Spirit of a Fighter – Chapter 502
अगर मुंशीजी वहाँ नहीं रहे, तो वो हमें क्यों ले गए थे? और उन्होंने ये क्यों कहा कि वो उस झोपड़ी में रहते हैं?
मीरा ने मेरा हाथ पकड़ा। उसकी पकड़ कसकर थी।
"वीर," उसने धीरे से कहा। "क्या मुंशीजी ने हमें सच बताया?"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"मुझे नहीं पता," मैंने सच कहा। "पर एक बात पक्की है — उस रात जब हम भाग रहे थे, मुंशीजी ने हमें बचाया। अपनी जान जोखिम में डालकर। कोई झूठा आदमी ऐसा नहीं करता।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में सवाल था, पर उसने कुछ नहीं कहा।
जगदीश ने चादर ठीक की। "मैं पहाड़ी वाले रास्ते से जाऊँगा। तुम दोनों सीधे तहखाने पहुँचो। साँझ होते-होते मिलेंगे।"
वो पीछे मुड़ा और पेड़ों के बीच ग़ायब हो गया। उसकी जगह सिर्फ़ सूखी पत्तियों की आवाज़ बची।
मीरा ने अपना हाथ मेरे हाथ से नहीं छोड़ा। "वीर, सुक्खी बुआ का घर रास्ते में पड़ता है। वो अखाड़े के सबसे पुराने लोगों में से हैं। शायद वो कुछ जानती हों।"
हम चले। गली सूनी थी। दूर कहीं बच्चे खेल रहे थे, पर उनकी आवाज़ें दबी हुई लगीं, जैसे किसी ने उन्हें भी धीमा कर दिया हो।
सुक्खी बुआ अपने दरवाज़े पर बैठी थीं। सूखी मिर्चें फटक रही थीं। हमें देखकर उन्होंने मिर्चें वहीं छोड़ दीं।
"अरे, तुम दोनों? इस वक़्त?" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "लोग कह रहे हैं तुम पर इल्ज़ाम है, वीर। तू यहाँ क्यों घूम रहा है?"
"बुआ, एक बात पूछनी है," मीरा आगे बढ़ी। "अखाड़े के पीछे जो पुराना कमरा है, उसमें कौन रहता है?"
बुआ ने मिर्चें फटकना बंद कर दिया। उन्होंने चारों तरफ़ देखा, जैसे दीवारों के भी कान हों।
"अरे, मैंने तो सुना है," उन्होंने आवाज़ धीमी करके कहा, "कि कोई पुराना मुंशी अब भी अखाड़े के पीछे वाले कमरे में रहता है। बड़ा सीधा-सादा आदमी है। किसी से बोलता नहीं। पर…" वो रुकीं।
"पर क्या, बुआ?"
"पर लोग कहते हैं कि वो मुंशी मर चुका है। बीस साल पहले। उसकी कोई अर्थी भी नहीं उठी थी। तो फिर वो कमरे में कौन है? कोई कहता है भूत है। कोई कहता है कोई और ही है जो मुंशी का भेस बदलकर रहता है।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। मेरे हाथ ठंडे पड़ गए थे।
"बुआ, वो कमरा कैसे जाता है?" मैंने पूछा।
"अखाड़े के पीछे से सीढ़ियाँ हैं। पुरानी, टूटी हुई। उतरकर बाएँ मुड़ना। पर वहाँ कोई नहीं जाता, बेटा। उस कमरे की हवा भारी है। जो गया, वो ठीक से लौटा नहीं।"
मीरा ने मेरा हाथ दबाया। "हमें जाना होगा, बुआ।"
बुआ ने एक पल हमें देखा। फिर उन्होंने अपनी मिर्चें उठाईं, पर उनकी आँखें भर आई थीं। "जाओ। पर अंधेरा होने से पहले लौट आना। और वीर — तेरी माँ ने आज तुझे याद किया था। कह रही थी, मेरा बेटा कहाँ है।"
मेरे गले में कुछ अटक गया। मैंने सिर हिलाया और चल दिया।
अखाड़े के पीछे सीढ़ियाँ मिलीं। ठीक वैसी जैसी बुआ ने कही थीं। टूटी हुई, काई लगी। हम उतरे। हवा में नमी थी और कुछ और भी — एक मीठी, भारी गंध।
लोबान।
मीरा ने मेरी कलाई पकड़ ली। "वही गंध," उसने फुसफुसाया।
कमरे का दरवाज़ा खुला था। हम अंदर गए। कोई नहीं था। एक चारपाई, एक टूटी मेज़, और कोने में एक जली हुई अगरबत्ती — अभी भी धुआँ उठ रहा था, जैसे किसी ने अभी-अभी बुझाई हो।
दीवार पर एक पुराना शीशा टँगा था। मैं उसके पास गया। शीशे के पीछे कुछ था — एक तस्वीर, धूल में दबी।
मैंने उसे निकाला। उस पर तीन आदमी खड़े थे। बीच में भैरव — जवान, हँसता हुआ। उसके बाएँ माधव सिंह, उसी तरह का सख़्त चेहरा। और दाएँ एक तीसरा आदमी — जिसका कंधा कपड़े से ढका था, चेहरा साफ़ नहीं।
मीरा ने तस्वीर देखी। उसकी साँस रुक गई।
"वीर, ये तीसरा आदमी…"
