Spirit of a Fighter – Chapter 415
वो मेरी कलाई पकड़े हुए बैठे रहे, और फिर कुछ ऐसा हुआ जो मैंने कभी नहीं देखा। वो व्हीलचेयर से उठने की कोशिश करने लगे। उनके पैर सून्न थे, उनके हाथ कमज़ोर थे, पर वो उठने की कोशिश कर रहे थे — जैसे बीस साल का बोझ उन्हें ज़मीन से उठा रहा हो।
"पापा, नहीं!" मीरा ने उनका कंधा पकड़ा।
पर वो नहीं रुके। उन्होंने मेरी कलाई नहीं छोड़ी। वो घुटनों के बल उठे, फिर लड़खड़ाए, और मेरे ऊपर गिर पड़े। मैंने उन्हें थामा। उनका बड़ा शरीर मेरी बाँहों में ऐसा लगा जैसे कोई बच्चा हो — भारी, काँपता, और पूरी तरह टूटा हुआ।
"तू उसका बेटा है ना?" उन्होंने मेरे कान के पास कहा, और उनकी साँस मेरी गर्दन पर गरम थी। "शेर सिंह का बेटा?"
मेरा गला भर आया। मैंने कुछ कहना चाहा, पर आवाज़ नहीं निकली। मैंने बस सिर हिलाया।
"मुझे तेरी आँखों में वो दिखता है," वो फुसफुसाए। "शेर सिंह। वो भी ऐसे ही देखता था — नीचे से, ऊपर की तरफ़, जैसे दुनिया को चुनौती दे रहा हो।"
और फिर वो फूट-फूटकर रोए। बीस साल का दबा हुआ आँसू, जो एक साथ निकला। उनका बदन हिल रहा था, और वो मेरी बाँहों में ऐसे रो रहे थे जैसे कोई बच्चा माँ की गोद में रोता है। मैंने उन्हें कसकर पकड़ लिया। मेरी आँखें भी भर आईं, और मैंने उन्हें पोंछने की कोशिश नहीं की।
मीरा ने अपने पापा का सिर अपनी गोद में ले लिया। वो उनके माथे पर हाथ फेर रही थी, और उसके होंठ हिल रहे थे, पर आवाज़ नहीं आ रही थी। टिंकू ने मशाल ज़मीन पर रख दी और वो दीवार के सहारे बैठ गया। उसके घुटने काँप रहे थे।
कुछ देर तक कोई कुछ नहीं बोला। सिर्फ़ रणवीर सिंह की साँसें थीं, जो धीरे-धीरे शांत हो रही थीं। और दूर कहीं, नहर का पानी बह रहा था, जैसे वो भी बीस साल से यही सब सुन रहा हो।
फिर रणवीर सिंह ने अपना सिर उठाया। उनकी आँखें सूजी हुई थीं, नाक लाल थी, और उनके चेहरे पर वो शांति थी जो बहुत देर तक रोने के बाद आती है। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, और इस बार उनकी आवाज़ में कुछ और था — कुछ ठोस, कुछ तय।
"वीर," उन्होंने कहा, और मेरा नाम उनके मुँह से ऐसा लगा जैसे किसी ने मुझे पहली बार पुकारा हो। "तू जानता है तहखाने में शेर सिंह की क्या चीज़ है?"
"तस्वीर," मैंने कहा। "और एक रजिस्टर। बीस साल का हिसाब।"
"और एक चीज़," रणवीर सिंह ने कहा, और उनकी आवाज़ धीमी हो गई। "शेर सिंह की लिखी एक चिट्ठी। जो उसने उस रात मुकाबले से पहले लिखी थी। मैंने वो चिट्ठी बीस साल पहले पढ़ी थी, और उस दिन मैंने सोचा था कि ये मेरे सिर पर पाप का बोझ है। पर अब…"
वो रुके।
"अब मुझे लगता है कि वो चिट्ठी उसने मरने से पहले लिखी थी। अपने बेटे के लिए।"
मेरे भीतर कुछ हिला। "मेरे लिए?"
"उसमें लिखा था — 'मेरा बेटा अखाड़े में उतरेगा, तो उसे पहले ये जानना होगा कि उसका बाप किस हाथ से मरा।' " रणवीर सिंह ने मेरी आँखों में देखा। "बीस साल मैंने वो चिट्ठी नहीं पढ़ी। डर के मारे। क्योंकि मुझे लगता था कि उसमें मेरा नाम लिखा होगा।"
वो मेरी तरफ़ झुके।
"आज पढ़ेंगे। तहखाने जाकर। सबके सामने। पर उससे पहले मुझे एक बात का जवाब चाहिए।"
"क्या?"
"तूने कहा कि शेर सिंह को ज़हर किसी ने पिलाया था। तेरे पास सबूत है?"
मैंने अपनी जेब से रघुवीर की डायरी निकाली, जो मैंने तहखाने से उठाई थी। उसके पन्ने पीले पड़ गए थे, किनारे मुड़े हुए थे, और एक पन्ने पर लाल स्याही से एक नाम लिखा था।
"सर," मैंने कहा, "मेरे पापा रघुवीर ने बीस साल तक ये सब लिखा। हर मौत, हर नाम, हर तारीख़। और एक पन्ने पर उन्होंने लिखा — 'शेर सिंह को ज़हर उस आदमी ने दिया जो उसके सबसे करीब था। मैंने देखा। मैंने बोलना चाहा, पर मेरी ज़ुबान पकड़ ली गई।' "
रणवीर सिंह ने डायरी मेरे हाथ से ली। उनके हाथ काँप रहे थे, और उन्होंने उसे खोला। उनकी आँखें पन्नों पर दौड़ीं, और फिर रुक गईं। उनका चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
"ये…" उनकी आवाज़ फुसफुसाहट थी। "ये नाम…"
"क्या?" मीरा ने पूछा। "कौन, पापा?"
