Spirit of a Fighter – Chapter 414
मैं दौड़कर पहुँचा। टिंकू ने मशाल उठाई, और उसकी लौ में मैंने देखा — रणवीर सिंह की आँखों से पानी बह रहा था। बहता नहीं, बस भरा हुआ था, और वो आँसू उनकी झुर्रियों में रुक गए थे, जैसे बरसात का पानी सूखी नाली में।
"मैं ठीक हूँ," उन्होंने कहा, पर उनकी आवाज़ काँप रही थी। "मुझे उठाओ मत। बस… बस एक मिनट ऐसे ही बैठने दो।"
मीरा घुटनों के बल उनके पास बैठ गई। उसने अपने पापा का सिर अपनी गोद में रख लिया, और उनके सफ़ेद बालों में उँगलियाँ फेरने लगी, जैसे कोई बच्चे को चुप करा रहा हो।
रणवीर सिंह ने तस्वीर अपने सीने से लगा ली। दोनों हाथों से, ऐसे जैसे कोई डूबता आदमी लकड़ी पकड़ता है।
"शेर सिंह," वो बोले, और उनकी आवाज़ में कुछ ऐसा था जो मैंने पहले कभी नहीं सुना। न गुस्सा, न गरज। सिर्फ़ एक टूटी हुई आवाज़। "शेर सिंह मेरा दोस्त था। मेरा साथी। हम दोनों एक ही अखाड़े में पले। एक ही हाँड़ी में खाना खाया, एक ही कुएँ का पानी पिया।"
वो रुके। उनका गला सूख गया था।
"एक ही लड़की से प्यार किया," वो धीरे से बोले, और मीरा की उँगलियाँ उनके बालों में रुक गईं।
"माँ?" मीरा ने पूछा।
रणवीर सिंह ने आँखें बंद कर लीं। "नहीं। तेरी माँ नहीं। उससे पहले। कमला। शेर सिंह की कमला।"
कमला। वो नाम मैंने पहले भी सुना था। कालू काका ने तहखाने में कहा था — भैरव की माँ का नाम कमला था।
मेरी साँस रुक गई।
"शेर सिंह की बीवी?" मैंने पूछा, और मेरी आवाज़ भी अब अजीब लग रही थी।
"हाँ।" रणवीर सिंह ने आँखें खोलीं, पर वो मुझे नहीं देख रहे थे। वो कहीं दूर देख रहे थे, बीस साल पीछे। "कमला अखाड़े के पास वाली चाय की दुकान पर काम करती थी। शेर सिंह उसे रोज़ देखने आता था। और मैं भी। मैं उससे कुछ कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाता था। शेर सिंह ज़ोर-ज़ोर से हँसता था, उसके लिए चाय लाता था, उसे हर मुकाबले पर बुलाता था। और मैं… मैं बस मिट्टी में पसीना बहाता रहता था।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा।
"तू भी वही करता है, वीर। मिट्टी में पसीना बहाता है और मुँह से कुछ नहीं निकलता।"
मैं चुप हो गया। क्योंकि वो सच बोल रहे थे। मीरा की तरफ़ देखते वक़्त मेरा भी यही हाल होता था — दिल में बहुत कुछ, ज़ुबान पर कुछ नहीं।
"तो शेर सिंह और कमला की शादी हुई," रणवीर सिंह ने कहा, "और मैं उनका दोस्त बना रहा। क्योंकि शेर सिंह ने एक दिन मेरा हाथ पकड़कर कहा था — 'रणवीर, दोस्ती खून से बड़ी होती है।' उसने मुझे अपने घर बुलाया। अपनी माँ की बनाई खीर खिलाई। और मैं उसका दोस्त बना रहा।"
उनकी आवाज़ भर्रा गई।
"और फिर वो दिन आया।"
टिंकू अब भी वहीं खड़ा था, मशाल हाथ में, और उसका चेहरा लकड़ी जैसा सून्न था। वो न हिल रहा था, न कुछ बोल रहा था। सिर्फ़ सुन रहा था, और उसका सुनना ऐसा था जैसे कोई काँच पर कील चला रहा हो।
"उस रात अखाड़े में बड़ा मुकाबला था," रणवीर सिंह ने कहा। "शेर सिंह और मैं आमने-सामने। इलाक़े का सबसे बड़ा मुकाबला। लोग दूर-दूर से आए थे। शेर सिंह ने मुझे मैदान में देखकर कहा था — 'आज कोई गलती मत करना, रणवीर। आज के बाद हम दोनों में से एक ही रामपुर में रह पाएगा।' मैंने हँसकर कहा था — 'तो तू रहना, मैं चला जाऊँगा।' वो हँसा था। ज़ोर से। वैसे ही जैसे वो हमेशा हँसता था।"
वो कुछ पल चुप रहे। और उस चुप्पी में मुझे नहर की आवाज़ सुनाई दी, दूर किसी कुत्ते के भौंकने की आवाज़, और टिंकू की साँस — जो बहुत तेज़ चल रही थी।
