Spirit of a Fighter – Chapter 397
फिर उन्होंने मेरा सिर अपनी गोद में रखा। और मेरे बालों में उँगलियाँ फेरीं।
"डर के साथ लड़, बेटा," उन्होंने धीरे से कहा। "डर के बिना तो पत्थर भी लड़ते हैं। पर पत्थर जीतते नहीं।"
"पर अगर मैं हार गया—"
"तो क्या?" उन्होंने मेरी ठुड्डी पकड़कर सिर उठाया। "तेरे पापा भी हारे थे। पर उन्होंने मिट्टी नहीं छोड़ी। हार जाना बुरा नहीं है, बेटा। झुक जाना बुरा है। और तू झुकेगा नहीं। मुझे पता है।"
तभी दरवाज़े से आवाज़ आई। गुड़िया दौड़कर आई — स्कूल का बैग कंधे पर, चोटियाँ हवा में।
"भैया!" वो मेरी गोद में आ गिरी। "आज मैंने स्कूल में सबको बता दिया कि मेरा भाई कल भैरव को हराएगा।"
मैं हँसा। पहली बार उस दिन।
"अगर हार गया तो?" मैंने पूछा।
वो बिना रुके बोली, "तो मैं कह दूँगी मैंने मज़ाक किया था।"
माँ हँसीं। और मेरी आँखें भर आईं।
गुड़िया ने मेरी कलाई पकड़ी। "ये पुराना है।" उसने टूटा हुआ लाल धागा देखा। "रुको, मैं नया लाती हूँ।"
वो भागकर अंदर गई और एक नया लाल धागा लेकर आई। उसने मेरी कलाई पर बाँधा। धागा कसकर बाँधा, जैसे कोई वादा।
"अब जाओ," उसने कहा। "मैंने सुना है भैरव ने शहर से तेल मँगवाया है। पर तुम्हारे पास माँ का आशीर्वाद है। वो तेल से भारी है।"
मैंने उसका सिर सहलाया। और तभी दरवाज़े पर कोई खड़ा हुआ।
मैंने पलटकर देखा।
मीरा थी। कंधे पर बैग, हाथ में एक पोटली। उसके बाल भीगे हुए थे — बाहर बारिश शुरू हो गई थी।
"वीर," उसने कहा। और फिर माँ की तरफ़ देखकर उसने हाथ जोड़े। "नमस्ते माँ जी।"
माँ ने उसे देखा। फिर मेरी तरफ़। और फिर वो उठकर खड़ी हो गईं।
"अंदर आ," उन्होंने कहा। "बाहर बारिश है।"
मीरा अंदर आई। उसने पोटली खोली। उसमें एक पट्टी थी — मैला, पुराना, पर मज़बूत। लाल रंग की.
"ये पापा की है," उसने कहा। "बीस साल पहले उन्होंने ये पहनी थी। उस दिन जब वो आख़िरी बार जीते थे।"
मैंने पट्टी देखी। उस पर पसीने के दाग थे। और रघुवीर की गंध — मिट्टी और तेल की।
"ये कल पहनना," मीरा ने कहा। उसकी आवाज़ सख़्त थी, पर हाथ काँप रहे थे।
मैंने पट्टी ली। और फिर वो कुछ देर खड़ी रही। बस खड़ी रही। और मैंने देखा कि उसकी आँखें मेरे घावों पर थीं — उस पुराने ज़ख़्म पर जो कलाई पर था, और उस नए पर जो कुएँ से आते वक़्त लगा था।
"बैठ," उसने कहा। और मैं बैठ गया।
उसने अपनी पोटली से एक छोटी डिब्बी निकाली। उसमें हल्दी और कुछ और था — सोंठ, काली मिर्च, शहद। उसकी उँगलियाँ मेरे घाव पर लगीं, और मुझे उसकी उँगलियों की गर्माहट महसूस हुई।
उसके हाथ काँप रहे थे।
मैंने उसका हाथ थाम लिया।
वो रुकी। उसने मेरी तरफ़ देखा। और मैंने उसकी तरफ़। दोनों कुछ नहीं बोले।
उसकी आँखों में वो बात थी जो सूखी पत्तियों में छिपी आग जैसी थी — दिखती नहीं, पर जलाती है।
बाहर बारिश तेज़ हो गई। छत पर पड़ रही थी — टप, टप, टप। माँ चूल्हे के पास चली गईं। गुड़िया दरवाज़े पर खड़ी बारिश देख रही थी।
और मैं वहीं बैठा था, मीरा का हाथ पकड़े हुए। और मुझे लगा कि अगर यही पल रुक जाए, तो मुझे कल भैरव से लड़ने की ज़रूरत नहीं।
पर वक़्त नहीं रुकता। माँ की आवाज़ आई।
"रोटी खा ले।" उन्होंने थाली मेरी तरफ़ बढ़ाई। "लड़ने वाले को खाली पेट नहीं जाना चाहिए।"
मैंने रोटी खाई। उसमें नमक ठीक था।
मीरा उठी। उसने अपनी पोटली समेटी। और फिर दरवाज़े की तरफ़ बढ़ी। बारिश में खड़ी होकर उसने पलटकर देखा।
"वीर," उसने कहा।
मैंने देखा।
"कल के बाद मुझे कुछ कहना है।"
"अभी क्यों नहीं?" मैंने पूछा।
वो मुस्कुराई। बारिश की बूँदें उसके चेहरे पर थीं।
"क्योंकि कल के बाद वो बात कहने की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी।"
