Spirit of a Fighter – Chapter 425
आँगन में पानी का सामान पड़ा था, बाल्टियाँ गिरी हुईं, गीली मिट्टी में पैरों के निशान। आग बुझ चुकी थी, पर वो जगह अब भी तप रही थी जहाँ पुआल जला था। धुआँ उठ रहा था — पतला, सुलगता हुआ धुआँ, जो आँखों में चुभता है।
और वहीं, कोने में, जली हुई ईंटों के पास — एक शीशी पड़ी थी।
छोटी, हरी, और उस पर उसी तरह का मोम लगा था जैसे उस रात मेरे दरवाज़े के बाहर मिली शीशी पर था।
मैंने उसे उठाया। हाथ में उसकी ठंडक चुभी।
और फिर मैंने उसे नाक के पास लाया।
एक झटका सीने में लगा।
वो कड़वाहट। वही कड़वाहट जो लुट्टन की साँस में थी, वही जो रणवीर सिंह की दवा में थी, वही जो भैरव के मटके से आती थी। पर इसके साथ कुछ और भी था — हल्की-सी मिठास, गुड़ जैसी, जो मीरा की रिपोर्ट में लिखी थी।
मैंने शीशी नीचे नहीं रखी। मीरा की तरफ़ देखा।
"ये दवा नहीं है," मैंने कहा। मेरी आवाज़ अपनी नहीं लगी।
मीरा रुकी। उसके हाथ से जली किताब फिसलकर गिरी।
"क्या मतलब?"
"ये वही कड़वा पानी है," मैंने कहा, और शीशी उसकी तरफ़ बढ़ा दी। "ये तेरे पापा का इलाज नहीं है। ये… ये तो वो ज़हर है।"
मीरा ने शीशी नहीं छुई।
मीरा ने मेरी आँखों में देखा। और मैंने उसकी आँखों में वो चीज़ देखी जो मैंने कभी नहीं देखी थी — एक ऐसा टूटना जो आवाज़ नहीं करता।
उसके होंठ हिले, पर आवाज़ नहीं निकली।
"मीरा—"
"मेरे हाथ से गिरा दो," उसने फुसफुसाया।
मैंने शीशी ज़मीन पर रख दी।
और तभी पीछे कुर्सी की पहिए की आवाज़ आई।
रणवीर सिंह आँगन में आ रहे थे। व्हीलचेयर खुद धकेल रहे थे — किसी ने उन्हें नहीं धकेला था। राख उनके कंधों पर थी, सफ़ेद बाल और भी सफ़ेद लग रहे थे, और उनके हाथ कुर्सी के पहियों पर ऐसे जमे थे जैसे किसी ने उन्हें वहीं गाड़ दिया हो।
मीरा ने उनकी तरफ़ देखा।
और फिर वो उठी — धीरे-धीरे, जैसे उसके पैर उसके नहीं थे — और उनके सामने घुटनों के बल गिर पड़ी।
"पापा।"
रणवीर सिंह रुके।
मीरा की आवाज़ टूटी, पर वो रुकी नहीं। "पापा, आप बीस साल से जो पी रहे थे…"
वो वाक्य पूरा नहीं हुआ। उसकी आवाज़ गले में अटक गई।
मैं दूर खड़ा था। मुझे हिलना नहीं चाहिए था, पर मैं हिल भी नहीं सकता था।
रणवीर सिंह का चेहरा पत्थर जैसा था। कोई झटका नहीं, कोई अचंभा नहीं। जैसे उन्हें सालों से पता था कि एक दिन ये पल आएगा, और वो उसके लिए तैयार बैठे थे।
उन्होंने धीरे से कहा, "मुझे पता था।"
मीरा का सिर ऊपर उठा।
"क्या?"
"मुझे पता था, बेटी," रणवीर सिंह ने कहा। उनकी आवाज़ बहुत धीमी थी, पर साफ़। "मैंने इसीलिए कभी पूरा गिलास नहीं पिया। हर बार आधा पीता, आधा पीछे की तरफ़ उँडेल देता। पीपल के पेड़ की जड़ में।"
मैंने रणवीर सिंह को देखा। उनके हाथ कुर्सी पर रखे थे, उँगलियाँ ज़रा भी नहीं काँप रही थीं।
मीरा उठी। उसके घुटनों पर मिट्टी लगी थी और आँखों में ऐसा पानी था जो गिर नहीं रहा था, सिर्फ़ भरा हुआ था।
"तो आप जानते थे," उसने कहा, और उसकी आवाज़ में अब रोना नहीं, कुछ और था। "आप जानते थे कि वो आपको ज़हर दे रहा है। बीस साल से आप जानते थे। और आप चुप रहे?"
"मैं तुझे खोना नहीं चाहता था, बेटी," रणवीर सिंह ने कहा।
"मुझे खोने से डरकर आपने मुझे सच नहीं बताया?" मीरा की आवाज़ ऊँची हुई। "पापा, मैं तीन महीने से लैब में बैठी थी! मैंने अपनी आँखें जलाईं, अपनी किताबें जलाईं, अपने हाथ जलाए — और आपको पता था? आप मेरे सामने बैठकर चाय पीते थे और आपको पता था?"