"मुकाबले से पहले मैंने देखा कि शेर सिंह के हाथ काँप रहे थे। उसका चेहरा पीला था। पसीना ठंडा था। मैंने पूछा — 'ठीक है तू?' उसने कहा — 'बस पानी पिया था, ठंडा लग गया।' और वो मुकाबले में उतरा।"
रणवीर सिंह ने अपनी आँखें मूँद लीं।
"उस दिन शेर सिंह अपने आधे दम पर भी नहीं लड़ा। मैंने उसे आसानी से पछाड़ दिया। मैदान में लोग चिल्ला रहे थे — 'रणवीर! रणवीर!' और मैं जीतकर खड़ा था, और मेरे सामने मेरा दोस्त मिट्टी में पड़ा था, हाँफ रहा था, और उसकी आँखों में मैंने कुछ देखा जो आज तक मेरे सपनों में आता है।"
"क्या?" मीरा ने धीरे से पूछा।
"शुक्रिया।" रणवीर सिंह की आवाज़ टूट गई। "वो मुझे देखकर मुस्कुरा रहा था। जैसे मैंने उसे बचा लिया हो।"
अब रणवीर सिंह की आँखों से पानी बहने लगा। छुपाने की कोशिश नहीं, बस बहने लगा। मीरा ने उनका हाथ पकड़ा, पर वो कुछ बोल नहीं पाई। उसकी भी आँखें भर आई थीं।
"अगली सुबह," रणवीर सिंह ने कहा, और अब उनकी आवाज़ में सिर्फ़ थकान थी, "शेर सिंह अपने घर के आँगन में मरा मिला। कहते हैं रात में उसकी तबीयत बिगड़ी। उल्टियाँ हुईं, बदन टूटा, और सुबह तक उसकी साँस रुक गई।"
वो रुके।
"और मैंने सोचा — ये मेरी जीत ने उसे तोड़ दिया। वो पहले से कमज़ोर था, और मैंने उसे मैदान में उतार दिया। मैंने अपने दोस्त को मार डाला।"
"सर —" मैंने कहना चाहा, पर मेरा गला सूख गया था।
"बीस साल," रणवीर सिंह ने कहा, और उनकी आवाज़ में अब कुछ ऐसा था जो मेरी छाती पर पत्थर रख रहा था। "बीस साल मैं इसी गुनाह में जला हूँ। हर रात सोते वक़्त मैंने शेर सिंह का चेहरा देखा। हर सुबह उठकर मैंने सोचा — काश मैं उस दिन हार गया होता। काश मैं मिट्टी में पड़ा होता और वो खड़ा होता।"
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा, और उनकी आँखें लाल थीं।
"और जब मेरे पैर सून्न हुए, तो मैंने सोचा — ये सज़ा है। भगवान ने मुझे सही सज़ा दी। जिसने अपने दोस्त को जीत के लिए मारा, वो खुद कुर्सी पर बैठे।"
मेरे भीतर कुछ टूटा। मैं उनके सामने घुटनों के बल बैठ गया। मेरी आवाज़ भारी हो गई थी, पर मुझे बोलना था। अब नहीं बोला, तो कभी नहीं बोलूँगा।
"सर," मैंने कहा, "आपने उन्हें नहीं तोड़ा था।"
रणवीर सिंह ने मेरी तरफ़ देखा। उनकी आँखों में सवाल था, और उस सवाल के नीचे एक उम्मीद भी थी — बहुत छोटी, बहुत पुरानी, जिसे उन्होंने बीस साल से दबाकर रखा था।
"उस रात शेर सिंह ने ठंडा पानी नहीं पिया था," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ काँप रही थी, पर रुकी नहीं। "उसे ज़हर पिलाया गया था। वही ज़हर जो भैरव आज तक पहलवानों को पिलाता है। वही पानी जो लुट्टन ने पिया, जो आपकी दवा में घुला, जो रघुवीर और जगदीश को मार गया।"
रणवीर सिंह की आँखें फैल गईं। उनका मुँह खुला रह गया, और उनके होंठ काँपने लगे। वो कुछ कहना चाहते थे, पर आवाज़ नहीं निकली।
"शेर सिंह को किसी ने ज़हर दिया था," मैंने कहा, और अब मेरी आवाज़ में गुस्सा आ गया था। "वो कमज़ोर नहीं था। वो मर रहा था, और उसे पता था। इसीलिए वो हारकर मुस्कुराया था — क्योंकि उसे पता था कि आपने उसे मैदान में नहीं मारा। उसका ज़हर किसी और ने पिलाया था।"
रणवीर सिंह का पूरा शरीर काँपने लगा। उन्होंने मेरी कलाई पकड़ी — इतनी ज़ोर से कि मेरी हड्डी पर उनकी उँगलियाँ दब गईं। उनके हाथ ठंडे थे, बर्फ़ जैसे ठंडे।
"तू… तू झूठ नहीं बोल रहा?" उनकी आवाज़ फटी हुई थी। "बीस साल… बीस साल मैंने…"
"सर, आपने उन्हें नहीं मारा," मैंने कहा। "आप बीस साल से एक झूठ का बोझ ढो रहे थे। उस रात जिसने शेर सिंह के गिलास में ज़हर डाला, उसने आपका दोस्त भी मारा और आपकी ज़िंदगी भी।"
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