Spirit of a Fighter – Chapter 469
"चुप रह," मैंने कहा।
"मैं चुप नहीं रहूँगा," भैरव ने कहा। "बीस साल मैं चुप रहा। अब वो बात कहूँगा जो सिर्फ़ मैं जानता हूँ।"
उसने इंस्पेक्टर की तरफ़ देखा, फिर भीड़ की तरफ़।
"आप सब जानते हैं कि मैंने पहलवानों को पानी में ज़हर घोलकर दिया। पर आप ये नहीं जानते कि वो पानी बनाना मुझे किसने सिखाया।" उसने रणवीर सिंह की तरफ़ इशारा किया। "इन्होंने नहीं सिखाया। पर इन्होंने एक बार वो पानी पिया था। और जब इन्हें पता चला कि ये पानी इन्हें खा रहा है, तो इन्होंने… अपने बचने का रास्ता निकाला।"
मैदान में सन्नाटा छा गया। इतना गहरा कि दूर नहर की आवाज़ भी आ रही थी।
"कैसे?" किसी ने पीछे से पूछा। पता नहीं कौन था।
भैरव ने अपना सिर थोड़ा नीचा किया। "इन्होंने वो पानी किसी और को पिला दिया।" उसने रुककर सबको सुनने का मौका दिया। "उस आदमी का नाम शेर सिंह था।"
मेरे कानों में गूँज हुई।
शेर सिंह। भैरव का पालने वाला बाप। वो आदमी जिसे रघुवीर के हाथों ज़हर पिलवाया गया था।
"झूठ," मैंने कहा। मेरी आवाज़ भारी हो गई थी। "तू झूठ बोल रहा है।"
"मैं झूठ नहीं बोल रहा," भैरव ने कहा। उसकी आँखें रणवीर सिंह पर टिकी थीं, और उनमें कुछ था जो मैंने पहले कभी नहीं देखा था — न गुस्सा, न शिकार की खुशी। बस एक पुराना, थका हुआ दर्द। "मैं उस रात वहाँ था। दस साल का लड़का। मैंने देखा कि रणवीर सिंह ने शेर सिंह के हाथ में गिलास थमाया। मैंने देखा कि शेर सिंह ने पिया। और मैंने देखा कि रणवीर सिंह उस रात घर गए और आराम से सोए।"
"तू झूठा है," मैंने कहा। मेरे हाथ मुट्ठी में बंध गए थे।
"मैं ज़हर देने वाला हूँ," भैरव ने कहा। "पर झूठा नहीं हूँ।"
मैंने रणवीर सिंह की तरफ़ देखा।
वो अभी भी खड़े थे। पर अब वो खड़े नहीं लग रहे थे। उनका शरीर सीधा था, पर उनके अंदर कुछ ढह रहा था। उनका चेहरा पीला पड़ गया था, ऐसा पीला जैसे पुराना काग़ज़। उनकी बड़ी मूँछें हिल रही थीं, और उनकी आँखें… उनकी आँखों में वो नहीं था जो मैंने कल नहर किनारे देखा था। उस वक़्त उनकी आँखों में आग थी। अब उसमें सिर्फ़ एक खालीपन था।
"पापा," मीरा ने धीरे से कहा।
उसने अपना हाथ उनकी तरफ़ बढ़ाया। वो उनके हाथ तक पहुँचा, पर उन्होंने उसे नहीं थामा। वो हिले नहीं। बस वहीं खड़े रहे, जैसे उनके पैरों की ज़मीन ही खिसक गई हो — और ये वो पैर थे जो अभी-अभी उन्होंने बीस साल बाद खुद के सहारे उठाए थे।
मीरा की आवाज़ फिर आई, और इस बार उसमें वो तेज़ी नहीं थी जो कोर्ट में बहस करने वाली लड़की में होती थी। इसमें सिर्फ़ एक बेटी की आवाज़ थी।
"पापा," उसने कहा, "ये सच है?"
पूरी पंचायत में सन्नाटा। इतना सन्नाटा कि मुझे अपनी साँस सुनाई दे रही थी। किसी ने खाँसा भी नहीं। किसी ने हिलकर अपनी जगह नहीं बदली। सैकड़ों लोगों की भीड़, और एक भी आवाज़ नहीं।
मैंने रणवीर सिंह को देखा। उनकी आँखें मीरा से मिलने से बच रही थीं। वो ज़मीन की तरफ़ देख रहे थे, जहाँ भैरव की फटी लाल धोती पड़ी थी। उनके होठों पर शब्द थे, पर वो बाहर नहीं आ रहे थे। जैसे बीस साल से दबी एक चीज़ अब उनके गले में अटक गई हो।
"पापा," मीरा ने फिर कहा, और इस बार उसकी आवाज़ टूट रही थी। "मुझसे झूठ मत बोलिए। प्लीज।"
रणवीर सिंह ने आँखें बंद कीं।
उनका सीना धीरे-धीरे ऊपर-नीचे हो रहा था, और मुझे दूर से दिख रहा था कि उनके हाथ, जो अभी-अभी मेरी माँ की कहानी सुनाकर खुले थे, अब काँप रहे थे। उन्होंने अपने दोनों हाथ एक-दूसरे में जोड़ लिए, जैसे अपने आप को रोक रहे हों।
भीड़ में से कोई बोला, "बोलिए, रणवीर जी। क्या ये सच है?"
