Spirit of a Fighter – Chapter 424
"तेरे हाथ जल रहे हैं!"
"मेरे हाथ जलें, पर ये सबूत न जले!" उसकी आँखों से पानी बह रहा था, पर आग से नहीं। "वीर, इसमें वो सारी रिपोर्ट थी! जो मैंने बनाई थीं! भैरव के ज़हर की! जो मैंने तेरे लिए, अपने पापा के लिए, सबके लिए इकट्ठी की थीं!"
मैंने उसके दोनों हाथ पकड़े। उसकी हथेलियाँ लाल हो रही थीं। छाले पड़ रहे थे।
"मीरा," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ सख्त थी — जैसे कभी नहीं थी। "रुक।"
वो मेरी तरफ़ देखने लगी।
"सबूत फिर बन जाएँगे," मैंने कहा। "तेरे हाथ नहीं बनेंगे।"
उसकी आँखों में पानी था, और उस पानी में वो सब कुछ था जो छप्पर के साथ जल रहा था। उसकी मेहनत। उसकी रातें। उसकी उम्मीद।
वो मेरे सीने पर गिर पड़ी।
मैंने उसे पकड़ लिया। मेरे हाथ उसकी पीठ पर थे, और वो काँप रही थी। और मैंने पहली बार महसूस किया कि मीरा — जो हर बात में सबूत माँगती है, जो कभी नहीं रोती, जो हमेशा सीधी खड़ी रहती है — वो भी टूट सकती है।
मैंने उसके कान के पास धीरे से कहा, "मैं वादा करता हूँ। जो इसमें जला है, मैं उसे दोबारा बनवाऊँगा। और जिसने जलाया है, उससे मैं उसका हिसाब लूँगा।"
उसने मेरी कमीज़ पकड़ ली और सिर उठाया। उसके गालों पर कालिख लगी थी, और आँसुओं से उस पर लकीरें बन रही थीं।
"कैसे?" उसने कहा। "सब जल गया, वीर। सब।"
मैंने पीछे मुड़कर देखा। छप्पर अभी भी जल रहा था। लोग बाल्टियाँ फेंक रहे थे, पर आग कम नहीं हो रही थी। और उस आग की लपटों में मुझे कुछ दिख रहा था — एक छोटा-सा तेल का डिब्बा, खाली, जो कोने में पड़ा था। साफ़-साफ़ रखा हुआ। जैसे किसी ने जान-बूझकर छोड़ा हो — ताकि कोई देख ले।
मैंने उस डिब्बे की तरफ़ इशारा किया।
"वो देख," मैंने कहा।
मीरा ने देखा। उसकी आँखें फैल गईं।
"वो डिब्बा…" वो धीरे से बोली।
"भैरव ने यहाँ तेरे पापा की दवा जलाने के लिए ये आग लगाई है," मैंने कहा। "पर उसने एक गलती कर दी। उसने अपना डिब्बा यहीं छोड़ दिया। और ऐसे डिब्बे…" मैंने अपनी नाक हवा में ली और मुझे वो तेल की गंध फिर मिली, "ऐसे डिब्बे उसके शहर के गोदाम में ही मिलते हैं। जिसका हिसाब हरनाम की कॉपी में है।"
मीरा ने मेरी तरफ़ देखा। और उसके चेहरे पर वो ज़िद लौट रही थी।
"तो हम ये डिब्बा सबूत के तौर पर रखेंगे," वो बोली।
"हाँ," मैंने कहा। "पर पहले तेरे हाथ।"
मैंने उसे उठाया और भीड़ से बाहर ले गया। उसके हाथ लाल थे, और उँगलियों पर छाले उभर रहे थे। मैंने अपनी कमीज़ की आस्तीन फाड़ी और उसके हाथों पर धीरे से लपेट दी।
"दर्द हो रहा है?" मैंने पूछा।
"हाँ," वो बोली, और उसकी आवाज़ में पहली बार वो नरमी थी जो मैंने कभी नहीं सुनी। "बहुत।"
मैंने उसकी उँगलियों को धीरे से सहलाया।
"मेरी माँ कहती हैं," मैंने कहा, "कि जलने पर घी लगाना चाहिए। पर मैं डॉक्टर नहीं हूँ। तुम एक बात बताओ — तुम्हारे पास औषधि है क्या? कुछ ऐसा जो जलन कम करे?"
वो हँसी — दर्द में भी हँसी।
"तुमने मुझसे ऐसा पूछा जैसे मैं कोई दुकान हूँ," वो बोली।
"तुम औषधि की पढ़ाई करती हो," मैंने कहा। "मुझे लगा तुम्हारी जेब में कुछ होगा।"
उसने अपनी जेब से एक छोटी-सी पुड़िया निकाली — वही सोंठ-काली मिर्च वाली — और मुझे दी।
"इसे पानी में घोलकर पी लो," वो बोली। "जलन अंदर से कम होगी।"
"ये तुम्हारे लिए है," मैंने कहा।
"मेरे लिए और कुछ नहीं बचा," उसने कहा, और उसकी आवाज़ फिर भर आई। "वीर, मेरी पूरी लैब जल गई। वो सब जो मैंने तीन महीने में बनाया — पानी के नमूने, बोतलों के टुकड़े, सब कुछ।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा।
"पर एक चीज़ बची है," मैंने कहा।
"क्या?"
