Spirit of a Fighter – Chapter 462
मैंने उसे पहले कभी नहीं देखा था।
पर जब उसने बोला, तो कालू काका के हाथ से लालटेन छूट गई और वो ज़मीन पर गिर गई।
क्योंकि उसकी आवाज़।
वो आवाज़ मैंने कहीं सुनी थी।
"काका," टिंकू ने काँपते हुए कहा, "ये आवाज़ तो…"
कालू काका ने अपना मुँह हाथ से ढक लिया।
और उस अंधेरे में, उस अजनबी ने अपना ब्रश नीचे रखा और धीरे से कहा — "बीस साल हो गए, कालू। तू अभी भी मुझे पहचानता है।"
कालू काका की आँखों से पानी आ गया।
"जगदीश," उन्होंने फुसफुसाया।
॥
"जगदीश," कालू काका ने फुसफुसाया।
और वो नाम सुनकर मेरे हाथ ठंडे पड़ गए। जगदीश। यही नाम मुंशीजी ने लिया था। यही नाम डायरी में लिखा था। मेरे पापा का नाम।
टिंकू ने मेरी कलाई पकड़ ली। उसकी पकड़ कस रही थी, जैसे कहीं गिरने से बचा रहा हो।
"भाई," उसने धीरे से कहा, "ये… ये वही हैं ना?"
मैंने जवाब नहीं दिया। मेरी नाक भरी हुई थी, पर इस बार गंध से नहीं — आँसुओं से, जो अंदर ही अंदर कहीं अटक गए थे।
वो आदमी अपनी जगह से हिला। उसकी धोती पर गीली मिट्टी लिपटी थी, हाथों पर लाल रंग सूखा हुआ था। वो मेरी तरफ़ आया, और मैं पीछे हट गया। अपने आप से नहीं, डर से नहीं, बस… पता नहीं। ऐसा लगा जैसे ज़मीन अपनी जगह से खिसक रही है।
वो रुक गया।
"तू डर गया," उसने कहा। आवाज़ धीमी थी, फटी हुई, जैसे बहुत दिनों से किसी ने उससे बात न की हो। "डर जाना सही है। मैं भी तेरी जगह होता तो डरता।"
कालू काका ने अपना मुँह हाथ से हटाया। उनके गाल गीले थे।
"तू ज़िंदा है," वो बोले। "मैंने सोचा… मैंने बीस साल सोचा तू मर गया।"
"मरता तो कैसे?" उसने कहा। "जिसे तूने अपने हाथ से मिट्टी में गाड़ा, कालू? तूने मुझे बचाया। तू भूल गया?"
कालू काका की टाँगें काँपने लगीं। मैंने उन्हें पकड़ लिया, वरना वो गिर पड़ते।
"मैं भूल कैसे सकता हूँ," कालू काका ने रोते हुए कहा। "मैंने तुझे उस रात खींचकर निकाला था। तेरे मुँह से झाग आ रहा था। मैंने सोचा तू मर गया। मैंने तुझे यहीं छुपा दिया, और भैरव को बताया कि कुएँ में गिर गया।"
"तूने मुझे बचाया," वो आदमी दोहराया, और इस बार उसकी आवाज़ में थोड़ी गर्मी आई। "और मैंने तुझे बीस साल इस तहखाने के दरवाज़े के पीछे छुपने पर मजबूर कर दिया।"
टिंकू ने आगे कदम रखा।
"पर आप यहाँ… आप बाहर क्यों नहीं आए?"
वो आदमी मुस्कुराया। वो मुस्कान मुझे पहचानी लगी — कहाँ देखी थी? फिर याद आया। अपनी परछाई में। जब मैं सुबह आईने के सामने खड़ा होता था, तो मेरे होंठ भी ऐसे ही हिलते थे।
"मैं बाहर आता," उसने कहा, "तो भैरव मुझे पहचान लेता। और फिर यहाँ जो कुछ है, यहाँ का एक-एक काग़ज़, एक-एक बोतल, रघुवीर की एक-एक लिखाई — सब जल जाता। इसलिए मैं मरा रहा। मुंशीजी मरा हुआ था, और मैं अंदर से ज़िंदा।"
"आप मुंशीजी हैं?" टिंकू की आवाज़ फट गई। "वो मुंशीजी जो मेरे पास आते थे? जो मुझे चाबी देकर गए थे?"
वो आदमी उसकी तरफ़ देखने लगा। मोटे चश्मे के बिना उसकी आँखें बड़ी दिख रही थीं।
"तू टिंकू है," उसने कहा। "तू बड़ा हो गया। मैं तुझे तब देखता था जब तू इस अखाड़े की मिट्टी में लोटता था, बच्चा था, नाक बहती रहती थी।"
टिंकू का गला भर आया। वो कुछ बोल नहीं पाया, बस सिर हिलाया।
मैंने अपनी आवाज़ ढूँढी। वो कहीं दूर गई हुई थी।
"आप मेरे पापा हैं?"
