Spirit of a Fighter – Chapter 404
"यहाँ से पहला नाम पढ़ो," कालू काका ने कहा।
मैंने पढ़ा। मेरी आवाज़ धीमी थी, पर साफ़।
"रघुवीर सिंह — यह मेरा ही नाम है। मैं यह लिख रहा हूँ, क्योंकि मुझे पता है कि एक दिन यह फ़ाइल मेरे बेटे के हाथ लगेगी। और मैं चाहता हूँ कि वो जाने — उसका बाप डरा हुआ नहीं मरा। उसका बाप हारा हुआ नहीं मरा। उसका बाप सच के साथ गया।"
मेरी आवाज़ रुकी। मैंने आँखें मींची। माँ का हाथ मेरे सिर पर था, और उनका हाथ काँप रहा था।
"पढ़ो, वीर," उन्होंने कहा। "पूरा पढ़ो।"
मैंने पन्ना पलटा। अंदर लिखा था — तारीखें, नाम, जगहें, और हर नाम के आगे एक बात। "जगदीश — भैरव की बोतल, तीसरा गिलास, चौदह दिन बाद बुखार।" "श्यामू — हरी शीशी, पाँच दिन, बाद में मुँह से झाग।" "देवीदीन — दो तारीखें, दो दफ़े रिकॉर्ड।"
हर नाम के आगे मेरे पापा ने एक छोटी लाइन लिखी थी। कभी-कभी बस एक शब्द। "और एक घर उजड़ा।"
फिर एक नाम आया जो मैंने कभी नहीं सुना था। मैंने रुककर देखा।
"ये कौन है?" मैंने पूछा। "शेर सिंह?"
कालू काका ने मेरी तरफ़ देखा। उनका चेहरा पत्थर जैसा हो गया।
"वो…" उन्होंने धीरे से कहा। "वो भैरव का बाप है।"
मेरे हाथ रुक गए। मैंने उस लाइन को फिर पढ़ा। मेरे पापा ने उसके आगे लिखा था — "शेर सिंह — अपनी ही बोतल, अपनी ही गलती। भैरव ने बाप को ही नहीं बख़्शा।"
"क्या?" मैंने कहा। "उसने अपने बाप को…?"
"नहीं, बेटा," कालू काका ने कहा। "वो इससे भी बड़ी बात है।" उन्होंने फ़ाइल को छुआ, जैसे वो कोई ज़िंदा चीज़ हो। "तेरे पापा ने ये नहीं लिखा कि भैरव ने अपने बाप को ज़हर दिया। उन्होंने लिखा — शेर सिंह ने खुद पिया। और भैरव ने उसे रोका नहीं। बल्कि…"
वो रुके। उनकी आँखों से एक आँसू सीधा ज़मीन पर गिरा।
"बल्कि उसने गिलास भरकर अपने बाप के हाथ में दिया था।"
टिंकू ने अपना हाथ अपने मुँह पर रख लिया। गुड़िया ने अपनी आँखें फेर लीं। माँ ने कोई शब्द नहीं बोला, पर मैंने उनकी साँस सुनी — एक लंबी साँस, जैसे कोई दुख जो बीस साल से पेट में बैठा हो, आख़िरकार बाहर आया हो।
"क्यों?" मैंने पूछा। "वो अपने ही बाप को…"
"क्योंकि शेर सिंह हार गए थे," कालू काका ने कहा। "एक कुश्ती में। और जिसने उन्हें हराया था, वो तेरे पापा रघुवीर थे।" वो मेरी तरफ़ देखने लगे। "तेरे पापा ने उनसे कोई बदला नहीं लिया था, बेटा। उन्होंने बस जीता था। पर शेर सिंह हार नहीं सह पाए। उन्होंने अपने बेटे के सामने कहा — 'मैं तेरे लिए कलंक हूँ।' और फिर उन्होंने अपनी जान दे दी।"
"और भैरव ने उन्हें गिलास खुद दिया…"
"हाँ। और उस दिन से भैरव ने अपने दिल में एक बात पक्की कर ली — कि ताकत से नहीं, हार से नहीं, बस एक चीज़ से हारा जा सकता है। और वो चीज़ है ज़हर।"
मेरे हाथ काँप रहे थे। फ़ाइल मेरी गोद में थी, और लग रहा था जैसे वो भारी होती जा रही है। मैंने पन्ने पलटने शुरू किए। नाम, नाम, नाम। बीस साल के नाम। कुछ नाम जिन्हें मैं जानता था, कुछ जिन्हें सिर्फ़ गाँव में सुना था — "फलाने का लड़का, कुश्ती में जीता था, फिर एक दिन पानी पीकर सो गया और उठा नहीं।"
और आख़िर में, एक पन्ना जो पूरा खाली था। सिर्फ़ बीच में एक लाइन थी, बड़े अक्षरों में, जैसे कोई खड़ा होकर, अपनी पूरी ताकत से लिख रहा हो —
"जो ये फ़ाइल पढ़े — वो इस अखाड़े को नहीं, इस मिट्टी को बचाए। मिट्टी निर्दोष है। मिट्टी ने कभी किसी को नहीं मारा। मारा है ज़हर ने, और ज़हर उस आदमी ने बनाया जो खुद अपने बाप की मौत के गिलास भरता था।"
