Spirit of a Fighter – Chapter 506
मैं दौड़ा।
पैरों के नीचे सूखी मिट्टी थी, जो दौड़ते ही धूल उड़ाती थी। माँ पीछे रह गईं, मीरा ने उनका हाथ पकड़ लिया, टिंकू मेरे साथ भाग रहा था और लुट्टन सबसे पीछे। अखाड़े की दीवार पास आई, और साथ-साथ वो पीली रोशनी भी ऊपर उठती गई, जैसे किसी ने दीवार के पीछे आग की लपटें फैला दी हों।
गेट पर ताला नहीं था। खुला था। मैं अंदर घुसा।
अखाड़े के बीचों-बीच, उसी लाल मिट्टी के गोल मैदान के ऊपर, भैरव सिंह खड़ा था। उसके हाथ में एक मशाल थी, और सामने ज़मीन पर काग़ज़ों का ढेर जल रहा था। आग धीमी थी, धुआँ काला और मोटा, और वो धुआँ ऊपर जाकर अंधेरे में घुल जाता था।
उसने मेरी तरफ़ देखा। मशाल को ज़मीन पर टिका दिया। और मुस्कुराया।
"आ गया," उसने कहा। "मुझे पता था तू आएगा। तू आता ही है। तेरे पापा भी ऐसे ही आते थे — जहाँ आग दिखती, वहाँ दौड़कर जाते थे।"
मैंने मशाल के पास जलते काग़ज़ों को देखा। कुछ पन्ने अभी आधे जले थे — उन पर लिखाई दिख रही थी। बहीखाते। नाम। तारीखें।
"ये क्या जला रहा है?" मैंने पूछा।
"पुराने हिसाब।" भैरव ने कंधे उचकाए। "जो पैसा मिला, जो नाम लिखे, जो मौतें हुईं — सबका हिसाब। अब किसी को ज़रूरत नहीं। कल के बाद नया हिसाब शुरू होगा।"
पीछे से पैरों की आहट आई। माँ, मीरा, टिंकू और लुट्टन — सब गेट पर खड़े थे। माँ ने लालटेन नीचे रख दी, और उसकी रोशनी में उनका चेहरा साफ़ दिखा। उनकी आँखें मुझ पर थीं, और उनके होंठ काँप रहे थे, पर वो खड़ी थीं — सीधी, बिना टेके।
भैरव ने माँ को देखा और उसकी आवाज़ में फिर वो मिठास आ गई जो मुझे बचपन से चिढ़ाती थी।
"सरस्वती," उसने कहा, "तू भी आ गई। अच्छा किया। आज रात गवाह चाहिए थे मुझे।"
"गवाह?" मैंने कहा। "किस बात के गवाह?"
भैरव ने मशाल उठाई, और उसकी लौ हवा में लहराई। वो मेरी तरफ़ आया, धीरे-धीरे, जैसे कोई गाय अपने बछड़े के पास जाती है। दो कदम की दूरी पर रुका।
"मैं तुझे आख़िरी बार समझाने आया हूँ, वीर," उसने कहा। "पच्चीस साल का है तू। जवान है। तेरे अंदर आग है। ये आग अच्छी है — अगर किसी के हाथ लगे जो उसे संभालना जानता है।"
"मेरी आग किसी के हाथ नहीं लगती," मैंने कहा।
भैरव हँसा। ऐसे हँसा जैसे बच्चे की कोई बात पर हँसते हैं।
"देख, मैं तुझसे झगड़ने नहीं आया। मैं तुझे रास्ता देने आया हूँ।" उसने मशाल की लौ के पार मेरी आँखों में देखा। "कल पंचायत में सब इकट्ठे होंगे। माधव सिंह काग़ज़ दिखाएगा, तेरी माँ पर इल्ज़ाम लगाएगा, और तू उठकर कुछ कहेगा। मुझे पता है तू क्या कहेगा।"
"तो फिर तू जानता है कि मैं चुप नहीं रहूँगा।"
"इसीलिए तो आया हूँ।" भैरव ने मशाल नीचे की। उसकी आवाज़ धीमी हो गई, इतनी धीमी कि सिर्फ़ मैं सुन सकूँ। "कल अगर तू चुप रहा — बस एक दिन चुप रहा — तो मैं तुझे अखाड़े का उत्तराधिकारी घोषित कर दूँगा। सबके सामने। मेरे बाद ये अखाड़ा तेरा। मिट्टी तेरी। नाम तेरा।"
मेरे अंदर कुछ हिला। मैं झूठ नहीं बोलूँगा — वो शब्द मेरे कानों में मीठे लगे। "अखाड़े का उत्तराधिकारी।" वो सपना जो मैंने दीवार के बाहर खड़े-खड़े देखा था, जो माँ की चक्की की आवाज़ में छिपा था, जो गुड़िया की थैली की मिट्टी में बसा था — वो आज मेरे सामने खड़ा था, एक आदमी की ज़ुबान पर।
और शायद मेरे चेहरे पर वो कुछ दिखा। भैरव की आँखों में एक चमक आई।
"देख," उसने कहा, "मैं बुरा आदमी नहीं हूँ, वीर। मैंने जो किया, वो अखाड़े के लिए किया। तू नहीं जानता ये अखाड़ा चलाना क्या होता है। यहाँ पैसा लगता है। यहाँ आदमी लगते हैं। यहाँ…"
"यहाँ आदमी मरते हैं," मैंने कहा।
भैरव रुका।