तभी पीछे से आवाज़ आई। ठंडी, धीमी, पर साफ़।
"उस तस्वीर में तीसरा आदमी मैं हूँ।"
मैं पलटा। दरवाज़े पर मुंशीजी खड़े थे। वही मुंशीजी — जिन्हें पूरा गाँव बीस साल से मरा हुआ समझता था।
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मैं पलटा। दरवाज़े पर मुंशीजी खड़े थे। वही मुंशीजी — जिन्हें पूरा गाँव बीस साल से मरा हुआ समझता था।
पर जो मेरे सामने खड़े थे, उनमें मुर्दे जैसी क्या बात थी? आँखें ज़िंदा थीं, और उन आँखों में पानी भरा था।
मेरे हाथ में तस्वीर थी। वो तस्वीर जिसमें भैरव जवान था, माधव सिंह सख़्त चेहरे वाला, और एक तीसरा आदमी जिसका कंधा कपड़े से ढका था। मैंने तस्वीर को मुंशीजी के सामने उठाया।
"ये कंधा?" मेरी आवाज़ सूखी निकली।
मुंशीजी ने एक कदम आगे रखा। फिर दूसरा। उनकी चप्पल से आवाज़ नहीं हो रही थी, जैसे पैर ज़मीन पर रखे ही न हों। उन्होंने धीरे से अपनी कमीज़ का कंधा नीचे सरकाया।
लोबान की अगरबत्ती के धुएँ के बीच मुझे वो निशान दिखा। गोल, चिकना, झुर्रीदार — जला हुआ, फिर ऊपर से चमड़ी बन गई थी। बीस साल पुराना निशान। माँ ने कहा था — उस रात एक दुबला आदमी लोहे की डिब्बी लेकर कुएँ की तरफ़ गया था, उसकी पीठ पर गोल जला निशान था।
मेरी साँस रुक गई। मीरा ने मेरी कलाई पकड़ी, पर मुझे उसकी उँगलियाँ महसूस नहीं हुईं। मेरे कानों में बस एक आवाज़ गूँज रही थी — माँ की आवाज़। "ये न माधव था न भैरव।"
"आप," मैंने कहा। आवाज़ काँप रही थी। "आप वो आदमी थे?"
मुंशीजी ने सिर हिलाया। एक बूँद उनकी आँख से निकलकर ठुड्डी पर रुक गई, फिर गिर गई।
"मैं वो आदमी था, वीर।" उनकी आवाज़ ऐसी थी जैसे किसी पुराने ताले की चाबी मुड़ रही हो। "और तेरे पापा का दोस्त भी मैं ही था। रघुवीर के साथ मैंने चार साल एक ही चटाई पर सोकर बिताए थे।"
मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई। यही चारपाई? यही कमरा? कितने साल से ये आदमी यहाँ छिपा बैठा था, सिर्फ़ दो कदम की दूरी पर, जहाँ भैरव रोज़ आता-जाता था?
"तो फिर आपने उसे बचाया क्यों नहीं?" मेरी आवाज़ फट पड़ी। "आप मेरे पापा के दोस्त थे! जब भैरव उन्हें ज़हर दे रहा था, तब आप कहाँ थे?"
मुंशीजी की आँखें बंद हो गईं। वो चारपाई के किनारे पर बैठ गए, धीरे से, जैसे उनकी हड्डियाँ भी अब बोझ नहीं उठा पातीं।
"मैं उस कमरे में था, वीर। उसी रात।" उन्होंने आँखें खोलीं। "मैंने देखा — भैरव ने पीली शीशी से कुछ निकालकर तेरे पापा की थाली में डाला। मैं देखकर भी चुप रहा। मेरे हाथ काँप रहे थे, पर मैं चुप रहा।" उनकी आवाज़ टूट गई। "क्योंकि भैरव ने मुझे पहले ही डरा दिया था। मेरी बूढ़ी माँ उस वक़्त बीमार थी। भैरव ने कहा था — तूने एक शब्द बोला, तो तेरी माँ की दवा बंद।"
मीरा ने मेरा हाथ छोड़ दिया। वो कमरे के दूसरे कोने की तरफ़ देख रही थी, जैसे सच सुनते हुए कहीं दूर जा रही हो।
"तो मैं चुप रहा," मुंशीजी बोले। "और जब तेरे पापा नीचे गिरे, तब मैं भागा। मुझे बस एक ही बात सूझी — वो डिब्बी। जिसमें बाकी ज़हर था। मैंने उसे उठाया और भागा। दरवाज़े पर भैरव ने मेरा कंधा पकड़ा, मैंने छुड़ाया, और मेरी कमीज़ आग की लौ से छू गई।"
वो झुके। उनकी पीठ की हड्डी दिख रही थी, कमीज़ के नीचे से। "वो ज़हर की डिब्बी मैंने छुपाई थी, वीर। उसी रात। उसी सीढ़ी के नीचे, ईंटों के पीछे। और वो डिब्बी आज भी वहीं है।"
कमरा चुप हो गया। इतना चुप कि मुझे अपनी साँसों की आवाज़ सुनाई दे रही थी, और दूर कहीं अखाड़े में किसी के कसरत करने की हल्की आवाज़।
फिर मुझमें कुछ फूटा। मुझे पता नहीं कहाँ से ताकत आई, पर मैं दो कदम में उनके पास पहुँचा और उनका कॉलर पकड़ लिया। मेरे हाथ काँप रहे थे। मेरी आँखों में आग थी।
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