मेरी आँखें भर आईं। मैंने फ़ाइल को अपने सीने से लगा लिया। मेरे हाथ ठंडे थे, पर मेरा सीना गरम था। मुझे लगा जैसे पापा मेरे सीने के अंदर से बोल रहे हों — बहुत धीरे, बहुत शांत, जैसे थके हुए आदमी की आख़िरी साँस।
"मिल गई," मैंने कहा। मेरी आवाज़ फटी थी। "माँ, मिल गई।"
माँ मेरे सामने बैठ गईं। उन्होंने फ़ाइल को छुआ, धीरे से, जैसे किसी के चेहरे को छू रही हों। फिर उन्होंने अपना माथा मेरे माथे से लगा दिया। हम दोनों चुप थे। सूखी ज़मीन पर, हमारे बीच एक छोटा-सा डिब्बा था जिसमें बीस साल का सच था, और हम दोनों उसके ऊपर झुके हुए रो रहे थे — पर मैं कह नहीं सकता कि आँसू किसके थे।
फिर हमने सुना।
लालटेन की रोशनी। दूर से, कुएँ की तरफ़ से आती हुई। और साथ में पैरों की आवाज़ — भारी, पर तेज़। एक नहीं, दो नहीं, तीन आदमी।
कालू काका खड़े हुए। उनका शरीर पहले से ज़्यादा कुबड़ा हो गया।
"कोई आ रहा है," उन्होंने कहा।
मैंने फ़ाइल को अपनी धोती के नीचे दबाया और कपड़े को कस दिया। टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा, और मैंने उसे आँख से इशारा किया — चुप। मीरा ने अपनी किताबों का बैग सीने से लगा लिया। गुड़िया माँ के पीछे चली गई।
लालटेन पास आई। रोशनी में एक आदमी का चेहरा चमका — चश्मा टेढ़ा, कमीज़ पर मिट्टी के धब्बे, हाथ काँपते हुए लालटेन पकड़े हुए।
हरनाम।
वो हमें देखकर रुक गया। उसके हाथ से लालटेन फिसलने लगी — मैंने झपटकर उसे पकड़ लिया, वरना वो गिरकर बुझ जाती और हमें कोई नहीं देख पाता। पर मैंने उसे पकड़कर सीधा किया।
"आप?" मैंने झटके से पूछा। मेरी आवाज़ में गुस्सा था, पर उससे ज़्यादा हैरानी। "आप यहाँ क्या कर रहे हैं? रात के इस वक़्त? इस जगह?"
हरनाम का मुँह खुला रह गया। वो कुछ कहना चाहता था, पर शब्द नहीं निकले। उसने अपना चश्मा ठीक किया। फिर धीरे से बोला, आवाज़ इतनी काँपती हुई कि मुझे उसकी बात समझने में वक़्त लगा —
"मैं… मैं वो काग़ज़ छुपाने आया था। जो भैरव ने तहखाने में रखे हैं।"
मेरे कानों में "तहखाना" शब्द पहली बार ऐसे गूंजा जैसे किसी ने मेरे सिर के अंदर घंटी बजा दी हो। मेरा दिल धक-धक करने लगा। मैंने कालू काका की तरफ़ देखा — उनका चेहरा सफ़ेद था।
"कौन से काग़ज़?" मैंने पूछा।
हरनाम ने इधर-उधर देखा। फिर वो मेरे करीब आया और फुसफुसाया, जैसे दीवारों के भी कान हों।
"तहखाने में सब कुछ है, वीर। बीस साल के मौतों के रिकॉर्ड। पैसों का हिसाब। किसको कितना ज़हर दिया, किस दिन दिया, किस दिन मरा। सब। भैरव ने मुझे आज रात धमकाया — 'सब साफ़ कर दे, वरना तेरी बेटी का मुँह नहीं देखेगा।'" उसकी आवाज़ टूटी। "मेरी बेटी, वीर। वो मेरी बेटी के बारे में बोल रहा था। मैं क्या करता?"
टिंकू ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखों में वो सवाल था जो मेरे मन में भी था — ये आदमी सच बोल रहा है या भैरव का जाल है?
पर मैंने उसकी साँस सूँघी। सिर्फ़ इस बार मैंने बहुत ध्यान से सूँघा — जैसे पैरों के नीचे की मिट्टी को परखते हैं, वैसे ही। उसकी साँस में शराब की बू नहीं थी, घबराहट थी। और डर। असली डर। जो झूठ नहीं बोलता।
"तहखाने में क्या रखा है?" मैंने पूछा। "और कहाँ है तहखाना?"
हरनाम ने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखें भर आई थीं।
"कुएँ के नीचे से एक रास्ता है। सीढ़ियाँ। भैरव ने उन्हें तुड़वा दिया था, पर दूसरा रास्ता है — तेरे पीछे। सूखी ज़मीन के नीचे से, एक पुराना नाला। वो सीधा तहखाने में जाता है।" उसने अपना हाथ आगे बढ़ाया। "मैं तुझे ले चलूँगा। पर एक बात पहले — अगर भैरव को पता चला, तो वो मुझे नहीं, मेरी बेटी को…"
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