"हाँ," रणवीर सिंह ने कहा। बस एक शब्द। कोई बहाना नहीं। कोई सफ़ाई नहीं।
मीरा की आँखों का पानी अब बह चला।
"आपने मुझे अकेला क्यों छोड़ा?" उसने कहा, और उसकी आवाज़ बच्चों जैसी हो गई। "मैं आपकी बेटी हूँ, पापा। मुझे लड़ना आता है, आप जानते हैं। फिर आपने मुझे अपनी लड़ाई से बाहर क्यों रखा?"
रणवीर सिंह ने अपना हाथ बढ़ाया। बहुत धीरे, जैसे हाथ में जान न हो।
और उन्होंने मीरा का सिर सहलाया।
"तू मेरी बेटा है, बेटी नहीं," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ भर आई। "बेटी तो वो होती है जो रोती है। तू तो लड़ती है।"
मीरा कुछ नहीं बोली।
वो अपने पापा की गोद में सिर रखकर रोई।
और वो रोना वैसा नहीं था जैसे लड़कियाँ रोती हैं — वो बीस साल का दर्द था। एक साथ। बिना रुके। बिना छिपाए।
रणवीर सिंह ने उसका सिर दोनों हाथों से थाम लिया। उनकी आँखें बंद थीं, और उनके होंठ हिल रहे थे — कुछ ऐसा, जो मुझे सुनाई नहीं दिया, पर मैं समझ गया। वो कोई दुआ नहीं थी। वो माफ़ी थी। उस आदमी से माफ़ी, जो खुद बीस साल से ज़िंदा था, पर जी नहीं रहा था।
मैं दूर खड़ा था, और मेरी मुट्ठियाँ भिंची हुई थीं। नाखून हथेली में धँसे हुए थे।
ये देखना मेरे लिए आसान नहीं था। क्योंकि मैंने अपनी माँ को ऐसे रोते देखा था — उस दिन, जब पापा की चिता जल रही थी और माँ ने अपना पल्लू मुँह में दबा लिया था ताकि कोई उनकी आवाज़ न सुने। रोना भी ऐसा रोया था जैसे कोई गुनाह कर रही हो।
मैं आगे बढ़ा। मेरे पैर अपने आप बढ़ रहे थे।
मैं रणवीर सिंह के पास खड़ा हो गया। उन्होंने ऊपर देखा।
"रणवीर सिंह," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ रुक गई। मैंने गला साफ़ किया। "आपने पीपल के पेड़ की जड़ में गिलास उँडेला। वो पेड़ अब भी खड़ा है?"
वो रुके। फिर उन्होंने धीरे से सिर हिलाया।
"हरा-भरा है," वो बोले। "और किसी और पेड़ से ज़्यादा घना।"
"तो उस जड़ में बीस साल का ज़हर है," मैंने कहा। "और आपने कभी किसी को नहीं बताया।"
"किसे बताता?" उन्होंने कहा। "जिसे बताता, वो अगली सुबह मर जाता। मैंने शेर सिंह को बताया था। शेर सिंह अगली सुबह मर गया।"
मेरी साँस रुक गई।
"तो आपको पता था कि शेर सिंह को ज़हर दिया गया था?" मैंने पूछा। "और आपने आज तक…"
"मैंने आज तक कुछ नहीं कहा," रणवीर सिंह ने कहा, और उनकी आवाज़ में पहली बार कुछ टूटा। "क्योंकि मैं डरा हुआ था। मैं बड़ा पहलवान था, वीर सिंह। मैंने अखाड़े में शेरों से लड़ाई की है। और उस दिन मैं एक बोतल से डर गया था।"
वो रुके। उन्होंने मीरा का सिर फिर सहलाया।
"तेरे पापा अगर इस कुर्सी पर बैठे हैं," उन्होंने कहा, "तो इसलिए नहीं कि किसी ने उनके पैर तोड़े। इसलिए कि उन्होंने अपनी ज़ुबान तोड़ दी थी।"
मीरा ने अपना सिर उनकी गोद से उठाया।
"अब नहीं," वो बोली।
उसकी आवाज़ में पानी सूख चुका था।
"अब आपकी ज़ुबान तोड़ने का वक़्त खत्म," मीरा ने कहा। "आज रात से आप जो जानते हैं, सब हमें बताइए। एक-एक चीज़। कौन था, कब था, कैसे था। और जो आपको नहीं पता, वो मुझे पता है।"
रणवीर सिंह ने उसकी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में कुछ बदला।
"तू ठीक कहती है," उन्होंने धीरे से कहा।
और तभी — गाँव की तरफ़ से — किसी के दौड़ने की आवाज़ आई।
मैं पलटा।
टिंकू आ रहा था। पर वो टिंकू नहीं था जिसे मैंने सुबह देखा था। उसकी टोपी गिरी हुई थी, बाल बिखरे हुए, और उसके हाथ में मिठाई की डिब्बी नहीं थी। उसके हाथ खाली थे और वो हाँफ रहा था।
"भाई!" वो दूर से चिल्लाया। "भाई, रुक!"
वो हमारे पास आया और घुटनों पर गिर पड़ा। उसकी साँस ऐसी चल रही थी जैसे वो मीलों भागा हो।
"हरनाम ठेकेदार की लाश मिली है," उसने कहा।
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