सवाल बाहर आया, और साथ में वो सारी हवा भी चली गई जो मेरे सीने में थी।
वो आदमी मेरे पास आया। इस बार मैं पीछे नहीं हटा।
"नहीं," उसने कहा।
मेरे पैरों तले ज़मीन फिर खिसकी।
"मैं तेरा पापा नहीं हूँ, वीर। मैं तेरे पापा का… मैं तेरे पापा के साथ मिट्टी में सोया हूँ। मैं वो हूँ जिसने उनकी लिखाई पढ़ी, उनका ज़हर बनाया, और उनकी मौत के बाद यहाँ छुपकर बैठा रहा।"
वो मेरे सामने झुका। उसके घुटने गीली मिट्टी में धँसे।
"तेरे पापा जगदीश ये उस वक़्त बने थे जब उन्होंने अखाड़े छोड़ा। असली जगदीश वो थे जो रघुवीर के साथ खड़े थे। और मैं… मैं उनका दोस्त था। रामदीन।"
रामदीन। वो नाम मेरे कानों में घूम गया। कुएँ में बंद आदमी। कालू काका ने बताया था — रामदीन, जो रघुवीर का दोस्त था, जिसने भैरव को ज़हर बनाना सिखाया, और फिर मना किया तो भैरव ने उसे कुएँ में बंद कर दिया।
पर वो तो कुएँ में था। वो तो… मैंने उसे खुद बाहर निकाला था। बीस दिन पहले।
"आप कुएँ में थे," मैंने कहा। "आपको मैंने खुद बाहर निकाला था। आप मेरे सामने खड़े थे। आपने मुझे बताया था—"
"मैंने तुझे बहुत कुछ बताया था," रामदीन ने कहा। "पर सब नहीं। क्योंकि उस वक़्त भैरव के आदमी ऊपर थे। अगर मैं सब बोल देता, तो वो तुझे भी खत्म कर देते।"
"तो अब?" मेरी आवाज़ कड़की। "अब क्या बदला?"
"अब भैरव पकड़ा गया है," रामदीन ने कहा। "अब माधव सिंह की बंदूक ज़मीन पर पड़ी है। अब… अब मैं बोल सकता हूँ।"
कालू काका ने मेरा कंधा पकड़ा।
"वीर, बेटा, सुन ले। ये जो तूने कहा कि तेरे पापा ज़िंदा हैं — माँ ने कहा था, याद है? वो सच था। पर सच ये है कि तेरे पापा … तेरे पापा रघुवीर के साथ जो हुआ, वो इसी आदमी की आँखों के सामने हुआ। और ये बीस साल इसीलिए छुपा रहा कि एक दिन सच बोल सके।"
मैंने रामदीन को देखा। उसकी आँखों में वो चीज़ थी जो मैंने अपनी माँ की आँखों में देखी थी — बीस साल का बोझ, जो अब उतरने को तैयार था।
"मैं सब बताऊँगा," रामदीन ने कहा। "कल सुबह, चबूतरे पर, पूरे गाँव के सामने। जैसे रणवीर सिंह ने कहा था। मैं आऊँगा। और बोलूँगा।"
"पर अभी—" मैंने कहा।
"अभी," रामदीन ने कहा, "तू अपनी माँ के पास जा। वो अकेली नहीं है, पर वो तेरी राह देख रही होगी। और कल सुबह ऐसी लड़ाई होगी जिसमें मिट्टी से ज़्यादा ज़रूरी सच होगा।"
मैंने उसे देखा। मैंने सोचा कि अभी, इसी वक़्त, मुझे उससे हज़ार सवाल पूछने चाहिए। पर सवाल मुँह तक आकर रुक गए। क्योंकि उसकी आँखों में वो थकान थी जो सिर्फ़ सच बोलने से उतरती है।
"अभी एक बात," मैंने कहा। "पापा की कब्र के नीचे कुछ है?"
रामदीन की आँखें चौड़ी हुईं।
"किसने कहा?"
"भैरव ने। रणवीर सिंह के सामने।"
रामदीन ने धीरे से साँस ली।
"हाँ," उसने कहा। "उस कब्र के नीचे रघुवीर की लिखी एक कॉपी है। पूरा हिसाब — कौन-कौन मरा, कब मरा, किसने ज़हर दिया। माधव सिंह के दस्तखत वाले काग़ज़। भैरव ने उसे जलाने की कोशिश की थी, पर मैंने कॉपी पहले निकालकर रख ली थी। उसे मैंने खुद गाड़ा था।"
कालू काका ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में वो चमक थी जो तब आती है जब कोई रास्ता अचानक खुलता है।
"तो कल सुबह," कालू काका ने कहा, "पहले कब्र, फिर पंचायत।"
"नहीं," रामदीन ने कहा। "पहले पंचायत। अगर हम कब्र खोदते पकड़े गए, तो सब बेकार। सच पहले बोलो, बाद में कब्र।"
हम बाहर निकले। सुरंग का रास्ता उस रात जैसे लंबा लगा। टिंकू मेरे आगे चल रहा था, लालटेन हिला रहा था। कालू काका मेरे पीछे थे, और उनके पीछे रामदीन, जो बीस साल बाद दुनिया की हवा पहली बार भर रहा था।
जब वो नीम के पेड़ के पास वाली सुरंग से बाहर निकला, तो उसने आँखें बंद कर लीं।
"मिट्टी," उसने धीरे से कहा। "इतनी मिट्टी।"
उसकी आवाज़ काँप रही थी।
"बीस साल मैंने सिर्फ़ लाल मिट्टी सूँघी," उसने कहा। "अब हरी घास।"
टिंकू ने अपनी टोपी उतार दी। और फिर, बिना कुछ बोले, उसने वो टोपी रामदीन के सिर पर रख दी।
"ठंड लगेगी," टिंकू ने कहा।
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno