Spirit of a Fighter – Chapter 466
पर तभी मेरी नाक में वो गंध आई। फिर से। कड़वी, जली हुई।
मैंने आँखें खोलीं। माँ से अलग हुआ।
"माँ," मैंने कहा, "आपको कुएँ की तरफ़ से कोई गंध आ रही है?"
उन्होंने सूँघा। फिर सिर हिलाया। "नहीं।"
मैंने मीरा की तरफ़ देखा। वो भीड़ से निकलकर आ रही थी, उसके हाथ में वो काग़ज़ था।
"मीरा," मैंने कहा। "कुआँ कहाँ है?"
उसने कहा, "अखाड़े के पीछे। पर वहाँ तो सब बंद है।"
"तो फिर ये जलने की गंध कहाँ से आ रही है?"
मीरा रुकी। उसने अपनी नाक ऊपर की। और फिर उसका चेहरा बदल गया।
"ये गंध…" उसने कहा। "ये मिट्टी जलने की गंध है। तहखाने की मिट्टी।"
मैंने चारों तरफ़ देखा। भीड़ अपनी जगह से हिल रही थी। लोग एक-दूसरे से बात कर रहे थे। कोई रो रहा था, कोई हँस रहा था।
पर मुझे वो गंध साफ़ आ रही थी। और वो गंध तेज़ हो रही थी। जैसे कहीं पास में कुछ जल रहा हो।
मैंने टिंकू को आवाज़ दी। वो मिठाई की थाली लिए खड़ा था, और उसका चेहरा भी अचानक गंभीर हो गया था।
"टिंकू," मैंने कहा। "अखाड़े की तरफ़ चल।"
हम भागे।
चबूतरे से अखाड़े तक का रास्ता छोटा था, पर उस दिन वो लंबा लग रहा था। हम नीम के पेड़ से गुज़रे, गली से मुड़े, और अखाड़े के पीछे वाली दीवार के पास पहुँचे।
वहाँ जो देखा, वो मेरे पैरों के नीचे से ज़मीन खींच ले गया।
कुएँ के ढक्कन के चारों तरफ़ लाल मिट्टी फैली थी, और उस मिट्टी से धुआँ उठ रहा था। पतला, काला धुआँ। जैसे किसी ने मिट्टी के नीचे आग जलाई हो।
और कुएँ के ढक्कन पर, लाल मिट्टी से लिखा था — "सच बोल दिया। अब कीमत चुका।"
मीरा पीछे से आई। उसने वो लिखा हुआ देखा और उसका हाथ मेरी कलाई पर आ गया।
"वीर," उसने धीरे से कहा। "ये तो… ये तो अभी लिखा गया है।"
मैंने झुककर मिट्टी को छुआ। वो गरम थी। और उस गरमी के नीचे, एक और गंध थी — वही गंध जो भैरव की पोटली से आती थी। सूखी हल्दी, काली मिर्च, और लाल धागा।
मैंने टिंकू की तरफ़ देखा।
"भैरव गया," मैंने कहा। "माधव गया। फिर ये कौन कर रहा है?"
टिंकू ने अपनी टोपी उतारी और माथे पर हाथ रखा।
"वीर," उसने कहा, "एक बात कहूँ?"
"कह।"
"अगर भैरव और माधव दोनों जेल में हैं, तो जो बोतलें वो आदमी ले जा रहा था — वो किसकी थीं? भैरव ने कहा कि उसे पता नहीं। पर उसके चेहरे पर हार थी। वो झूठ बोल रहा था।"
मैंने टिंकू को देखा।
"मतलब?"
"मतलब," टिंकू ने कहा, "भैरव के पीछे कोई और भी था। कोई ऐसा, जिसे भैरव के जाने के बाद भी ज़हर बाँटना है।"
कुएँ से धुआँ उठता रहा।
और मेरी नाक में गंध आती रही — तेज़, कड़वी, और अब कुछ और मिली हुई। किसी और की गंध।
मैंने अपनी आँखें बंद कीं और गहरी साँस ली। गंध की परतें खुलने लगीं। पहले मिट्टी की गरमी। फिर जला काग़ज़। फिर पीला पानी। और फिर, सबसे नीचे, हल्की-सी, एक और गंध — ताज़ी स्याही की।
मैंने आँखें खोलीं।
"मीरा," मैंने कहा। "जो काग़ज़ तूने जेब से निकाला था — वो तूने कहाँ रखा है?"
