अब सिर्फ़ लाल अंगारे थी, और उसकी रोशनी में माँ का चेहरा ऐसा दिख रहा था जैसे कोई पुरानी तस्वीर।

"तो फिर इन बीस सालों में?" मैंने पूछा। "जब-जब ज़हर दिया गया — भैरव ने खुद दिया, या माधव ने?"

जगदीश ने अपनी थैली खोली। उसमें से एक पुरानी, चमड़े से बंधी कॉपी निकाली — किनारों से जली हुई, पर अंदर से साबुत। उसने उसे मेरे आगे रखा और पन्ने उलटने लगा।

"ये मेरा हिसाब है," उसने कहा। "बीस साल का। हर बोतल, हर गिलास, हर मौत। मैंने सब कुछ यहाँ लिखा है — क्योंकि मुझे पता था कि एक दिन कोई पूछेगा। और उस दिन मेरे पास सिर्फ़ मेरी बात नहीं होनी चाहिए, मेरे पास सबूत होना चाहिए।"

उसके उँगली एक पन्ने पर रुकी। उसने उस पन्ने को मेरी तरफ़ घुमाया।

"ये देख," उसने कहा। "यहाँ लिखा है — साल भर में पहलवानों के मुकाबले से जो पैसा आया, उसका तीन हिस्सा माधव सिंह के पास गया, एक हिस्सा भैरव के पास, और मेरे पास सिर्फ़ इतना कि मैं ज़िंदा रहूँ। और यहाँ—" उसने दूसरा पन्ना पलटा। "यहाँ पहलवानों के नाम हैं। जो मरे। और उनके आगे लिखा है कि किस महीने में उन्हें ज़हर दिया गया और कब उनका आख़िरी दिन आया।"

मैंने वो पन्ना देखा। बहुत नाम थे। कुछ नाम ऐसे जो पूरे इलाक़े के अखाड़ों में गूँजते थे, और कुछ ऐसे जो अब किसी को याद नहीं। और हर नाम के आगे एक तारीख़, और एक छोटी सी बात — "जीतने के बाद", "दो महीने बाद", "अगले मुकाबले में"।

मेरा सिर भारी हो रहा था।

"आपने ये सब देखा," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ से गुस्सा बह रहा था। "और चुप रहे?"

जगदीश ने मेरी आँखों में देखा। उसकी आँखें नहीं झुकीं।

"मैंने एक बार बोला था," उसने कहा। "रघुवीर की मौत के बाद। मैंने कहा — माधव, मैं अब चुप नहीं रहूँगा। और अगले दिन मुझे पता चला कि मेरी बीवी और मेरी बेटी… दोनों गाँव के कुएँ में मिलीं।" उसकी आवाज़ में कुछ ऐसा टूटा जो अब तक जुड़ा हुआ था। "तब से मैंने अपना मुँह बंद कर लिया। और अपना हिसाब शुरू कर दिया।"

आँगन में एक लंबी चुप्पी छा गई। चूल्हे में एक अंगारा फूटा और छोटी-सी आवाज़ हुई।

माँ ने धीरे से कहा, "जगदीश भैया, उस रात जब मैं तहखाने में थी — आप कहाँ थे?"

जगदीश ने उनकी तरफ़ देखा।

"मैं कुएँ के पास था," उसने कहा। "मैंने तुम्हें देखा, सरस्वती। तुम पीतल का ढक्कन लेकर तहखाने में जा रही थीं। मैंने तुम्हें कुछ कहने की कोशिश की — पर तुमने मेरी तरफ़ देखा और तुमने सिर हिलाया। जैसे कह रही हो — मत बोल।"

माँ ने सिर हिलाया — वैसे ही, जैसे बीस साल पहले हिलाया था।

"मैंने सोचा," माँ ने कहा, "कि अगर आपने उस दिन कुछ बोला होता, तो आप भी मर जाते। और मैं अकेली रह जाती। मुझे अकेले लड़ना था। पर बीस साल बाद मुझे पता लगा कि मैं अकेली थी भी नहीं।"

जगदीश ने अपनी कॉपी बंद करके मेरी तरफ़ खिसका दी।

"ये तेरी है," उसने कहा। "मेरा हिसाब। मेरी गवाही। मुझे नहीं पता कल पंचायत में क्या होगा — पर अगर माधव सिंह फिर से कुछ झूठ बोले, तो इसे खोलकर उसके मुँह पर पटक देना।"

मैंने कॉपी उठाई। उसका मोटा, चमड़े वाला कवर हाथ में लेते ही मुझे ऐसा लगा जैसे किसी का दिल हाथ में आ गया हो।

"आप भी चलिए," मैंने कहा। "कल पंचायत में।"

जगदीश ने मुस्कुराने की कोशिश की। उसकी आँखें भर आईं।

"मैं नहीं चलूँगा," उसने कहा।

"क्यों?"

"क्योंकि अगर मैं गवाही दूँगा," उसने धीरे से कहा, "तो मुझे भी यह कहना पड़ेगा कि मैं बीस साल से जानता था। और मैं जेल जाऊँगा। और शायद मर जाऊँगा।" उसने मेरी आँखों में देखा। "पर वो मरने वाला मैं अगर मरूँ, तो जानता हूँ कि मेरी बेटी का हिसाब बराबर हो गया।"

मैं कुछ कहने ही वाला था कि माँ ने मेरा हाथ पकड़ लिया।

"जगदीश भैया," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ में वो सख़्ती थी जो बीस साल की चुप्पी से आई थी। "आप बीस साल से मरे हुए हैं। अब ज़िंदा होने का वक़्त है।"

जगदीश ने उनकी तरफ़ देखा।

"मैं सोचूँगा," उसने कहा, और अपनी थैली उठाकर खड़ा हो गया।

टिंकू उसे बाहर छोड़ने गया। मैं आँगन में खड़ा रहा, कॉपी हाथ में लिए। मीरा मेरे पास आकर खड़ी हो गई। माँ चूल्हे के पास बैठकर आग में लकड़ी डालने लगीं — जैसे कुछ हुआ ही न हो।

"तुम्हारे हाथ ठंडे हैं," मीरा ने धीरे से कहा, और मेरी उँगलियों को छुआ।

"मीरा," मैंने कहा। "ये सब… अगर जगदीश कल आता है, तो माधव सिंह का सब कुछ खत्म है।"

"अगर आता है।"

"वो आएगा," मैंने कहा। मुझे क्यों यकीन था, मुझे नहीं पता। पर था।

मीरा ने मेरे हाथ से कॉपी ली और उसे खोला। उसकी उँगली पन्नों पर चली, और फिर रुक गई।

"वीर," उसने कहा। उसकी आवाज़ बदल गई थी। "ये देखो।"

उसने कॉपी मेरी तरफ़ घुमाई। आख़िरी पन्ने पर, और वो पन्ना आधा फटा हुआ था, किसी ने जल्दी में कुछ लिखा था — बहुत छोटे अक्षरों में, और स्याही अब भी ताज़ी लग रही थी।

"मल्हान नहीं मरा।"

मैंने देखा। और सिर्फ़ तीन शब्द और थे — "वो भाग गया।"

मेरे हाथ से कॉपी फिसलने लगी।

"क्या मतलब?" मैंने कहा। "मल्हान की लाश मिली थी। उसका मुँह पीले झाग से भरा था। मीरा, तुमने खुद देखा था।"

"मैंने देखा था," मीरा ने कहा, और उसकी आवाज़ धीमी हो गई। "पर मैंने उस लाश को छुआ नहीं था। मैंने दूर से देखा था। हम सबने दूर से देखा था।"

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