Spirit of a Fighter428 / 1295

Spirit of a Fighter – Chapter 428

7 min read November 5, 2026

रणवीर सिंह का चेहरा पत्थर जैसा रहा। न कोई झटका, न कोई दहशत। जैसे वो इस जवाब को बीस साल से जेब में रखकर घूम रहे हों।

"मुझे पता था," उन्होंने धीरे से कहा।

मैंने उनकी तरफ़ देखा। मीरा ने सिर उठाया।

"क्या?"

"पहले महीने में ही पता चल गया था।" उनकी आवाज़ सूखी थी, जैसे कई साल पानी से सींची नहीं गई हो। "पहली बार जब पिया, तो जीभ जल गई। पिता जी ने कहा — ये नया नुस्खा है, कड़वा होता है, पर काम करता है। मैंने पिया। दूसरे दिन पैरों में झुनझुनी हुई। तीसरे दिन…" वो रुके।

"तीसरे दिन क्या?" मीरा ने पूछा।

"तीसरे दिन मैंने दूध ने पूरा गिलास पी लिया। और सब उल्टी कर दिया।" उन्होंने धीरे साँस ली। "उस दिन मैंने समझ लिया — ये दवा नहीं है। ये धीमा ज़हर है। जो हड्डियों को अंदर से खोखला करता है। जो आदमी को ज़िंदा रखता है, पर चलने नहीं देता।"

मीरा सन्न थी।

"तो आप जानते थे," वो फुसफुसाई, "और चुप रहे?"

रणवीर सिंह ने उसका सिर सहलाया। उनकी अँगुलियाँ उसके बालों में रुक गईं।

"मैं तुझे खोना नहीं चाहता था, बेटी।" उनका गला भर आया। "मैं जानता था — अगर मैंने एक दिन भी शोर मचाया, तो अगली सुबह तेरी लाश मिलती। मुझे चलने की शिकायत नहीं थी। मुझे बस तेरे हँसने की आवाज़ चाहिए थी। और तू हँसती थी। हर शाम मेरे कमरे में आकर। इसीलिए मैं चुप रहा। हर बार गिलास आधा पीकर उँडेल देता था, बगीचे की मिट्टी में। बीस साल। मिट्टी भी अब बंजर हो गई है।"

मीरा ने अपना मुँह उनके घुटनों पर रख दिया। और फिर वो रोई — नहीं, वो फूट-फूटकर रोई। बीस साल का दर्द, एक साथ, एक ही आवाज़ में।

रणवीर सिंह ने उसका सिर अपने हाथों में लिया।

"तू मेरी बेटा है," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ काँपी, पर आँखें सूखी थीं। "बेटी नहीं। बेटी तो वो होती है जो रोती है। तू तो लड़ती है। मैंने तुझे पाला इसीलिए, कि जिस दिन मैं जाऊँ, तू उस आदमी के मुँह पर उसी का थूक लगा दे।"

मैं दूर खड़ा देखता रहा। मेरी मुट्ठियाँ भिंची हुई थीं। कुछ ऐसा था उस आँगन में, उस जली हुई हवेली के बीच, जो मुझे अपने घर की याद दिला रहा था। मेरी माँ का अकेलापन। मेरे पिता की खामोशी। जो आदमी डर के मारे चुप रहता है, वो मरता नहीं। वो ज़िंदा रहकर मरता है।

मैंने आँखें फेर लीं।

तभी आँगन के फाटक से टिंकू दौड़ता हुआ आया। उसकी साँस फूली हुई थी, और उसके मुँह से आवाज़ ही नहीं निकल रही थी। उसने घुटनों पर हाथ रखा, झुककर दो बार साँस ली।

"भाई…" वो हाँफा। "हरनाम… हरनाम ठेकेदार की लाश मिली है।"

मैंने एक कदम आगे बढ़ाया।

"कहाँ?"

"नहर के किनारे। उसी पुल के नीचे, जहाँ बच्चे कागज़ के जहाज़ चलाते हैं।" टिंकू की आवाज़ रुँधी हुई थी। "उसके मुँह से झाग निकल रहा है, भाई। और उसके हाथ में कोई काग़ज़ दबा हुआ है।"

मैं मीरा की तरफ़ नहीं देख सका, न रणवीर सिंह की तरफ़। मैं सीधा दौड़ा। पचास कदम दौड़ा, फिर रुका, पलटा।

"मीरा!" मैंने चिल्लाया। "मेरे साथ।"

॥

मैं नहर की तरफ़ भागा, और मीरा मेरे पीछे-पीछे। रात का आख़िरी हिस्सा था, हवा में पानी की महक और काई की बू। पुल के नीचे टिंकू खड़ा था, एक हाथ मुँह पर रखे, जैसे खुद को रोक रहा हो।

हरनाम पानी के किनारे पड़ा था। उसका शरीर आधा कीचड़ में धँसा था, आधा सूखी ज़मीन पर। आँखें खुली थीं, ऊपर आसमान की तरफ़ देख रही थीं, जैसे आख़िरी वक़्त में उसने कुछ ढूँढा हो और न मिला हो।

मैं उसके पास बैठ गया। मेरे घुटने कीचड़ में लग गए। मैंने उसकी कलाई पकड़ी — ठंडी थी, पर पूरी जमी नहीं थी। ज़्यादा देर नहीं हुई थी।

"उसके मुँह से झाग आ रहा था," टिंकू ने धीरे से कहा। "जब मैंने देखा। अब नहीं आ रहा।"

