Spirit of a Fighter – Chapter 401
टिंकू पहले से ही भाग रहा था। मैंने उसे कभी इतनी तेज़ भागते नहीं देखा था — वो दुबला शरीर हवा में उड़ रहा था, और उसके हाथ में कुछ था। उसकी टोपी। उसने दौड़ते-दौड़ते टोपी उतारी, पूरी ताकत से घुमाई, और उस आदमी के चेहरे पर दे मारी जो गुड़िया का मुँह दबाए खड़ा था।
टोपी उसकी आँखों पर चढ़ गई। वो एक पल के लिए अंधा हुआ, हाथ ढीले पड़े, और गुड़िया ने झटके से खुद को छुड़ा लिया।
पर दूसरा आदमी उसे पकड़ने आगे बढ़ा।
और तभी कालू काका आ पहुँचे।
मैंने उन्हें कभी इतना सीधा खड़ा नहीं देखा था। कुबड़ी कमर सीधी हो गई थी, और उनके हाथ — वो सूखे, काँपते हाथ — अब किसी पुराने पहलवान के हाथ लग रहे थे। उन्होंने उस आदमी की कलाई पकड़ी, उसे घुमाया, और ऐसे धकेला कि वो दीवार से जा टकराया।
गुड़िया भागकर कालू काका के पीछे छिप गई। उसकी साँस फूल रही थी, पर आँखें सूखी थीं। वो काँप रही थी, पर रो नहीं रही थी।
मैंने भैरव की तरफ़ देखा। उसका ध्यान एक पल के लिए — बस एक पल के लिए — उस तरफ़ चला गया था। उसकी गर्दन घूमी थी, उसकी आँखें दीवार की तरफ़ गई थीं।
एक पल।
बस इतना ही चाहिए था।
मैं झुका। नीचे, उसकी कमर के पास। उसने सँभलने की कोशिश की, पर देर हो चुकी थी। मेरा कंधा उसके पेट में लगा, मेरे हाथ उसकी टाँगों पर कसे, और मैंने पूरा ज़ोर लगाकर उसे उठाया।
वो भारी था — पहाड़ जैसा भारी। पर मेरे पैर नीचे कालू काका की पुरानी परत पर जमे थे, और वो परत मुझे ऊपर धकेल रही थी।
मैंने उसे पटका।
धूल का बादल उठा। उसके मुँह में मिट्टी गई, आँखों में गई, और वो खाँसने लगा। मैंने उसकी एक बाजू पीछे मोड़ी, दूसरी को अपने घुटने से दबाया, और उसे मिट्टी में बैठा दिया।
जब उसका हाथ पीछे बँधा और वो बैठा, तो पूरा मैदान एक साथ चिल्लाया। इतनी ज़ोर से कि मुझे लगा अखाड़े की दीवारें हिल गईं। सुक्खी बुआ चिल्ला रही थीं, गुड़िया चिल्ला रही थी, टिंकू अपनी टोपी उठाकर हवा में लहरा रहा था, और कहीं दूर से ढोल बजने लगा — किसी ने शायद पहले से ढोल वालों को बुला रखा था।
भैरव हाँफ रहा था। उसकी छाती ऊपर-नीचे हो रही थी, और उसके होंठों पर मिट्टी की परत जमी थी।
"तूने जीत लिया," उसने धीरे से कहा। मुँह से मिट्टी के साथ शब्द निकल रहे थे।
मैंने उसका हाथ छोड़ दिया।
"मैंने नहीं जीता," मैंने कहा, और मेरी आवाज़ मैदान के हर कोने तक पहुँची। "इस मिट्टी ने जीता है। जिसे तूने तीन दिन पहले जलाना चाहा था।"
भीड़ फिर गूँज उठी।
और तभी मैंने एक आवाज़ सुनी जो बाकी सबसे अलग थी।
व्हीलचेयर की चरमराहट।
मैंने पलटकर देखा। रणवीर सिंह अपनी कुर्सी के हत्थों पर दोनों हाथ रखे, खुद को ऊपर खींच रहे थे। उनकी बाँहें काँप रही थीं, उनका चेहरा लाल हो रहा था, और उनके होंठ सिकुड़े हुए थे।
"पापा!" मीरा की आवाज़ आई। वो उनकी तरफ़ दौड़ीं।
"रुक," रणवीर सिंह ने कहा। एक शब्द। उन्होंने मीरा को हाथ से रोका और फिर से खुद को ऊपर खींचा।
उनके पैर ज़मीन पर पड़े थे। सून्न, बेजान। पर उनकी आँखों में जो था, वो किसी बेजान चीज़ का नहीं था। उन्होंने कुर्सी के हत्थे छोड़े और एक पल के लिए — सिर्फ़ एक पल के लिए — अपने दोनों पैरों पर खड़े हो गए।
पूरा अखाड़ा साँस रोककर बैठ गया।
वो खड़े रहे। काँपते हुए, झूलते हुए, पर खड़े रहे। उनकी आँखों में पानी आ गया था, और उनके होंठ हिल रहे थे, पर आवाज़ नहीं निकल रही थी।
फिर उनके पैर फिसले और वो वापस कुर्सी पर गिर पड़े। पर उनकी आँखों से पानी बह रहा था, और वो हँस रहे थे।
"बीस साल," उन्होंने कहा, और उनकी आवाज़ टूट रही थी। "बीस साल बाद एक पल के लिए। बस एक पल।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "बेटा, तूने मुझे वो पल लौटा दिया।"
अब मेरे पैरों में ताकत नहीं थी। मैं मैदान के बीच से भागा — भैरव को वहीं बैठा छोड़कर, सबको छोड़कर। मैं सीधे उस जगह गया जहाँ गुड़िया कालू काका के पीछे खड़ी थी।
मैं घुटनों के बल उसके सामने बैठ गया और उसे खींचकर अपने सीने से लगा लिया।
वो एक पल के लिए सख्त रही। फिर उसने अपने दोनों हाथ मेरी गर्दन के पीछे लपेट दिए और अपना चेहरा मेरे कंधे में दबा दिया।
"भैया," उसने धीरे से कहा। उसकी आवाज़ मेरे कान के पास गरम लगी। "मैंने कहा था ना। तुम उन सबको पछाड़ दोगे।"
मैं हँसा। पर हँसी के साथ कुछ और भी निकला — गले से एक आवाज़ जो हँसी जैसी नहीं थी। मैंने उसे और कसकर पकड़ लिया।
"तू डरी नहीं?" मैंने पूछा।
"डरी थी," उसने कहा, और मुझसे दूर हटकर मेरे चेहरे पर देखा। उसकी चोटी अभी भी खुली थी। "पर जब मैंने तुम्हारी आवाज़ सुनी — जब तुमने कहा 'इस मिट्टी ने जीता' — तो मैं डर गई भैया। बहुत डर गई।"
"क्यों?"