रणवीर सिंह ने डायरी बंद कर दी। उन्होंने उसे अपने सीने से लगाया, जैसे वो भी एक और तस्वीर हों। और फिर उन्होंने आँखें बंद कर लीं।
"वो नाम," उन्होंने धीरे से कहा, "मेरे अखाड़े के उस आदमी का है जिसे मैंने अपना भाई माना था। जिसके हाथ में मैंने अपनी मिट्टी दी थी।"
"सर —" मैंने कहना चाहा, पर वो नहीं रुके।
"वो नाम," रणवीर सिंह ने कहा, और अब उनकी आवाज़ में वो गरज लौट आई थी जो एक बार के बड़े पहलवान की आवाज़ थी, "आज रात खुलेगा। तहखाने में। उस आदमी के सामने। और उस दिन जो मैंने बीस साल पहले करना चाहिए था — वो आज करूँगा।"
वो मेरी तरफ़ मुड़े।
"वीर, तू मेरी कुर्सी पकड़। मैं अपने पैरों से नहीं, अपने बेटे के कंधे के सहारे खड़ा होऊँगा।"
मीरा ने अपने पापा का हाथ पकड़कर कहा, "पापा, आप अभी कमज़ोर हैं।"
"मैं बीस साल से कमज़ोर था," रणवीर सिंह ने कहा। "आज मैं ताकतवर हूँ।"
टिंकू उठ खड़ा हुआ। उसकी आँखें लाल थीं और उसके होंठ काँप रहे थे, पर उसकी आवाज़ में जो था, वो गुस्सा था। "वो नाम," उसने कहा, और उसकी आवाज़ भारी थी, "मेरी माँ के बारे में कुछ कहता है?"
सब चुप हो गए।
रणवीर सिंह ने टिंकू की तरफ़ देखा, और उनकी आँखों में एक अजीब सी नरमी आई। "बेटा, तेरी माँ ने कुछ नहीं किया। पर तेरी माँ के घर से जो गुड़ की गंध आती है, वो उस रात भी आ रही थी। मैंने उसे देखा था — तहखाने की सीढ़ियों पर खड़ी, हाथ में गुड़ का लड्डू, और उसके चेहरे पर वो डर था जो किसी ने नहीं देखा।"
टिंकू ने मशाल उठाई और बोला, "तो मैं आज रात तहखाने चलूँगा। और अपनी माँ से पूछूँगा — सच क्या है।"
मैंने उसकी तरफ़ देखा। टिंकू — जो हर बात पर हँसता था, जो हर मुश्किल को खीर से टाल देता था — आज उसके चेहरे पर वो दृढ़ता थी जो मैंने पहले कभी नहीं देखी। उसकी आँखों में आँसू थे, पर वो रो नहीं रहा था। वो खड़ा था, और उसके हाथ मज़बूती से मशाल पकड़े हुए थे।
"टिंकू," मैंने कहा।
"मत रोक मुझे," उसने कहा। "मेरी माँ का नाम किसी की गंध में आ रहा है। मैं उससे पूछूँगा।"
मीरा ने उसका कंधा थपथपाया। "हम सब साथ चलेंगे।"
तभी, दूर से, नहर के उस पार से, एक आवाज़ आई। पहले धीमी, फिर तेज़, फिर चिल्लाहट में बदलती हुई। मैंने पहचाना — सुक्खी बुआ की आवाज़। वो दौड़ती हुई आ रही थी, उसकी साड़ी का पल्लू हवा में उड़ रहा था, और उसके हाथ में पान का बीड़ा नहीं था — उसकी जगह एक काग़ज़ था।
"अरे मीरा!" वो चिल्लाई, और उसकी आवाज़ भरी हुई थी, जैसे वो बहुत दूर से दौड़कर आई हो। "अरे मीरा! तेरे घर के बाहर भैरव के आदमी खड़े हैं!"
मीरा की आँखें फैल गईं। "क्या?"
"कह रहे हैं — आज दोपहर तक तेरे पापा अखाड़े आएँ, वरना अखाड़े की ज़मीन के काग़ज़ ज़ब्त हो जाएँगे!" सुक्खी बुआ रुकी, साँस लेने के लिए झुकी, और फिर सीधी होकर बोली, "और वो काग़ज़ — वो काग़ज़ भैरव के पास हैं। उसने कहा है कि अगर रणवीर सिंह दोपहर तक नहीं आए, तो वो काग़ज़ उसी वक़्त फाड़ देगा।"
रणवीर सिंह का चेहरा पत्थर जैसा हो गया। उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, और उनकी आँखों में वो आग थी जो बीस साल से दबी थी।
वेबसाइट पर अपनी पसंदीदा कहानियाँ मुफ्त पढ़ें और Story FM App पर उन्हीं कहानियों का शानदार Audio Experience लें।
यह कहानी Story FM app पर ऑडियो में भी सुनें — आगे के एपिसोड सबसे पहले वहीं आते हैं।
Audio mein suno