मीरा मेरे पास झुकी। उसने हरनाम का चेहरा करीब से देखा, फिर उसकी आँख की पुतली पर उँगली रखी, फिर होंठ।

"ज़हर," वो बोली। आवाज़ सपाट थी, जैसे वो इस शब्द से थक चुकी हो। "वही ज़हर। जो बोतलों में था। पर ये ज़्यादा तेज़। ये एक ही घूँट में गया है।"

मेरी नज़र उसके हाथ पर गई। दाहिना हाथ मुट्ठी में बंद था, सीने से चिपका हुआ। जैसे उसने आख़िरी साँस में कुछ पकड़ा हो और जान देकर भी न छोड़ा हो।

मैंने उसकी उँगलियाँ खोलनी चाहीं। सख़्त थीं, ठंड से अकड़ी हुईं। मैंने धीरे-धीरे, एक-एक उँगली मोड़ी। मेरे हाथ काँप रहे थे और मुझे इसका गुस्सा आ रहा था — अपने हाथों पर, जो इस वक़्त भी मेरी बात नहीं मान रहे थे।

अंदर एक काग़ज़ था। आधा फटा, आधा गीला, कीचड़ में सना। मैंने उसे सावधानी से निकाला। किनारे से पानी टपक रहा था।

"रोशनी चाहिए," मैंने कहा।

टिंकू ने अपनी जेब से माचिस निकाली और पुल के नीचे रखी एक टूटी लालटेन जलाई। पीली रोशनी हरनाम के चेहरे पर पड़ी, और उस चेहरे पर एक ऐसी शांति थी जो मुझे डरा गई। मरे हुए आदमी के चेहरे पर शांति नहीं होनी चाहिए। डर होना चाहिए। दर्द होना चाहिए। ये शांति तो किसी और चीज़ का नाम है।

मैंने काग़ज़ को लालटेन के नीचे किया। लिखाई जल्दी में लिखी गई थी, अक्षर टेढ़े-मेढ़े, एक जगह कलम दबकर काग़ज़ फाड़ गई थी। स्याही पानी से फैल गई थी।

"भैरव का असली नाम मोहन है, और मोहन का बाप शेर सिंह नहीं…"

आगे सब मिट गया था। बस एक आख़िरी लकीर बची थी, जो पूरी तरह पढ़ी नहीं जा रही थी। मैंने आँखें सिकोड़ीं। "…चौधरी…" और फिर कुछ जो शायद "बेटा" था, पर पक्का नहीं।

"ये अधूरा है," मैंने कहा। मेरी आवाज़ में वो कड़वाहट आ गई जो मुझे अपने ही मुँह में अच्छी नहीं लगती। "आधा सच लेकर मर गया। जैसे सारे लोग यहाँ मरते हैं।"

मीरा ने काग़ज़ मेरे हाथ से लिया। उसने उसे लालटेन के बहुत करीब किया, इतना करीब कि मुझे डर लगा कि कहीं जल न जाए। वो उसे उलटा-पुलटा कर देखने लगी, किनारों को, कोनों को।

"ये लिखाई किसी जल्दी में लिखी गई है," वो बोली। "देखो, आख़िरी शब्द के अक्षर टूट रहे हैं, कलम रुक-रुककर चली है। जैसे लिखते वक़्त हाथ काँप रहा था। या जैसे…" उसने मेरी तरफ़ देखा। "जैसे हरनाम को पता था कि कोई पीछे आ रहा है।"

टिंकू ने पुल के ऊपर की तरफ़ देखा, फिर अंधेरे में, फिर पानी की तरफ़। उसकी गर्दन की नसें तनी हुई थीं।

"भाई," उसने कहा, "अगर कोई पीछे आ रहा था, तो… तो वो कहीं यहीं हो सकता है।"

हम तीनों एक पल के लिए चुप हो गए। नहर का पानी बह रहा था, बस वही आवाज़ थी। और उसके नीचे, बहुत धीमे, झींगुर।

"नहीं," मैंने कहा। "वो जा चुका है। जिसने ये किया, वो अपना काम करके इंतज़ार नहीं करता। वो देखता है कि काम पूरा हुआ, और चला जाता है।"

मैंने फिर हरनाम के हाथ की तरफ़ देखा। मुट्ठी खुल चुकी थी, पर उँगलियाँ अभी भी उसी मोड़ में थीं जैसे किसी चीज़ को जकड़े हुए थीं। मैंने उसकी हथेली को पलटा।

वहाँ, कीचड़ और स्याही के बीच, एक छोटी चाबी थी।

पीतल की, उँगली जितनी छोटी। उस पर हल्का ज़ंग लगा था, पर सिर पर वो निशान साफ़ दिख रहा था — त्रिकोण, और उसके बीच एक बिंदु।

मेरी साँस रुक गई।

"ये…" मैंने चाबी उठाई और लालटेन के नीचे की। "ये वही निशान है। श्यामू काका की चाबी पर भी यही था। और तहखाने में, जो संदूक मैंने देखा था…" मेरी आवाज़ धीमी हो गई, क्योंकि मुझे उस रात की बात याद आ रही थी। तहखाने का अंधेरा। मेरे हाथों में लालटेन। संदूक का जंग लगा ढक्कन, जो मैं खोल नहीं पाया था क्योंकि उस वक़्त भैरव की आवाज़ ऊपर से आई थी और मुझे भागना पड़ा था।

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