Spirit of a Fighter – Chapter 500
मुंशीजी ने काग़ज़ मेरी तरफ़ बढ़ाया। "इसी में सब है। पर एक बात याद रखना — सबसे पहले तुम्हें उस आदमी से मिलना होगा जिसके कंधे पर निशान है। वो जो बूढ़े ने बताया। वो माधव का सबसे पुराना आदमी है। उसके पास वो रजिस्टर है जिसमें हर पहलवान के पैसे लेने के अँगूठे हैं। अगर वो तुम्हारे साथ आ गया, तो माधव कुछ नहीं कर सकता।"
"वो कहाँ है?" मीरा ने पूछा।
मुंशीजी ने खिड़की से बाहर देखा। बाहर धूप तेज़ हो रही थी।
"वो अखाड़े के पीछे वाले कमरे में रहता है। जहाँ पुराने औज़ार रखे हैं। वो अब बूढ़ा है। अपनी जगह से हिलता नहीं। माधव उसे वहीं रखता है, क्योंकि वो चाहता है कि वो कुछ न बोले।"
"उसका नाम?" मैंने पूछा।
"जगदीश," मुंशीजी ने कहा।
मेरे रोंगटे खड़े हो गए। मैंने एक पल के लिए सोचा कि मैंने ये नाम पहले कहाँ सुना है। फिर याद आया — कालू काका ने उस रात तहखाने में उस छिपे आदमी को "जगदीश" कहकर पुकारा था। पर वो निकला था रामदीन।
"जगदीश…" मैंने धीरे से दोहराया। "मेरे पापा के दोस्त?"
मुंशीजी ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखें सिकुड़ गईं। "तुम्हारे पापा? रघुवीर के दोस्त?"
"हाँ।"
वो कुछ देर चुप रहे। फिर वो धीरे से बोले, "तो तुम्हें पता नहीं। जगदीश रघुवीर का दोस्त नहीं था। जगदीश रघुवीर का गुरु था। उसने रघुवीर को मिट्टी पहचानना सिखाया था। और उसने ही भैरव को ज़हर बनाना सिखाया था।"
मैं जम गया।
"पर…" मेरी आवाज़ फिसल गई। "पर रामदीन ने कहा था कि उसने भैरव को ज़हर बनाना सिखाया…"
"रामदीन ने सिखाया," मुंशीजी ने कहा। "पर जगदीश ने रास्ता दिखाया। फर्क है दोनों में। रामदीन ने बाद में मना कर दिया था। जगदीश ने कभी नहीं मना किया। वो आज भी माधव के साथ है।"
मेरे हाथों में काग़ज़ था, और वो भारी लग रहा था। कमरे में हवा भारी थी।
"मैं उससे मिलूँगा," मैंने कहा।
"अभी नहीं," मुंशीजी ने कहा। उन्होंने मेरा हाथ पकड़ लिया। उनकी पकड़ कमज़ोर थी, पर उसमें ज़िद थी। "अभी वो तुमसे नहीं बोलेगा। तुम्हें पहले उसका भरोसा जीतना होगा। और उसका भरोसा जीतने का एक ही तरीका है — तुम्हें उसे वो दिखाना होगा जो माधव ने छिपाया है।"
"क्या?"
"जगदीश का एक बेटा था," मुंशीजी ने कहा। "उसका नाम भी जगदीश के साथ जुड़ा है। उसका नाम था… अर्जुन। वो भी पहलवान था। बीस साल पहले। अखाड़े का सबसे अच्छा।" वो रुके। "वो भी ज़हर से मरा। उसकी मौत के बाद जगदीश माधव के पास गया। उसने माधव से पूछा — मेरे बेटे को क्यों मारा? माधव ने कहा — तेरे बेटे ने रणवीर के साथ मिलकर मेरे खिलाफ़ साज़िश की थी। जगदीश ने कहा — तो फिर मुझे भी मार दे। माधव ने कहा — नहीं, तू ज़िंदा रहेगा। और मेरे काम आएगा। और तू अपने बेटे का हत्यारा नहीं, मेरा आदमी बनेगा।"
मेरे मुँह से कुछ नहीं निकला।
"जगदीश बीस साल से उसी कमरे में है," मुंशीजी ने कहा। "अपने बेटे के हत्यारे के लिए काग़ज़ लिखता है। हर महीने पैसा लेता है। और अपने बेटे की तस्वीर देखता है। तुम उससे सिर्फ़ एक बात कहना — 'अर्जुन को इंसाफ़ चाहिए?'"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में कुछ बदल गया था। जैसे उसने भी कुछ समझ लिया हो।
"चलो," मैंने कहा।
मुंशीजी ने मेरा हाथ छोड़ दिया। "एक बात," उन्होंने कहा। "मैं मरा हुआ हूँ। जगदीश को ये नहीं पता कि मैं ज़िंदा हूँ। अगर उसे पता चला तो वो माधव को बता देगा। उसे पता चलना नहीं चाहिए।"
"आप यहाँ कैसे आए?" टिंकू ने पूछा, जो अब तक चुप था।
"मैंने तुम्हारी दुकान के पीछे से आते एक लड़के को देखा," मुंशीजी ने कहा। "वो तुम्हारे भाई का… माफ़ करना, टिंकू। वो बंटी था। मैंने उसे पहचान लिया। मैंने सोचा कि अगर बंटी ज़िंदा है, तो ये वक़्त है। मैंने हिम्मत की और चला आया।"
