Spirit of a Fighter – Chapter 386
सीढ़ी की सातवीं पायदान पर पैर रखते हुए मुझे मीरा की टूटी घड़ी जेब में महसूस हुई। मैंने उसे मसल दिया। और मैंने मन ही मन कहा — "मीरा, ये घड़ी अब जल्दी चलेगी। मैं वादा करता हूँ।"
नीचे अंधेरे में लालटेन की रौशनी धीमी हो गई, और कुएँ का ढक्कन मेरे सिर के ऊपर अपने आप बंद हो गया — जैसे किसी ने ऊपर से हाथ रखकर उसे धकेल दिया हो।
और उसी वक़्त ऊपर, अखाड़े की दीवार के पीछे, किसी ने लालटेन जलाई और धीरे से कहा, "अब पता चला कि कुएँ में कौन रहता है।"
॥
कुएँ के ढक्कन के बंद होने की आवाज़ मेरे कानों में गूँज रही थी जब मैं दो पायदान और नीचे उतरा। अंधेरा इतना घना था कि अपने ही हाथ नहीं दिख रहे थे। सिर्फ़ नीचे से आती लालटेन की हल्की पीली रौशनी थी, और उस रौशनी में वो बूढ़ा आदमी मेरे आगे-आगे चल रहा था।
सीढ़ी खत्म हुई। नीचे की ज़मीन नरम थी — गीली मिट्टी जैसी। और अचानक एक गंध आई — इतनी पुरानी, इतनी गहरी कि मेरे घुटने अपने आप मुड़ गए।
चंदन। धूप। और मिट्टी। वही मिट्टी जो मैंने तहखाने में सूंघी थी।
"यहीं रुक," उसने कहा और लालटेन एक पत्थर की किनारी पर रख दी।
रौशनी फैली तो मैंने देखा — छोटा-सा गोल कमरा, दीवारों पर पुराने निशान, और बीच में मिट्टी का एक चबूतरा जिस पर कुछ लिपटा हुआ रखा था। कपड़े में। लाल कपड़े में।
"बैठ," उसने कहा।
मैं नहीं बैठा। मैं खड़ा रहा। "पहले आप बताइए, आप कौन हैं?"
वो हँसा। धीरे से। जैसे कोई बच्चे की मासूमियत पर हँसता है।
"मैंने बताया न, तेरे पापा का गुरु हूँ।" उसने अपनी कमर से एक पुरानी माला निकाली और उँगलियों में घुमाने लगा। "नाम से क्या? नाम तो आदमी मरने के बाद भी पीछा करता है। तू मुझे गुरुजी कह दे।"
"गुरुजी," मैंने कहा। मुँह से निकला, पर मन में सवाल उबल रहे थे। "आप बीस साल से इस कुएँ में हैं?"
"नीचे।" उसने ऊपर की तरफ़ उँगली उठाई। "कुआँ सिर्फ़ मुँह है। घर ये कमरा है। यहाँ पानी नहीं आता, हवा आती है — उसी सुरंग से जो तेरे कालू काका जानते हैं। बाकी बीस साल मैंने चुपचाप बिताए। मिट्टी सूँघते हुए। तेरे पापा की बातें याद करते हुए। और तेरे आने का इंतज़ार करते हुए।"
"मेरा इंतज़ार?"
"रघुवीर ने कहा था — 'गुरुजी, अगर मैं न रहूँ, तो मेरा बेटा आएगा। उसे कुछ मत बताना। बस उसे वो देना जो मैंने तेरे लिए छोड़ा है।'" उसने मेरी तरफ़ देखा। उसकी आँखें धँसी हुई थीं, पर उनमें एक चमक थी — जैसे अंधेरे कमरे में दूर जलती लौ। "तू आ गया। बीस साल बाद। और ठीक उस रात आया जब भैरव इसे जलाने वाला था।"
मेरा गला सूख गया। "क्या जलाने वाला था?"
उसने हाथ बढ़ाया और उस लाल कपड़े को उठाया। अंदर से एक पुरानी मिट्टी की गोली निकली — दो मुट्ठी के बराबर, सूखी, जगह-जगह से फटी हुई, और उस पर कुछ लिखा था जो मिट गया था।
"जब तेरे पापा ने भैरव का भेद जाना," गुरुजी बोले, "तो उन्होंने सबसे पहले ये बनाया। इसे कहते हैं मिट्टी का टीका। इसमें इस तहखाने की मिट्टी, नीम की राल, और सोंठ — तीनों बराबर मिले हैं। ये वो ज़हर नहीं है जो भैरव बनाता है। ये उसका उल्टा है।"
"उल्टा?"
"जो ज़हर शरीर में जाता है, वो अंदर से खोखला करता है। और जो इस टीके में है, वो उसी ज़हर को पहचानकर उसका रास्ता बंद कर देता है।" उसने गोली मेरी हथेली पर रख दी। "तेरे पापा ने इसे बनाया था — भैरव के ज़हर का इलाज। और जिस रात उन्हें पता चला कि भैरव उन्हें भी पिलाने वाला है, उस रात उन्होंने ये मुझे दिया और कहा — 'गुरुजी, इसे बचाकर रखना। मेरा बेटा इसे ले जाएगा।'"
गोली मेरी हथेली में भारी लग रही थी। जैसे कोई पत्थर नहीं, कोई ज़िम्मेदारी हो।
"पर भैरव को कैसे पता चला कि आप यहाँ हैं?" मैंने पूछा। "बीस साल आप यहीं रहे और किसी को पता नहीं चला?"
