Spirit of a Fighter – Chapter 455
मैं चुप हो गया।
तभी नहर के पार से आवाज़ आई।
"हटो सब! रास्ता छोड़ो!"
मैं पलटा।
और मेरी साँस रुक गई।
नहर के पार वाले पुल की तरफ़ से एक व्हीलचेयर आ रही थी। पर व्हीलचेयर पर कोई नहीं बैठा था। व्हीलचेयर को टिंकू और गुड़िया धकेल रहे थे।
और उसके आगे, पुल पर, सहारे से चलते हुए — रणवीर सिंह।
उनके हाथ में एक लाठी थी। उनके पैर काँप रहे थे, हर कदम पर उनका शरीर एक तरफ़ झुकता था, और उनका चेहरा पसीने से भीगा था। पर वो चल रहे थे।
सच में चल रहे थे।
गाँव के लोगों में से कोई बोला। "बाबा! वो चल रहे हैं!"
रणवीर सिंह पुल से उतरे। दस कदम। बीस कदम। उनकी साँस ऐसी चल रही थी जैसे कोई पुरानी मशीन चल रही हो, फिर भी रुक रही हो। पर उन्होंने अपनी आँखें भैरव पर जमा रखी थीं।
और उनके हाथ में वो चाँदी की अंगूठी थी — जो मुझे चबूतरे के नीचे से मिली थी, जिसे दिखाकर मैंने भैरव की अँगूठी वाली उँगली पहचानी थी।
मैं दौड़कर उनके पास गया। टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा — उसके चेहरे पर मुस्कान और डर एक साथ थे।
"काका, ये आपने क्या किया?" मैंने कहा, रणवीर सिंह का हाथ थामते हुए। "आपको उठना नहीं था।"
"मुझे उठना था," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ फूटी हुई थी, पर उसमें वो गरज बची थी जो बीस साल व्हीलचेयर पर बैठे रहने से भी नहीं गई थी। "आज मेरी मिट्टी से ज़हर निकला है। मैं इसे बैठकर नहीं देख सकता।"
वो भैरव की तरफ़ बढ़े। भीमू और उसके आदमी उन्हें देखकर थोड़ा हट गए — जैसे कोई पुराना पहलवान जब उठता है, तो मैदान अपने आप जगह दे देता है।
भैरव घास पर पड़ा था, हाथ पीछे बंधे। उसने ऊपर देखा। और उसके चेहरे पर पहली बार कुछ ऐसा आया जो मैंने कभी नहीं देखा था।
डर नहीं। कुछ और।
पहचान।
जैसे कोई चेहरा बीस साल बाद देखा हो, और वो चेहरा उसने खुद बनाया हो।
"रणवीर," भैरव ने धीरे से कहा।
रणवीर सिंह ने उसकी तरफ़ देखा। उन्होंने अपनी लाठी ज़मीन पर टिकाई, अपना पूरा वज़न उस पर डाला, और फिर वो बोले — इतनी धीमी आवाज़ में कि पूरा नहर किनारा चुप हो गया।
"भैरव, या जो भी तेरा असली नाम है," उन्होंने कहा। "अब तेरा वक़्त ख़त्म।"
भैरव ने उन्हें देखा, और फिर उसकी नज़र उनके हाथ में गई — उस चाँदी की अंगूठी पर।
और उसका चेहरा बदल गया।
"वो अंगूठी…" भैरव ने धीरे से कहा। "वो मेरी माँ की थी।"
मेरे पेट में एक झटका लगा।
रणवीर सिंह ने अंगूठी को अपनी हथेली में घुमाया। उन्होंने एक पल भैरव को देखा, फिर गाँव के लोगों को, फिर माँ को।
और फिर वो बोले, इतने धीरे कि सिर्फ़ मैं, भैरव, और शायद मीरा ही सुन सकी।
"ये अंगूठी शेर सिंह की नहीं थी, मोहन।" उन्होंने भैरव के असली नाम से उसे पुकारा — और वो नाम हवा में ऐसे लटका जैसे कोई लटकता हुआ पुल। "ये तेरी माँ की थी। और तेरी माँ को मैंने मारा नहीं। जिसने मारा, वो आज पूरे गाँव के सामने खड़ा है।"
भैरव की आँखें फैल गईं।
और मैंने सुना — अपनी ही साँसें रुक गईं।
मैंने माँ की तरफ़ देखा।
माँ की आँखें बंद थीं। उनके होंठ हिल रहे थे, जैसे कोई बहुत पुरानी दुआ पढ़ रही हों।
और तभी मुझे एहसास हुआ — जो सच माँ मुझे बताने वाली थी, वो सिर्फ़ उनका सच नहीं था।
वो मेरे पापा का सच था।
वो रणवीर सिंह का सच था।
और शायद — वो सच भैरव की माँ का भी था।
मैंने रणवीर सिंह की तरफ़ देखा, और मेरी आवाज़ काँपी।
"काका… आप क्या कह रहे हैं?"