मैंने अपनी जेब से वो टूटी घड़ी निकाली — जो उसने मुझे दी थी। जिसे सच खुलने पर चलती हुई लौटाना था।
"ये," मैंने कहा। "ये नहीं जली। क्योंकि ये मेरे पास थी। और जब तक ये मेरे पास है, तुम्हारी मेहनत भी मेरे पास है।"
उसकी आँखों में पानी आ गया। इस बार वो रोई। बिना छिपाए। बिना कुछ कहे।
और मैंने पहली बार देखा कि मीरा भी इंसान है। सिर्फ़ सबूत और आरोपों वाली लड़की नहीं। एक ऐसी लड़की जो अपने पापा की दवा के लिए जल रही है, और जिसके हाथ जल रहे हैं पर वो सबूत के लिए रो रही है।
मैंने उसे अपने कंधे पर सिर रखने दिया। और मैंने अपना हाथ उसके सिर पर रख दिया। धीरे से। जैसे माँ मेरे सिर पर रखती है।
और तभी भीड़ के पीछे से एक आवाज़ आई — धीमी, मीठी, जानी-पहचानी।
"अरे अरे अरे।"
मैं रुक गया।
वो आवाज़ मुझे पता थी। मैंने अपना हाथ मीरा के सिर से हटाया और पलटकर देखा।
भीड़ के आख़िर में, एक बुझे हुए दीये की रोशनी में, एक आदमी खड़ा था। पीली धोती, कंधे पर तौलिया, हाथ में लोटा।
लुट्टन।
पर वो लुट्टन नहीं था। उसकी आँखें वैसी नहीं थीं। उसकी आवाज़ वैसी नहीं थी। वो लुट्टन था, पर उसके अंदर कोई और बोल रहा था।
"तूने सोचा होगा," उसने कहा, और वो मुस्कुराया, "कि आग लगाकर भैरव तुझे डरा रहा है।"
वो आगे बढ़ा। भीड़ उससे दूर हट रही थी, जैसे कोई जानवर आ रहा हो।
"पर भैरव ने ये आग तुझे डराने के लिए नहीं लगाई," उसने कहा। "उसने ये आग इसलिए लगाई, ताकि तू यहाँ आए।"
मेरे पैर जम गए।
"क्योंकि उसे पता है," लुट्टन ने कहा, और उसकी आवाज़ में भैरव की मिठास थी, "कि जब तेरी लड़की का घर जलेगा, तो तू अखाड़े की तरफ़ नहीं, यहाँ दौड़ेगा। और जब तू यहाँ होगा…"
वो रुका। उसने अपना लोटा उठाया।
"…तो तेरी माँ अकेली होगी।"
मेरे हाथ से मीरा का हाथ छूट गया।
मैंने पलटकर गाँव की तरफ़ देखा। दूर, नीम के पेड़ों के पीछे, मेरे घर की तरफ़ से एक पतला-सा धुआँ उठ रहा था।
मैं भागा। बिना कुछ कहे। बिना मीरा को देखे।
और मेरे कानों में लुट्टन की आवाज़ गूँज रही थी, जो भैरव की आवाज़ में बदल रही थी — "तीन दिन में तू अपनी माँ को खो देगा।"
मैं दौड़ रहा था, और मेरे पैर मिट्टी में धँस रहे थे, और मेरी नाक में जले हुए घर की गंध भर रही थी।
पर इस बार वो गंध मीरा के घर की नहीं थी।
वो गंध मेरी माँ की रसोई की थी।
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मैं दौड़ रहा था, और मेरे पैर मिट्टी में धँस रहे थे, और मेरी नाक में जले हुए घर की गंध भर रही थी। पर वो गंध मीरा के घर की नहीं थी — वो गंध मेरी माँ की रसोई की थी।
मैंने पीछे मुड़कर भी नहीं देखा। रास्ते में एक ठेला पड़ा था, मैंने उसे ठोकर मारकर गिरा दिया, और भागता रहा। घुटने फट गए, चप्पल एक जगह छूट गई, पर मैं रुका नहीं।
फिर मीरा की आवाज़ आई — मेरे ठीक पीछे, हाँफती हुई।
"वीर! रुक!"
मैं रुका। पलटा।
वो दौड़कर आ रही थी, हाथ में वही जली हुई किताब, बाल उड़ते हुए। उसके हाथ काले पड़े थे और चेहरे पर राख लगी थी।
"रसोई नहीं जली," वो हाँफते हुए बोली। "तेरी माँ की रसोई नहीं जली। धुआँ मीरा के घर के कोने से आ रहा था — मैंने खुद देखा। एक आदमी ने पुआल में आग लगाई थी, और वो अभी भी वहीं है।"
मेरे पैर वहीं जम गए।
"तो माँ…"
"तेरी माँ ठीक है," उसने मेरा हाथ पकड़ा। "पर एक और चीज़ है। वो आदमी भागते वक़्त कुछ गिरा गया। लालटेन की रोशनी में मुझे लगा शीशी है। मैंने उसे उठाया नहीं, तुझे दिखाना था।"
मैं उल्टे पैर दौड़ा — इस बार मीरा के घर की तरफ़।
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