"ग्यारह पहलवान," मैंने कहा। मेरी आवाज़ अपनी ही कानों में सुनाई दी, और वो शांत थी। "पिछले बीस साल में ग्यारह। और शायद उनसे भी ज़्यादा, जिनका हिसाब तेरी इन जलती किताबों में है। तू कहता है अखाड़े के लिए किया? अखाड़े में मिट्टी है, भैरव। मिट्टी। वो किसी की जान नहीं लेती। उसमें पसीना डालो, तो ताकत देती है। उसमें ज़हर डालो, तो…"
"तो क्या?" भैरव की आवाज़ में पहली बार कुछ तेज़ हुआ।
"तो वो मिट्टी नहीं रहती," मैंने कहा। "ज़हर बन जाती है। और तूने इस अखाड़े की मिट्टी में बीस साल ज़हर घोला है।"
भैरव ने मशाल को मेरी तरफ़ झुकाया। लौ मेरे चेहरे के करीब आई, गरमी मेरी त्वचा पर लगी।
"तेरी हिम्मत कैसे हुई?" उसकी आवाज़ अब मीठी नहीं थी। वो गुड़ जैसी नहीं, वो अब कुछ और थी — जैसे किसी बर्तन में पानी उबल रहा हो और ढक्कन उछलने को हो।
"मेरी हिम्मत नहीं है," मैंने कहा। "मेरे पास मिट्टी है। और मिट्टी किसी की जागीर नहीं होती।"
"मिट्टी?" भैरव हँसा, पर ये हँसी पहली वाली नहीं थी। "तू मिट्टी की बात करता है? तू — जो कल तक दीवार के बाहर खड़ा था? जिसके पास पहनने को पूरी धोती नहीं थी? तू मुझे मिट्टी सिखाएगा?"
"मैं तुझे मिट्टी नहीं सिखाऊँगा," मैंने कहा। "मैं तुझे बस इतना बताऊँगा कि मैं उसी मिट्टी से बना हूँ जिसे तूने ज़हर दिया है। उसी अखाड़े की मिट्टी से, जिसका मैदान तूने गड्ढों से भर दिया। उसी रामपुर की मिट्टी से, जिसके बेटों को तूने बुखार में मरवाया। और वो मिट्टी आज तेरे सामने खड़ी है।"
भैरव की आँखें बदलीं।
मैंने उसे पहले भी गुस्से में देखा था — पंचायत में, तहखाने में, चबूतरे पर। पर ये कुछ और था। ये वो गुस्सा नहीं था जो चिल्लाता है। ये वो गुस्सा था जो चुप हो जाता है। जो अंदर जमता है। जो आँखों से बाहर नहीं आता, बस ठंडा हो जाता है।
उसने मशाल ज़मीन पर पटक दी।
लौ फैली, जलते काग़ज़ों पर गिरी, और आग एक झटके में ऊपर उठी। टिंकू पीछे हटा। मीरा ने माँ को अपने पीछे किया।
और भैरव ने अपनी कमर से पानी का गिलास निकाला — वही गिलास जो वो हर सुबह पहलवानों को देता था — और उसे ज़मीन पर पटक दिया।
गिलास टूटा। पानी मिट्टी में फैल गया। और उस पानी से एक गंध उठी — कड़वी, धातु जैसी, जिसे मैं अब पहचानता था।
"तो कल तेरा अंत होगा," भैरव ने कहा।
उसकी आवाज़ बहुत शांत थी। इतनी शांत कि मेरी रीढ़ के नीचे ठंडी हवा फिसल गई।
"कल पंचायत में जो काग़ज़ मैं रखूँगा, उस पर तेरी माँ का अँगूठा होगा। और जो गवाही मैं दूँगा, वो तेरे पापा की मौत की होगी — और उसमें तेरी माँ का नाम होगा। तेरे पास चुप रहने का एक मौक़ा है। बस एक।"
वो मुड़ा। धोती झटकी। और चल दिया — धीरे, बिना जल्दी, जैसे कोई अपने ही घर से जा रहा हो। गेट पर वो रुका, और बिना पलटे बोला।
"और वीर — उस डिब्बे को खोल लेना। जो मैंने भेजा है। उसमें तेरे लिए एक चीज़ है जो तेरे पापा ने तेरे लिए छोड़ी थी। देख लेना, क्या छोड़ गए थे वो।"
वो गया। अंधेरे में घुल गया।
अखाड़े में आग जलती रही। मैं कुछ देर वहीं खड़ा रहा, और सुनता रहा कि काग़ज़ कैसे फटते हैं — छोटी-छोटी आवाज़ें, जैसे कोई दाँत पीस रहा हो।
फिर मैंने पलटकर देखा।
माँ गेट पर खड़ी थीं। लालटेन उनके पैरों के पास रखी थी, और उसकी पीली रोशनी उनके चेहरे पर पड़ रही थी। उनके हाथ साड़ी के पल्ले से जकड़े हुए थे। आँखें सूखी थीं — बिलकुल सूखी। पर उनके होंठ काँप रहे थे, और उनके कंधे थोड़े झुके हुए थे, जैसे किसी ने उन पर बोझ रख दिया हो।
मैं उनके पास गया।
"माँ…"
वो बस मेरी तरफ़ देखती रहीं। फिर उन्होंने अपना हाथ उठाया — धीरे, बहुत धीरे — और मेरे गाल पर रख दिया। उनकी हथेली ठंडी थी, और उसमें हल्दी की गंध थी।
"बेटा…" वो इतना ही कह पाईं।
मैंने उन्हें गले लगा लिया।
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