रणवीर सिंह ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में पानी था, पर वो रो नहीं रहे थे।
"बेटा," उन्होंने कहा, और उनका हाथ मेरे कंधे पर आया, भारी। "ये कहानी बीस साल लंबी है। और इसका आख़िरी पन्ना आज नहीं, कल खुलेगा। क्योंकि जो इस पन्ने पर लिखा है, उसे सुनकर ये पूरा गाँव नहीं सो पाएगा।"
उन्होंने अंगूठी मेरे हाथ में रख दी।
"आज हमने ज़हर को पकड़ लिया। कल हम उस हाथ को पकड़ेंगे जिसने ये ज़हर सबसे पहले बनाया था।"
और फिर उन्होंने भैरव की तरफ़ देखा, और उनकी आवाज़ में वो पुरानी गरज लौट आई।
"तैयार रह, मोहन। कल सुबह, इसी मिट्टी पर, तेरी माँ की कहानी सुनी जाएगी।"
भैरव ने कुछ कहना चाहा, पर उसके होंठ हिले और आवाज़ नहीं निकली। उसकी आँखों से एक आँसू निकला — धूल में गिरा, और गायब हो गया।
मैंने अंगूठी अपनी हथेली में दबाई। वो ठंडी थी। पर मेरे हाथ में आते ही गर्म होने लगी।
मैंने आसमान की तरफ़ देखा।
सूरज ऊपर आ चुका था, और नहर का पानी चमक रहा था। कहीं दूर, गाँव में, किसी के घर से चूल्हे का धुआँ उठ रहा था।
और मुझे पता था — आज रात सोने से पहले मुझे एक और सच सुनना है।
एक ऐसा सच, जो बीस साल से मेरे घर की दीवारों में दबा था।
॥
अंगूठी मेरी हथेली में थी, पर मुझे लग रहा था कि मेरे सीने में कोई पत्थर रख दिया है।
नहर का पानी चुप था। हवा भी रुक गई थी। और भैरव — हाथ पीछे बंधे, घुटनों के बल — रणवीर सिंह को ऐसे देख रहा था जैसे कोई बच्चा अपने पुराने घर की तस्वीर देख रहा हो।
रणवीर सिंह ने अपनी लाठी ज़मीन पर टिकाई। उनके हाथ काँप रहे थे, पर लाठी नहीं हिली। उन्होंने एक-एक कदम आगे बढ़ाया। धीरे। बहुत धीरे। जैसे कोई बीस साल की दूरी चल रहा हो।
"तू दूर ही रह," भैरव ने कहा। उसकी आवाज़ टूट रही थी। "तू मेरे पास मत आ।"
रणवीर सिंह रुके नहीं।
वो उसके सामने आकर खड़े हो गए। इतने पास कि भैरव को अपनी गर्दन ऊपर करनी पड़ी।
"बीस साल," रणवीर सिंह ने कहा। उनकी आवाज़ में वो गरज थी जो मैंने पहली बार सुनी थी — उस दिन, जब वो फाटक पर आए थे। "बीस साल मैं इस कुर्सी पर बैठा रहा। तू मेरे सामने खड़ा होकर मेरी बेटी को डराता रहा, मेरी मिट्टी में ज़हर घोलता रहा, और मैं — मैं एक शब्द नहीं बोल पाया।"
उन्होंने लाठी को ज़ोर से ज़मीन पर मारा। धूल उड़ी।
"आज मैं तेरे सामने खड़ा हूँ। मेरी कुर्सी पर नहीं, अपने पैरों पर। और ये — ये मेरी सबसे बड़ी जीत है।"
भैरव ने उनकी तरफ़ देखा। उसके होंठ हिले, पर आवाज़ नहीं निकली।
"तू सोचता है तू शेर सिंह का बेटा है," रणवीर सिंह ने कहा। "तू सोचता है तेरे बाप को मैंने मारा, इसलिए तू बीस साल से बदला ले रहा है।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। फिर माँ की तरफ़। फिर भीड़ की तरफ़।
"पर सच ये है, मोहन," उन्होंने कहा, "कि तेरा बाप शेर सिंह नहीं था।"
भैरव ने सिर ऊपर किया।
"तू माधव सिंह का बेटा है।"
भीड़ में सन्नाटा छा गया। ऐसा सन्नाटा जिसमें सिर्फ़ नहर का पानी सुनाई दे रहा था।
"शेर सिंह ने तुझे पाला," रणवीर सिंह ने कहा। "क्योंकि माधव सिंह ने तुझे उसके हाथ में दिया था। एक बच्चा — एक साल का — चुपचाप, रातों-रात। और शेर सिंह ने उसे अपना बेटा कहकर पाला। क्योंकि वो आदमी साफ़ दिल का था। उसे नहीं पता था कि ये बच्चा किसका है। उसे सिर्फ़ इतना पता था कि एक औरत मर गई और एक बच्चा बच गया।"
भैरव की आँखें फैल गईं।
"तू झूठ बोल रहा है," उसने कहा। पर उसकी आवाज़ में वो यकीन नहीं था। "तू झूठ बोल रहा है। मेरे बाप शेर सिंह थे। वो पहलवान थे। वो—"
"वो तेरे बाप थे," रणवीर सिंह ने कहा। "पालने वाले बाप। और वो कभी तुझे ये नहीं बताते, क्योंकि वो तुझसे प्यार करते थे। पर माधव सिंह ने तुझे ये बताया — कि मैंने शेर सिंह को मारा, कि मैं तेरे बाप का कातिल हूँ। और तू उस आग में जलता रहा। बीस साल।"
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