गुरुजी चुप हो गए। उन्होंने लालटेन की लौ की तरफ़ देखा, और उनकी उँगलियाँ माला पर रुक गईं।
"पता चला," उन्होंने धीरे से कहा। "तीन दिन पहले। जब भैरव ने कुएँ का ढक्कन खोला और अंदर झाँका। उसने मेरी आवाज़ सुनी — मैं भूल गया था कि दीवारें आवाज़ पकड़ती हैं।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "वो मुझे जलाना नहीं चाहता। वो चाहता है कि मैं यहीं रहूँ, ज़िंदा, पर किसी से बात न कर सकूँ। क्योंकि मैं वो आदमी हूँ जिसने उसके बाप के हाथों से ज़हर बनाना सीखा था — और फिर उसी ज़हर से अपना हाथ धो लिया।"
"उसके बाप?" मैंने पूछा। "मोहन का बाप?"
गुरुजी ने मेरी तरफ़ देखा, और उनकी आँखों में हैरानी आई। "तू मोहन का नाम जानता है?"
"मुझे सब पता है," मैंने कहा। "भैरव का असली नाम मोहन है। रणवीर सिंह ने उसके बाप को हराया था। उसी बदले में वो सब कर रहा है।"
गुरुजी ने माला अपनी मुट्ठी में कस ली। उनके होंठ काँपे। फिर वो बोले, "अधूरी बात जानता है तू।" उन्होंने लालटेन उठाई और कमरे के उस कोने में ले गए जहाँ दीवार पर कुछ खुदा हुआ था। "देख।"
दीवार पर नाखूनों से या पत्थर से कुछ लिखा था — पुराना, धुँधला, पर पढ़ा जा सकता था। मैंने झुककर देखा।
"रघुवीर — तूने मेरा बाप नहीं हराया। तूने उसे बचाया था। पर तू चुप रहा। तेरी चुप्पी ने मुझे अनाथ बनाया।"
मैं उठ खड़ा हुआ। "ये क्या है?"
"ये भैरव ने लिखा था," गुरुजी बोले। "उस रात जब उसने अपनी माँ को खोया था। वो सोलह साल का था। वो इसी कुएँ में उतरा था — मुझे ढूँढने, क्योंकि उसे पता था कि मैं उसके बाप का दोस्त हूँ। और उसने मुझसे पूछा — 'गुरुजी, सच बताओ, मेरे बाप को किसने मारा?'"
"और आपने क्या कहा?"
"मैंने कहा — 'तेरे बाप को किसी ने नहीं मारा। तेरे बाप ने खुद अपना ज़हर पिया था। क्योंकि वो हार नहीं सह सका।'" गुरुजी की आवाज़ भारी हो गई। "और भैरव ने मुझे धक्का दिया। मैं यहाँ गिरा। वो ऊपर गया और ढक्कन बंद कर दिया। दो दिन बाद उसने सीढ़ियाँ तुड़वा दीं और ऊपर पत्थर रखवा दिए।"
मैं चुप खड़ा रहा। मेरे हाथ ठंडे पड़ गए थे।
"पर उसने कभी मारा नहीं," गुरुजी ने कहा। "हर महीने एक आदमी आता था — रोटी, पानी, और कभी-कभी एक पुरानी किताब। भैरव खुद नहीं आता था। वो अपने आदमी भेजता था। और हर बार वही संदेश — 'गुरुजी, बताओ कि मेरे बाप को किसने मारा?'"
"और आप?"
"मैं चुप रहा। बीस साल। क्योंकि मुझे पता था कि सच बताया तो वो तेरे पापा को मार देगा।" उन्होंने मेरी तरफ़ देखा। "अब वो जान गया है। उसे रणवीर के घर से सब पता चल गया। इसलिए अब वो मुझे जलाना चाहता है। क्योंकि मैं वो आख़िरी गवाह हूँ जो बता सकता है कि उसके बाप ने खुद अपना ज़हर पिया था — कोई ज़बरदस्ती नहीं।"
मेरे दिमाग़ में एक चीज़ चमकी। "गुरुजी, भैरव यही तो सबको बता रहा है — कि उसके बाप को रणवीर ने धोखे से हराया और ज़हर दिया। अगर आप सच बोल दें, तो उसकी पूरी कहानी टूट जाएगी।"
"हाँ," गुरुजी ने कहा। "पर उसके लिए मुझे ज़िंदा चाहिए। और भैरव जानता है। इसलिए वो मुझे मारेगा नहीं — वो मेरी ज़ुबान काट देगा। या और बुरा — वो मुझे ऐसा पागल बना देगा कि मेरी गवाही पर कोई भरोसा न करे।"
बाहर से एक हल्की आवाज़ आई। मैंने सिर उठाया। कुछ नहीं।
"तेरे पास वो काग़ज़ है?" गुरुजी ने पूछा।
मैंने जेब से रघुवीर की लिखी पर्ची निकाली — वो जो माँ ने भैरव की अलमारी से निकालकर मुझे दी थी। पीली, मुड़ी हुई, जिस पर लिखा था — 'मेरा बेटा इस ज़हर को पानी में नहीं, मिट्टी में डालेगा।'
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