Spirit of a Fighter – Chapter 435
वो आदमी। वही आदमी।
“तो फिर साफ़ बात करते हैं,” भैरव ने कहा, और उसकी आवाज़ में अब वो डर नहीं था। अब वो लालच था। “मैं उसे मुकाबले में खत्म कर दूँगा। पर आपको कुछ करना पड़ेगा। उसकी माँ को कल ही अखाड़े की रसोई में बुला लेना। अब वो भी ज़्यादा जान गई है।”
मेरे पैरों के नीचे ज़मीन खिसक गई। मैंने अपना मुँह खोला, पर कालू काका ने मेरे मुँह पर हाथ रख दिया। उनके हाथ में सीलन की गंध थी, और पसीने की।
“कल ही?” माधव सिंह ने कहा।
“कल ही। परसों सुबह के मुकाबले से पहले। उसकी माँ उसका दिमाग़ है। अगर माँ अखाड़े में होगी, तो वो लड़का लड़ेगा कैसे? उसका दिल माँ के पास अटका रहेगा। और हमें बस उतनी ही देर चाहिए।”
ऊपर फिर चुप्पी। फिर माधव सिंह का पैर पीछे हटा, जैसे कोई सोचकर चल रहा हो। “ठीक है। रसोई में नहीं — मंदिर के पास वाला कमरा। उसकी माँ को बहाने से ले जाना… कहना, कोई पुरानी रस्म है। और सुन —”
“जी साहब।”
“उस लड़की को भी… मीरा को भी। वो रणवीर की बेटी है, और वो रणवीर से भी ज़्यादा खतरनाक निकली। उसे भी बुला लेना।”
मेरा सीना फटने लगा। मैंने अपनी मुट्ठी कस ली। कालू काका के हाथ मेरी कलाई पर और कसे।
“पर साहब,” भैरव ने कहा, “मीरा तो… मीरा की माँ भी उस दिन…”
“मोहन।” माधव सिंह की आवाज़ में अब एक और बात थी। वो बात जो सिर्फ़ उस आदमी की हो सकती थी जिसने अपने ही हाथों से खून किया हो। “मैं जब भी तेरी माँ की तस्वीर देखता हूँ, मुझे तेरे चेहरे पर वो ही पल देखना नहीं पड़ता। तू मेरा बेटा है, पर तू लालची है। और लालची आदमी को हर बात समझानी पड़ती है। मीरा का बहाना ये होगा — उसके पिता की दवा। उसे भी कमरे में बंद कर देंगे। और फिर कल शाम तक, वीर सिंह के पास न माँ बचेगी, न लड़की। वो लड़ेगा किसके लिए?”
मेरी आँखों के आगे अंधेरा छा गया। ये आदमी… ये आदमी मेरी माँ को बंदी बनाने की बात कर रहा था। मेरी माँ। जो सुबह चार बजे उठकर चक्की चलाती है। जिसके हाथ सूखे हैं, और आँखों में गजब की चमक है। जो कहती है — भैया, भूखे पेट की दुआ सीधी ऊपर जाती है।
मैंने अपना हाथ कालू काका से छुड़ाया और दीवार पर एक ईंट पकड़ ली। एक ही झटके में। मैं ऊपर जाने वाला था। मैं उस बूढ़े साँप को वहीं खत्म कर देने वाला था।
कालू काका ने मुझे पीछे खींचा। इतनी ज़ोर से कि मेरी पीठ फिर दीवार से लगी।
“नहीं,” उन्होंने मेरे कान में फुसफुसाया। “आज नहीं। आज हमें बाहर निकलकर सोचना है। अगर तू अभी गया, तो तेरी माँ को वो आज ही उठा ले जाएँगे। हमें सुनना था — सुन लिया। अब चल।”
ऊपर माधव सिंह का पैर सीढ़ियों की तरफ़ बढ़ा। मेरी साँस रुक गई।
“और हाँ, मोहन,” माधव सिंह ने कहा, जैसे जाते-जाते कोई आख़िरी बात याद आई हो। “कुएँ की सीढ़ियाँ तो तूने तुड़वा दीं। पर नीचे वाला रास्ता? वो तो जानता है।”
“वो रास्ता बंद है साहब। मैंने खुद देखा है।”
“देखने से कुछ नहीं होता। उसने सीढ़ियाँ तुड़वाई हैं, तो उसने रास्ता भी देखा होगा। जा और देख। अभी।”
पैरों की आहट आई। भारी। मेरी तरफ़। मैंने कालू काका की तरफ़ देखा। उनका चेहरा पत्थर जैसा था।
“छिपो,” उन्होंने फुसफुसाया। “मेरे पीछे।”
हम दोनों दीवार के उस कोने में दब गए जहाँ रोशनी नहीं पहुँचती थी। सीढ़ियों से रोशनी आई, फिर एक परछाई। भैरव। वो सीढ़ियाँ उतरा — एक-एक करके, धीरे। उसके हाथ में लालटेन थी और दूसरे हाथ में… एक लोहे की छड़। मेरा दिल धक-धक कर रहा था।
वो हमारे ठीक सामने से गुज़रा। इतना पास कि मैं उसके पसीने की गंध सूँघ सकता था — तेल, गुड़ और उसके पीछे वो कड़वाहट। वो रुका। उसने लालटेन ऊपर उठाई और चारों तरफ़ घुमाई। रोशनी मेरे चेहरे से एक इंच दूर से गुज़री।
मैंने अपनी आँखें बंद कर लीं।
“अंदर कोई नहीं,” उसने खुद से कहा, और आगे बढ़ गया। दरवाज़े की तरफ़।
हम रुके रहे। जब उसकी आहट दूर गई, तब कालू काका ने मेरा हाथ पकड़ा।
“अब,” उन्होंने कहा। “जल्दी।”
हम सीढ़ियों की तरफ़ भागे। मेरे पैर फिसल रहे थे। मेरे फेफड़े जल रहे थे। ऊपर पहुँचे तो कुएँ का ढक्कन खुला था और रात की ठंडी हवा मेरे चेहरे पर लगी। मैंने एक गहरी साँस ली।
“रुको,” कालू काका ने कहा। “उनकी आवाज़ कहाँ से आ रही है?”