"क्योंकि तुम्हारी आवाज़ में वो बात थी जो पापा की आवाज़ में थी।" उसने कहा। "और पापा अब नहीं हैं।"
मैं चुप हो गया। मैदान की आवाज़ें दूर लग रही थीं।
तभी टिंकू आ पहुँचा। वो हाँफ रहा था, उसका चेहरा लाल था, और उसकी टोपी फिर से उसके सिर पर थी — उलटी। उसने मेरे कंधे पर हाथ रखा और ऐसे खड़ा हो गया जैसे कुछ नहीं हुआ हो।
"भाई," उसने कहा, और उसकी साँस अभी भी नहीं सँभली थी। "मैंने तो पहले ही कहा था ना — आज के बाद मेरी मिठाई का नाम बदल जाएगा।"
"क्या रखेगा?" मैंने पूछा।
"वीर सिंह की लड्डू दुकान," उसने कहा, और मुँह फैलाकर हँसा।
मुझे ऐसी हँसी आई कि मेरी छाती दुखने लगी।
और तभी मैंने भीड़ के पीछे से एक आवाज़ सुनी।
"वीर!"
माँ।
वो दौड़ रही थीं। उनकी साड़ी का पल्ला उनके हाथ में था, उनकी चोटी खुल गई थी, और उनके माथे का हल्दी का टीका पसीने से फैल गया था। वो गिरती-पड़ती मैदान में आईं।
और फिर वो रुक गईं।
मैदान के किनारे पर खड़ी होकर, वो मुझे देखने लगीं। मैं मिट्टी में घुटनों के बल था, मेरी धोती पर धूल थी, मेरे बालों में मिट्टी थी, मेरे हाथों में गुड़िया का हाथ था। मैं अखाड़े की मिट्टी में लिपटा हुआ था।
माँ ने अपने दोनों हाथ मुँह पर रख लिए।
उनकी आँखें भर आईं। मैंने उन्हें कभी ऐसे रोते नहीं देखा था — इस तरह, बिना आवाज़, बिना शिकायत, सिर्फ़ अपने मुँह पर हाथ रखकर। उनके कंधे हिल रहे थे और वो एक कदम भी आगे नहीं बढ़ रही थीं।
मैं उठा। गुड़िया का हाथ छोड़ा — उसने मेरी कमीज़ की किनारी पकड़ रखी थी, फिर छोड़ दिया — और मैं माँ की तरफ़ बढ़ा।
उनके पैरों के पास मिट्टी थी। मैं उनके पैरों पर गिर पड़ा। मेरा माथा उनके पैरों पर टिका, और मेरी आँखें अपने आप बंद हो गईं।
"माँ," मैंने कहा। और मेरी आवाज़ में वो सब था जो मैं अपने पूरे जीवन में कभी नहीं कह पाया था।
उनका हाथ मेरे सिर पर पड़ा। सूखा हाथ, जिसमें चक्की की गरमाहट अभी भी थी।
"उठ," उन्होंने कहा। उनकी आवाज़ भारी थी। "मेरा बेटा मिट्टी में लिपटा पहलवान है। वो पैरों पर गिरने के लिए नहीं, खड़े रहने के लिए बना है।"
मैं उठा। वो मेरे चेहरे को दोनों हाथों से पकड़कर देखने लगीं — जैसे किसी चीज़ को परख रही हों। फिर उन्होंने मेरे माथे से मिट्टी पोंछी और अपने आँचल से उसे साफ़ किया।
"तेरे पापा की मिट्टी," उन्होंने धीरे से कहा, इतना धीरे कि सिर्फ़ मैं सुन सकूँ। "मैंने बीस साल उस मिट्टी से बैर रखा। आज उसने मुझे मेरा बेटा लौटा दिया।"
मैंने उन्हें गले लगा लिया। और वो मेरी बाँहों में सिकुड़ गईं — छोटी, हल्की, चक्की चलाकर सूख चुकी औरत — और उन्होंने अपना चेहरा मेरे कंधे में छिपा लिया।
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