वो उठे। उनके घुटने चटकी। "मुझे जाना होगा। रोज़ ढलते सूरज से पहले मैं वापस झोपड़ी में होता हूँ। सुक्खी बुआ के आदमी मेरे पीछे न पड़ें, इसलिए पहाड़ी वाले रास्ते से जाऊँगा।"
मैंने उन्हें दरवाज़े तक छोड़ा। बाहर निकलते वक़्त उन्होंने मेरा कंधा थपथपाया। उनका हाथ हड्डी जैसा था।
"तुम्हारे पापा ने एक बार मुझसे कहा था," उन्होंने कहा। "जो मिट्टी में ज़हर घोलता है, वो एक दिन खुद उसी मिट्टी में गिरेगा। तुम्हारे पापा नहीं देख पाए वो दिन। पर तुम देखोगे।"
वो गए। मैं दरवाज़े पर खड़ा रहा।
मीरा मेरे पास आई। उसने मेरा हाथ पकड़ा। उसकी उँगलियाँ ठंडी थीं।
"वीर," उसने कहा। "तुम ठीक हो?"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। मेरे अंदर कुछ भर रहा था। गुस्सा नहीं। कुछ और। जैसे सारे टुकड़े एक-एक करके जुड़ रहे हों।
"मेरे पापा," मैंने कहा। "उन्होंने मुझे कुछ नहीं बताया। माँ ने कुछ नहीं बताया। मैं पच्चीस साल का हूँ और मुझे अपने ही घर का सच आज पता चल रहा है।"
"तुम्हारी माँ ने तुम्हें बचाया," मीरा ने कहा। "अगर वो बता देतीं, तो तुम आज ज़िंदा नहीं होते।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। उसकी आँखें साफ़ थीं। और उनमें वो चीज़ थी जो मुझे हर बार डगमगाते वक़्त सीधा खड़ा कर देती थी।
"चलो," मीरा ने कहा। "जगदीश से मिलने चलते हैं।"
हम निकल पड़े। रास्ते में सुक्खी बुआ मिलीं। वो अपने आँगन में पान का बीड़ा बना रही थीं। हमें देखते ही उनकी आँखें चमकीं।
"अरे वीर!" उन्होंने दूर से ही आवाज़ दी। "तू माधव सिंह की पुलिस से बचकर निकल आया? मैंने तो सुना था तू पकड़ा गया।"
"बुआ, आपने कहाँ सुना?" मैंने कहा।
"अरे मैंने तो सुना है…" वो गेट तक आईं। "सुनने की बात ये है कि तेरे पीछे अब पूरा गाँव है। कल रात बसंता का बाप तेरे घर के बाहर बैठा था। क्या बात है?"
"बुआ, एक बात पूछनी थी," मीरा ने बीच में कहा। "अखाड़े के पीछे वाले कमरे में कोई पुराना आदमी रहता है? जगदीश?"
सुक्खी बुआ ने पान थूका। एक पल के लिए वो चुप हुईं। ये दुर्लभ था। "जगदीश?" उन्होंने धीरे से कहा। "तू उसके बारे में क्यों पूछ रही है?"
"बस पूछ रही हूँ," मीरा ने कहा।
बुआ ने आँगन के बाहर देखा। फिर वो हमारे पास आईं और आवाज़ धीमी की।
"वो आदमी बीस साल से उस कमरे से बाहर नहीं निकला," उन्होंने कहा। "मैं एक बार उसे देखने गई थी। जब मेरे पति बीमार थे। मैं सोच रही थी शायद वो कुछ जानता है। उसने मुझे अंदर नहीं आने दिया। दरवाज़े से ही कहा — 'जो जानना चाहती है, वो जानती है। जो नहीं जानती, उसे जानने की ज़रूरत नहीं।' और फिर उसने दरवाज़ा बंद कर दिया। मैंने उसे उसके बाद कभी नहीं देखा।"
"वो कैसा दिखता है?" मैंने पूछा।
बुआ ने अपना बीड़ा गाल में दबाया। "कैसा दिखता है… याद नहीं। बस इतना याद है कि उसके कमरे से हमेशा एक गंध आती थी। कुछ जलता रहता था वहाँ। दिन-रात।"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। मीरा ने मेरी तरफ़। दोनों को एक ही बात समझ आ गई थी।
"लोबान," मैंने धीरे से कहा।
"क्या?" बुआ ने कहा।
"कुछ नहीं बुआ," मीरा ने कहा। "चलते हैं।"
हम चल पड़े। सुक्खी बुआ हमारे पीछे कुछ बोलती रहीं, पर मैंने सुना नहीं।
अखाड़े का पिछला हिस्सा सुनसान था। दीवार पर काई जमी थी। ज़मीन पर पुराने पत्थर बिखरे थे। सामने एक छोटा-सा दरवाज़ा था, जिस पर ताला नहीं था। बस एक पुरानी ज़ंजीर लटक रही थी जो ठंडी हवा में हल्की-सी खड़खड़ा रही थी।
मैंने दरवाज़ा खटखटाया। अंदर से कोई आवाज़ नहीं आई।
मैंने फिर खटखटाया। ज़ोर से।
"जगदीश काका?" मैंने कहा। "मैं वीर सिंह हूँ। रघुवीर का बेटा।"
अंदर से कुछ गिरने की आवाज़ आई। फिर चुप्पी। फिर दरवाज़े के नीचे से एक आवाज़ आई, जैसे किसी ने दीवार से सटकर बात की हो।
"मेरे पास कुछ नहीं है। मैं बूढ़ा हूँ। मुझे अकेला छोड़ दो।"
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