रणवीर सिंह ने आँखें खोलीं।
और उन्होंने देखा — मेरी तरफ़ नहीं, मीरा की तरफ़ नहीं, भीड़ की तरफ़ नहीं। उन्होंने ऊपर देखा। आसमान की तरफ़। जैसे वहाँ से कोई जवाब आएगा।
फिर उन्होंने धीरे से, बहुत धीरे से, वो शब्द कहे जो मुझे उम्मीद थी कि वो कभी नहीं कहेंगे।
"हाँ," उन्होंने कहा। "एक बार मैंने भी वो पानी पिया था।"
मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
मीरा के हाथ उनके हाथ से छूट गए। वो एक कदम पीछे हटी। उसकी आँखें बड़ी हो गईं, और उसके होठों से कोई आवाज़ नहीं निकली।
"एक बार," रणवीर सिंह ने दोहराया। उनकी आवाज़ में अब वो गरज नहीं थी जो सुबह थी। अब वो बस एक थके हुए आदमी की आवाज़ थी। "बीस साल पहले। मुझे नहीं पता था कि इसमें क्या है। मुझे बस इतना पता था कि ये ताकत देता है। और मुझे ताकत चाहिए थी।"
"किसने दिया?" मैंने पूछा। मेरी आवाज़ कर्कश निकली।
रणवीर सिंह ने मेरी तरफ़ देखा। "तेरे पापा ने।"
मेरे अंदर कुछ टूटा।
"रघुवीर ने?" मैंने कहा। "मेरे पापा ने?"
"उन्हें नहीं पता था कि इसमें ज़हर है," रणवीर सिंह ने कहा। "वो खुद इसे बनाते थे, तहखाने की मिट्टी से। वो सोचते थे ये सिर्फ़ ताकत है। जब मुझे पता चला कि ये ज़हर है, तो मैंने पीना बंद कर दिया। पर तब तक मेरे पैर… मेरे पैर कमज़ोर होने लगे थे।"
"और शेर सिंह?" मैंने पूछा। मेरी आवाज़ तेज़ हो गई। "तूने उसे क्यों पिलाया?"
रणवीर सिंह ने एक लंबी साँस ली। उस साँस में बीस साल थे।
"मैंने नहीं पिलाया," उन्होंने कहा। "मुझे ऐसा लगा था कि मैंने पिलाया।"
मैं रुक गया।
"क्या मतलब?"
"उस रात मैंने शेर सिंह के हाथ में गिलास थमाया था," रणवीर सिंह ने कहा। "पर वो गिलास मैंने उसे दिया नहीं था। मैंने उसे पकड़कर रखा था, क्योंकि वो लड़खड़ा रहा था। वो खुद उसे पीना चाहता था। वो कह रहा था कि वो मुझसे जीतना चाहता है, और उसके लिए वो सब करेगा। मैंने उसे रोका। पर वो नहीं माना।" उन्होंने रुककर भैरव की तरफ़ देखा। "और तेरे दस साल के लड़के ने दूर से सिर्फ़ इतना देखा कि मेरे हाथ में गिलास है और उसके बाप के हाथ में गिलास है।"
भैरव हिल गया।
"झूठ," उसने कहा। पर उसकी आवाज़ में भी अब वो यकीन नहीं था।
"तेरे बाप ने मेरी मदद माँगी थी," रणवीर सिंह ने कहा। "उसने मुझसे कहा था कि अगर उसे कुछ हो जाए, तो मैं उसे बचाऊँ। मैंने कोशिश की। पर उसे पता था कि वो ज़्यादा पी रहा है। वो जानबूझकर पी रहा था। वो ताकत चाहता था, चाहे कुछ भी हो जाए।"
"मेरे बाप जानबूझकर नहीं पीते," भैरव ने कहा। उसकी आवाज़ फट रही थी। "आप झूठ बोल रहे हैं। आप ऐसा कहकर खुद को बचाना चाहते हैं।"
"मैं खुद को बचाना चाहता हूँ?" रणवीर सिंह ने कहा। उनकी आवाज़ में अब कोई गरज नहीं थी। सिर्फ़ एक थका हुआ हँसी जैसा धुँधला शब्द। "मैंने बीस साल तुम्हें अखाड़े में पला। तुम्हारी हर बात सही। तुमने ज़हर बनाया, मैंने कभी रोका नहीं। तुमने पहलवान मारे, मैंने कभी रोका नहीं। क्यों? क्योंकि मेरे पैरों में भी वो पानी था। मैं डरता था। डरता था कि अगर मैंने तुम्हें रोका, तो तुम मेरे पैरों की बात सबको बता दोगे। और फिर मैं… मैं वो नहीं रह जाता जो मैं था।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा। उनके हाथ अब भी जुड़े हुए थे। उनकी आँखों में पानी आ गया था। उन्होंने उसे पोंछा नहीं। जैसे अब उन्हें पोंछने का हक़ ही नहीं था।
"तो शेर सिंह की मौत में तेरा हाथ नहीं था?" मैंने पूछा। "पर तूने माधव सिंह को क्यों नहीं रोका? तू जानता था कि माधव ने रघुवीर से ज़हर पिलवाया था। तू जानता था कि भैरव माधव का बेटा है। तू जानता था।"
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