Spirit of a Fighter – Chapter 458
अंगूठी ज़मीन पर पड़ी थी, और कोई उसे उठाने को नहीं बढ़ रहा था। जैसे सबको लग रहा हो कि छूने से कोई सच और खुल जाएगा।
भैरव की बात हवा में लटकी रह गई। "कब्र के नीचे।" मेरे कानों में वो शब्द गूँज रहे थे, पर मेरा दिमाग़ कहीं और था।
क्योंकि भैरव जब बोल रहा था, तब मुझे एक गंध आई थी।
बहुत हल्की। मिट्टी की गंध — पर वैसी नहीं जैसी अखाड़े की लाल मिट्टी से आती है। ये गंध ठंडी थी, भीगी थी, जैसे बरसात के बाद किसी पुराने कुएँ से उठती हो। और उसमें कुछ मिला हुआ था — जली हुई लकड़ी जैसा, पर मीठा।
मैंने धीरे से अपनी नाक भीतर खींची।
गंध तहखाने के उस कोने से आ रही थी जहाँ कालू काका खड़े थे।
"कालू काका," मैंने कहा।
वो मेरी तरफ़ देखने लगे। उनके हाथ में काग़ज़ों का बंडल था, पर उनकी उँगलियाँ उसे दबाए हुए थीं, जैसे किसी ने उन्हें पकड़ रखा हो।
"आप यहाँ कब से खड़े हैं?"
"मैं तो शुरू से हूँ, बेटा," उन्होंने कहा। पर उनकी आवाज़ में वो बात नहीं थी जो उनके शब्दों में थी। "जब से तू आया।"
मैंने उनके हाथों की तरफ़ देखा। उनकी उँगलियाँ काँप रही थीं।
"वो गंध," मैंने कहा। "ये काग़ज़ों से नहीं आ रही। ये आपके कपड़ों से आ रही है।"
कालू काका ने एक कदम पीछे रखा।
इंस्पेक्टर ने माधव सिंह की तरफ़ बढ़कर हथकड़ी बढ़ाई। माधव सिंह ने अपनी कलाई आगे की, पर उनकी आँखें कालू काका पर थीं। और उस नज़र में वो चीज़ थी जो मैंने किसी इंसान की आँखों में पहले कभी नहीं देखी — एक लंबी, थकी, बीस साल पुरानी चेतावनी।
कालू काका ने नज़र चुराई।
मेरे पेट में एक ठंडी गोली घूम गई।
"इंस्पेक्टर साहब," मैंने कहा। "एक मिनट रुकिए।"
इंस्पेक्टर रुक गए।
"मुझे इनसे पहले कुछ पूछना है।"
मैं कालू काका के सामने जाकर खड़ा हुआ। उनकी आँखें मेरी छाती पर थीं, चेहरे पर नहीं।
"कालू काका," मैंने धीरे से कहा। "आपने मुझे पहली बार मिट्टी दी थी। याद है? कहा था — जो इसमें पसीना डालता है, वो इसे पहचानता है।"
उन्होंने सिर हिलाया।
"आपने ये भी कहा था कि आपने भैरव को तहखाने में जाते देखा था। पर आपने ये नहीं बताया कि आप उस रात यहाँ क्या कर रहे थे।"
कालू काका की साँस रुकी।
अखाड़े के बाहर हवा चली। दूर कहीं कोई कुत्ता भौंका, और वो आवाज़ मुझे बहुत दूर से आती लगी, जैसे मैं सबसे अलग खड़ा हूँ।
"मैं," कालू काका ने कहा, और उनकी आवाज़ फँस गई। "मैं मिट्टी सींचने आया था।"
"रात के तीन बजे?"
"मैं रोज़ उस वक़्त आता था। जब कोई नहीं होता। मुझे अकेले में मिट्टी से बात करना अच्छा लगता था।"
वो पहली बार मेरी आँखों में देखने लगे। उनकी आँखों में पानी था, पर वो गिर नहीं रहा था — बस किनारे तक आकर रुक जाता था, जैसे उन्होंने उसे बहुत साल पहले रोकना सीख लिया हो।
"और उस रात," मैंने कहा, "आपने देखा कि भैरव इस तहखाने में जा रहा है।"
"हाँ।"
"और फिर?"
कालू काका ने अपनी जीभ से होंठ गीले किए। माधव सिंह ने कुछ कहना चाहा, पर इंस्पेक्टर ने उन्हें रोक दिया।
"और फिर," कालू काका ने कहा, "मैं उसके पीछे गया।"
गाँव की तरफ़ से आ रहे लोगों की भीड़ में हल्की सी सरसराहट हुई।
"मैं कुएँ की सीढ़ियों से नीचे उतरा," कालू काका ने कहा। "मुझे डर था। पर मैं रुका नहीं। मैंने जब ये तहखाना पहली बार देखा था, तब मैं जवान था। तब यहाँ की मिट्टी में सिर्फ़ गंध थी। कुछ मिलाया हुआ नहीं था। सिर्फ़ मिट्टी।"
उन्होंने अपनी आँखें बंद कर लीं।
"पर उस रात — उस रात मैंने देखा कि वो मिट्टी में हाथ डालकर बैठा था। और उसके सामने एक मटका था। और वो उस मटके में मिट्टी डाल रहा था, फिर पानी, फिर कुछ और। उसके हाथ काँप रहे थे। वो बोल रहा था, पर मुझे कुछ समझ नहीं आया। जैसे वो किसी से बात कर रहा हो जो वहाँ नहीं था।"
मेरी छाती में कुछ हिला।
"कितना बड़ा था वो?" मैंने पूछा।
"क्या?"