हम रुके। सुना।
आवाज़ें अखाड़े के बाहर से आ रही थीं। गेट की तरफ़ से। और साथ में एक गाड़ी की आवाज़। घोड़ागाड़ी। माधव सिंह की गाड़ी।
“वो जा रहे हैं,” मैंने कहा।
“हाँ। पर कल वो लौटेंगे। और तब तक…” कालू काका ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में आँसू नहीं थे अब। “अब तेरे पास बस एक रात है।”
मैंने अपना सिर झुकाया और अपनी आँखें बंद कर लीं। मेरे अंदर सब कुछ ठंडा हो रहा था। मेरी माँ। मीरा। दोनों। कल। एक ही दिन।
“कालू काका,” मैंने कहा। “मेरे पास एक रात है। और मुझे क्या करना है, पता है?”
“क्या?”
“पहले माँ को बचाना है। फिर मीरा को। और फिर…”
“और फिर?”
मैंने अपनी आँखें खोलीं। मुझमें कुछ बदल गया था। मैंने महसूस किया — जैसे सीने में कोई पुराना ताला टूट गया हो।
“और फिर उस बूढ़े को बताना है कि रामपुर का मुखिया कौन है।”
कालू काका ने मेरी तरफ़ देखा। और मुझे लगा उनकी आँखों में वो चीज़ थी जो उन्होंने रघुवीर सिंह की आँखों में देखी थी। उन्होंने मेरा कंधा थामा।
“तेरे पापा भी यही बोले थे,” उन्होंने कहा। “उस रात। जब उन्होंने वो लाल बोतल छिपाई थी।”
मैंने एक लंबी साँस ली। रात की हवा में नमी थी। और कहीं दूर से मंदिर की घंटी की आवाज़ आ रही थी — जैसे कोई सुबह की तैयारी कर रहा हो।
“चलिए,” मैंने कहा। “पहले घर। माँ को बताना है।”
“और मीरा को?”
“उन्हें भी। पर उन्हें बताने से पहले, मुझे कुछ और करना है।”
“क्या?”
मैंने अपनी जेब में हाथ डाला और वो लाल बोतल निकाली। रात की रोशनी में वो गहरी, खून जैसी लग रही थी।
“ये,” मैंने कहा। “ये बोतल मेरे पास है। और भैरव को ये पता है। वो कल इसे ढूँढेगा। और जब वो ढूँढेगा, तब उसे उसी जगह मिलेगा जहाँ मैं चाहूँगा।”
कालू काका ने मेरी तरफ़ देखा। फिर उन्होंने धीरे से हँसा — पहली बार। वो हँसी सूखी थी, पर उसमें उम्मीद थी।
“तू रघुवीर का बेटा है,” उन्होंने कहा। “बिलकुल।”
हम अखाड़े के पीछे वाले रास्ते से बाहर निकले। मैंने पीछे मुड़कर देखा। अखाड़े की मिट्टी की दीवार रात में काली लग रही थी। और उसके ऊपर से आसमान में तारे दिख रहे थे। जैसे कोई ऊपर से सब देख रहा हो।
घर पहुँचा तो माँ आँगन में बैठी थीं। चूल्हा जल रहा था। उनके हाथ में रोटी बेलने वाला बेलन था, पर वो रुकी हुई थीं। मेरी आहट सुनकर उन्होंने सिर उठाया।
“तेरे चेहरे पर क्या है?” उन्होंने पूछा।
मैंने कुछ नहीं कहा। मैं उनके पास बैठ गया। मेरे हाथ काँप रहे थे। उन्होंने बेलन रखा और मेरा हाथ अपने हाथ में लिया।
“बोल,” उन्होंने कहा।
“माँ,” मैंने कहा। “कल तुम्हें मंदिर के पास वाले कमरे में बुलाएँगे। कोई पुरानी रस्म का बहाना बनाकर।”
उनके हाथ ने मेरा हाथ कस लिया।
“कौन बुलाएगा?”
“माधव सिंह।”
माँ की आँखों में कुछ बदला। बहुत धीरे। जैसे किसी पुराने ताले में चाबी घूमी हो।
“बीस साल बाद?” उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ में न डर था, न गुस्सा। सिर्फ़ थकान थी — बहुत पुरानी थकान। “बीस साल से वो मुझे देखकर आँख चुराता है। आज पहली बार बुला रहा है।”
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