और वो बारिश में चली गई।
मैं दरवाज़े पर खड़ा रहा। उसकी परछाई अंधेरे में घुल गई।
तभी मुझे पीछे से माँ की आवाज़ आई।
"वीर, अंदर आ।"
मैं अंदर आया। माँ ने मेरी तरफ़ देखा — और उनकी आँखों में कुछ था जो मैंने पहले कभी नहीं देखा।
"अपनी धोती उतार," उन्होंने कहा। "मैं तुझे कुछ दिखाती हूँ।"
मैं रुका।
माँ चक्की के पास गईं। उसके नीचे से एक पुरानी पोटली निकाली — जो मैंने कभी नहीं देखी थी। उन्होंने उसे खोला।
अंदर एक धोती थी। लाल। मैली, पुरानी, कुछ जगह फटी हुई।
"ये तेरे पापा की है," उन्होंने कहा। "जो उन्होंने उस रात पहनी थी। जब वो भैरव से लड़ने गए थे।"
मैंने धोती देखी। फटी हुई। कुछ जगह जले के निशान थे।
"इस पर ज़हर के दाग हैं," माँ ने कहा। "पर ये धोती उन्होंने खुद उतारी थी, मरने से पहले। उन्हें पता था कि ये तुझे चाहिए होगी।"
मेरा हाथ काँपा।
"माँ…"
"कल," उन्होंने कहा, "जब तू अखाड़े में उतरे, तो ये धोती पहनना। और जब भैरव तुझे डराए, तो उसे याद दिलाना कि जो आदमी इस धोती में मरा था, उसका बेटा अब इसी धोती में लड़ेगा।"
मैंने धोती अपने हाथ में ली। कपड़ा खुरदुरा था, पर कुछ देर में गर्म लगने लगा — जैसे पहनने वाले का पसीना अभी सूखा न हो।
गुड़िया ने मेरी तरफ़ देखा। और फिर उसने धीरे से कहा, "भैया, मैंने सुना है कि मरने वाले आदमी की धोती पहनने से ताकत आती है।"
माँ ने उसकी तरफ़ देखा। "किसने कहा?"
"कालू काका ने," गुड़िया ने कहा। "आज दोपहर दीवार के पास मिले थे। उन्होंने कहा कि जो धोती मिट्टी में लिपटी हो, वो शरीर पर पहनने से मिट्टी और मज़बूत होती है।"
मैंने धोती सीने से लगाई।
और तभी बाहर किसी ने दरवाज़ा खटखटाया।
तीन दस्तक। धीमी। भारी।
मैंने माँ की तरफ़ देखा। उनका चेहरा सफ़ेद पड़ गया।
"इतनी रात को कौन?" गुड़िया ने कहा।
मैंने दरवाज़ा खोला।
बाहर बारिश में एक आदमी खड़ा था। लंबा। भीगा हुआ। हाथ में एक लिफ़ाफ़ा।
"वीर सिंह?" उसने पूछा।
"हाँ।"
"ये भैरव सिंह ने भेजा है।" उसने लिफ़ाफ़ा मेरी तरफ़ बढ़ाया। "कहा है कि अभी पढ़ लेना। कल सुबह के बाद पढ़ने का वक़्त नहीं होगा।"
मैंने लिफ़ाफ़ा लिया। आदमी पलटकर बारिश में चला गया।
मैंने लिफ़ाफ़ा खोला। अंदर एक काग़ज़ था — मोटा, महँगा। और उस पर भैरव की लिखाई में सिर्फ़ एक लाइन।
"कल सुबह अखाड़े में तीन चीज़ें होंगी — तू, तेरी माँ की लाश, और वो काग़ज़ जो मैं खुद जलाऊँगा। तेरे पास एक रात है। चुन ले — क्या बचाना है।"
मैंने काग़ज़ माँ की तरफ़ बढ़ाया।
माँ ने पढ़ा। उनका हाथ काँपा। पर फिर उन्होंने काग़ज़ मोड़ा और चूल्हे में डाल दिया।
"माँ!"
"अब ये काग़ज़ नहीं है," उन्होंने कहा। "ये डर है। और डर को चूल्हे में ही जलाना चाहिए।"
काग़ज़ जल गया। आग ने उसे खा लिया।
और मैं वहीं खड़ा रहा — धोती हाथ में, माँ की आँखों में, और कल की सुबह सामने।
तभी मेरे कान में एक आवाज़ आई। धीमी। बाहर से। बारिश के शोर में भी साफ़।
"वीर सिंह।"
मैं दरवाज़े तक गया।
बाहर कोई नहीं था। सिर्फ़ बारिश। और अंधेरा।
पर फिर मुझे वो महसूस हुआ — वही गंध। लाल मिट्टी की। तेज़। ताज़ी। जैसे कोई अभी-अभी मेरे आँगन में खड़ा था और मिट्टी हिला गया हो।
मैंने नीचे देखा।
दरवाज़े के सामने, कीचड़ में, दो पैरों के निशान थे। नंगे पैरों के। बड़े। गहरे।
और उनके बीच में, कीचड़ पर, कोई चीज़ रखी थी।
मैं झुका।
एक छोटी-सी शीशी थी। हरी।
मैंने शीशी उठाई। हरी काँच। ठंडी। हिलाई तो अंदर पानी जैसा कुछ था, पर मोटा — जैसे कोई तेल।
मैंने पलटकर माँ की तरफ़ देखा।
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