"उस वक़्त भैरव कितने साल का था?"
कालू काका ने गिना। उनके होंठ हिल रहे थे, पर आवाज़ नहीं आ रही थी।
"पंद्रह, सोलह," उन्होंने कहा। "बच्चा था। पर उसकी आँखें — उसकी आँखें बड़ी आदमी की थीं।"
मेरे सीने में कुछ जम गया।
पंद्रह साल का लड़का। माधव सिंह ने उसे उस रात यहाँ भेजा था। एक बच्चे को ज़हर बनाने के लिए।
मैंने मुड़कर माधव सिंह की तरफ़ देखा। उनका चेहरा पत्थर जैसा था। कोई पछतावा नहीं, कोई डर नहीं। बस वो ठंडी, सपाट, बाँझ नज़र जो मुझे हमेशा से उनकी आँखों में दिखती थी।
"आपने पंद्रह साल के लड़के को यहाँ भेजा?" मैंने कहा। मेरी आवाज़ धीमी थी, पर उसमें वो चीज़ थी जो कभी-कभी मेरे अंदर टूटती है। "आपने उसे ज़हर बनाना सिखाया?"
माधव सिंह ने मेरी तरफ़ देखा।
"उसने खुद सीखा," उन्होंने कहा। "मैंने सिर्फ़ उसे बताया कि अगर वो अपने बाप की क़ीमत चुकाना चाहता है, तो यहीं से शुरुआत करे। वो यहाँ आया। वो मिट्टी से खेला। और जब वो वापस गया, उसके हाथ में वो मटका था जिसे उसने खुद बनाया था।"
मेरे पैरों तले ज़मीन खिसकी।
"उसने खुद बनाया," मैंने दोहराया।
"हाँ।"
"तो आपने सिर्फ़ दरवाज़ा खोला?"
माधव सिंह ने कुछ नहीं कहा। पर उनकी चुप्पी भी वैसी ही थी जैसी भैरव की थी — भरी हुई, भारी।
कालू काका ने धीरे से मेरा हाथ पकड़ा।
"बेटा," उन्होंने कहा। "जो मैंने तुझे अब तक नहीं बताया, वो ये है।"
उनकी आवाज़ ऐसी थी जैसे कोई बीस साल से किसी कमरे में बंद हो और पहली बार दरवाज़ा खोल रहा हो।
"वो मटका जो उसने बनाया था — मैंने उसे फेंका नहीं। मैंने उसे उठाया। और उसे उसी जगह रख दिया जहाँ से वो मिट्टी उठाता था।"
मैंने उनकी तरफ़ देखा।
"मैंने सोचा," उन्होंने कहा, "कि अगर मैं उसे उठाकर बाहर फेंक दूँगा, तो वो मिट्टी अपने आप ठीक हो जाएगी। मैं मूर्ख था। मिट्टी को ज़हर नहीं फैलता। ज़हर दिमाग़ में फैलता है।"
मेरा गला सूखा।
"और फिर?" मैंने कहा।
"और फिर," कालू काका ने कहा, "अगली सुबह वो मटका वहीं से गायब था। और अगले हफ़्ते भैरव ने पहली बार अखाड़े में पहलवानों को पीने का पानी दिया।"
मैंने अपनी आँखें बंद कर लीं।
पूरी कहानी एक ही लाइन में समा गई। एक मटका। एक रात। और उसके बाद — बीस साल।
"आपने उस रात बाद में किसी को नहीं बताया?" मैंने पूछा।
"किसे बताता?" कालू काका ने कहा, और उनकी आवाज़ पहली बार चढ़ी। "मैं मज़दूर हूँ, बेटा। मेरे पास ज़मीन नहीं, पैसा नहीं, गवाही नहीं। मैंने रणवीर सिंह को बताना चाहा। पर जब मैं उनके पास पहुँचा, उस दिन उन्हें पहला दौरा पड़ा था। वो बोल भी नहीं पा रहे थे। उनकी आँखों से पानी बह रहा था, पर मुँह से आवाज़ नहीं आ रही थी। मैं उनके पैरों पर गिर पड़ा था। मैंने कहा — सर, मैं जानता हूँ। पर उन्होंने सिर्फ़ मेरा हाथ पकड़ा और अपने सीने पर रख दिया। जैसे कह रहे हों — रुक जा। अभी नहीं।"
कालू काका की आँखों से पहला आँसू गिरा। वो अपनी झुर्रीदार हथेली से उसे पोंछने लगे, पर वो रुका नहीं।
"मैं रुक गया," उन्होंने कहा। "और वो रुकना बीस साल का हो गया।"
मैं चुप खड़ा रहा।
कुछ देर किसी ने कुछ नहीं कहा। गाँव के लोग भी चुप थे। हवा भी।
"हर साल," कालू काका ने कहा, और अब उनकी आवाज़ टूट रही थी, "जब कोई पहलवान बीमार पड़ता, जब कोई मरता, मैं उसकी अर्थी के पीछे चलता। और मुझे लगता कि मुझे भी उस अर्थी में लेटना चाहिए था। मैं उन सबका क़त्ल करने वाला था, बेटा। मैंने जानते हुए भी कुछ नहीं किया।"
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