उसने अपनी जेब टटोली। फिर दूसरी। फिर बैग।
उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
"वो… वो मेरी जेब में था," उसने कहा। "अभी चबूतरे पर।"
"अभी तो निकाला था," टिंकू ने कहा।
"हाँ," मीरा ने कहा। "और फिर मैंने उसे वापस जेब में रखा।"
वो फिर टटोलने लगी। पर काग़ज़ नहीं था।
तीनों ने एक-दूसरे को देखा।
और तभी, अखाड़े की दीवार के पीछे से, किसी के हँसने की आवाज़ आई। बहुत धीमी, बहुत हल्की। पर साफ़।
वो हँसी जानी-पहचानी थी। और मैंने उसे पहचानने की कोशिश की, पर पहचान नहीं पाया।
मैं दीवार की तरफ़ भागा।
दीवार के पीछे कोई नहीं था। बस ज़मीन पर एक लाल धागा पड़ा था, और उसके पास एक छोटी सी पीली शीशी — खाली।
मैंने वो शीशी उठाई।
अंदर से गंध आई। और इस बार मुझे साफ़ पता चल गया कि इसमें क्या था। यही वो पानी था, जो भैरव बनाता था। पर इस बार इसमें एक नई गंध मिली हुई थी — कुछ मीठा, कुछ पहचाना हुआ।
मिठाई की गंध।
मैं पलटा और टिंकू को देखा।
टिंकू मेरी तरफ़ देख रहा था, और उसका चेहरा पहली बार बिना मुस्कान था।
"वीर," उसने धीरे से कहा, "ये मेरी मिठाई की गंध है।"
और उसकी आवाज़ में डर था।
॥
टिंकू के मुँह से "ये मेरी मिठाई की गंध है" सुनकर मेरे अंदर कुछ ठंडा सा उतर गया। मैंने वो खाली शीशी अपनी हथेली पर रखी और फिर से सूँघा। हाँ, उसमें मिठाई की गंध थी — घी की, और उसके नीचे हल्की सी केसर की। टिंकू की खीर वाली गंध। पर उसमें एक और चीज़ मिली हुई थी, जो टिंकू की रसोई में कभी नहीं होती।
"टिंकू," मैंने कहा, "तूने आज सुबह से अब तक कितनी खीर बनाई?"
"एक हाँडी," उसने कहा। "वही जो मैंने माँ को दी थी। पर…"
"पर क्या?"
"पर वो हाँडी मैंने ढक्कर रखी थी। और जब मैं सुरंग में जाने लगा, तो ढक्कन खुला था। मैंने सोचा माँ ने निकाल ली होगी।"
मीरा ने शीशी मेरे हाथ से ली और उसे उलटकर देखा।
"अंदर कुछ चिपका है," उसने कहा। "तली में।"
उसने अपनी कुर्ते की आस्तीन से उँगली बनाकर शीशी के अंदर झाँका, और फिर उसे मेरी हथेली पर खाली किया। एक छोटा सा टुकड़ा गिरा — जला हुआ काग़ज़, जितना नाखून से बड़ा होता है। उस पर कुछ लिखा था, आधा जल चुका था, पर जो बचा था, वो पढ़ा जा सकता था।
मैंने उसे आँखों के पास उठाया।
"रा… म…"
"रामदीन?" मीरा ने पूछा।
"नहीं," मैंने कहा। "रा… रघु… नहीं, ये नाम नहीं है। ये कुछ और है।"
टिंकू ने झुककर देखा। उसकी टोपी का छज्जा मेरे माथे से टकरा गया।
"भाई, ये तो… ये तो मेरे दुकान के काग़ज़ जैसा है। जो मैं हिसाब लिखने के लिए रखता हूँ। पीला, मोटा।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। और मेरे पेट में एक झटका लगा।
"तेरी दुकान के काग़ज़?" मैंने कहा। "टिंकू, तेरी दुकान में कौन आया आज?"
टिंकू ने माथा खुजाया। "सुबह सुक्खी बुआ आई थी, चाशनी माँगने। फिर बसंता का बाप आया, उसने दो लड्डू लिए और पैसे कल देने को कहकर चला गया। फिर…"
वो रुक गया।
"फिर क्या?"
"फिर वो आदमी आया," उसने धीरे से कहा। "जो बोतलें लेकर भाग रहा था। वो मेरी दुकान के सामने से गुज़रा था, और मैंने उसे पकड़ने के लिए दौड़ लगाई थी। पर…"
"पर?"
"पर जब मैं लौटा, तो दुकान का दरवाज़ा खुला था। और मेरी आवाज़ में बासी खीर की गंध आ रही थी। मैंने सोचा हवा से गई होगी।"
मीरा ने काग़ज़ का जला टुकड़ा मेरे हाथ से लिया और उसे धूप में उठाया।
"वीर," उसने कहा। "ये काग़ज़ दुकान का है, ये साफ़ है। पर जो इसे शीशी में डालकर जलाया गया, वो कोई चालाक आदमी है। उसने चाहा कि हमें सिर्फ़ इतना मिले कि हम टिंकू पर शक करें।"
टिंकू का मुँह खुला रह गया।
"मुझ पर?"
"तुझ पर नहीं," मैंने कहा। "हमें आपस में लड़ाने के लिए। कोई चाहता है कि हम अंदर ही अंदर लड़ें, और वो बाहर अपना काम करता रहे।"
मैंने पलटकर अखाड़े के मैदान की तरफ़ देखा। वहाँ भीड़ अभी भी खड़ी थी। भैरव दो आदमियों के बीच खड़ा था, हाथ बँधे हुए, और उसका सिर झुका हुआ था। माधव सिंह एक पुलिस वाले के पास खड़े थे, और उनका चेहरा पत्थर जैसा सपाट था।
"मैं वापस जा रहा हूँ," मैंने कहा। "ये सच अधूरा है। और अधूरा सच सबसे ख़तरनाक होता है।"
हम तीनों दौड़कर मैदान में लौटे। भीड़ ने हमें देखा और रास्ता देने लगी। औरतें अभी भी अपने बेटों की बातें कर रही थीं। एक बूढ़ी माँ अपनी गोद में एक फटी कॉपी पकड़े बैठी थी, जिसमें उसके बेटे के आख़िरी दिनों की बातें लिखी थीं।
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